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“मोदी-वियोग के मारे पत्रकार और अचानक ईमानदार हुई EVM”

बीजेपी हार गई… अब EVM ठीक हो गई!

बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में बीजेपी हार गई। हार की चर्चा तो हुई ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा चर्चा उन पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की खुशी की रही, जो वर्षों से मोदी विरोध में दिन-रात आंसू बहाते रहते हैं। ऐसा लग रहा था मानो चुनाव उम्मीदवार नहीं, बल्कि वही जीतकर आए हों। चेहरे ऐसे खिल उठे जैसे किसी ने दस साल पुराना बिजली का बिल माफ कर दिया हो।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि इनका लोकतंत्र चुनाव परिणाम देखकर जागता और सोता है। बीजेपी जीत जाए तो देश में बेरोजगारी पहली बार पैदा होती है, महंगाई पहली बार आती है, विदेश नीति चौपट हो जाती है, संविधान खतरे में पहुंच जाता है और ईवीएम अचानक संदिग्ध मशीन बन जाती है। लेकिन जैसे ही बीजेपी हार जाए, वही ईवीएम गंगाजल से धुली हुई पवित्र मशीन बन जाती है, चुनाव आयोग निष्पक्ष हो जाता है और लोकतंत्र विश्वगुरु बनने की राह पकड़ लेता है।

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अभी दो उपचुनाव में बीजेपी क्या हार गई, किसी भी टीवी चैनल पर किसी पत्रकार के मुंह से यह सुनाई नहीं दिया कि “ईवीएम में गड़बड़ी हुई है”, “निर्वाचन आयोग सरकार से मिला हुआ है” या “चुनाव निष्पक्ष नहीं हुआ।” आखिर ऐसा चमत्कार हुआ कैसे? क्या दो दिन पहले तक खराब रहने वाली मशीन ने अचानक योगाभ्यास शुरू कर दिया?

सच पूछिए तो सबसे ज्यादा भ्रमित अगर कोई है, तो वह बेचारी ईवीएम ही होगी। उसे भी समझ नहीं आता होगा कि आखिर उसका अपराध क्या है। बीजेपी जीते तो दोष उसका, बीजेपी हारे तो श्रेय लोकतंत्र का। मशीन बेचैन होगी कि आखिर मुझे गाली कब पड़नी है और शाबाशी कब मिलनी है, इसका कोई कैलेंडर भी है या नहीं?

कुछ पत्रकारों की हालत देखकर लगता है कि उनके मोबाइल में अलार्म नहीं, “मोदी अलर्ट” लगा है। सुबह आंख खुलते ही मोदी, दोपहर में मोदी, शाम को मोदी और रात को सोने से पहले भी मोदी। अगर एक दिन मोदी का नाम न लें तो शायद उनका ब्लड प्रेशर ही गिर जाए। लगता है उनकी फिटनेस वॉच भी पूछती होगी—”आज आपने मोदी का नाम केवल 112 बार लिया है, लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ।”

टीवी बहस भी कम मजेदार नहीं होती। बीजेपी हारते ही घोषणा हो जाती है—”मोदी युग समाप्त!” भाई साहब, दो उपचुनाव हुए हैं, महाभारत का अठारहवां दिन नहीं। ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि मानो कल सुबह प्रधानमंत्री कार्यालय में ताला लगने वाला हो।

इन विश्लेषकों की राजनीति भी बड़ी सुविधाजनक है। अपनी पार्टी जीते तो “जनता का जनादेश”, दूसरी पार्टी जीते तो “ध्रुवीकरण”। अपना नेता बोले तो “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, दूसरा बोले तो “लोकतंत्र पर हमला”। अपने पक्ष में फैसला आए तो संस्थाएं मजबूत, नहीं आए तो पूरी व्यवस्था बिक चुकी है।

लगता है कुछ लोगों ने नया सिद्धांत बना लिया है—“हम जीतें तो लोकतंत्र जिंदाबाद, हम हारें तो ईवीएम मुर्दाबाद।”

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लोकतंत्र का असली अर्थ यही है कि जनता जिसे चाहे जिताए और जिसे चाहे हराए। यदि बीजेपी हारती है तो उसे भी परिणाम स्वीकार करना चाहिए, और यदि जीतती है तो विपक्ष को भी जनता का फैसला मानना चाहिए। लेकिन यहां तो कुछ लोगों के लिए लोकतंत्र का मतलब केवल वही परिणाम है जो उनके मन का हो।

कम से कम एक जगह तो टिकिए। यदि ईवीएम पर भरोसा नहीं है तो हर चुनाव में सवाल उठाइए। और यदि भरोसा है तो फिर हर हार का ठीकरा उसी मशीन पर मत फोड़िए। लोकतंत्र कोई रिमोट कंट्रोल नहीं है कि चैनल पसंद न आए तो तुरंत बदल दिया जाए।

जनता सब देख रही है। उसे अब समझ आने लगा है कि कुछ लोगों की राजनीति नहीं बदलती, केवल उनकी हेडलाइन बदलती है। इसलिए अगली बार जब कोई टीवी स्टूडियो में बैठकर लोकतंत्र बचाने की शपथ ले और परिणाम अपनी पसंद का आते ही ईवीएम को प्रमाणपत्र देने लगे, तो बस मुस्कुरा दीजिए।

क्योंकि हमारे देश में चुनाव पांच साल में आते हैं, लेकिन कुछ लोगों का “मोदी-वियोग” रोज सुबह छह बजे समय पर शुरू हो जाता है।

✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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1 thought on ““मोदी-वियोग के मारे पत्रकार और अचानक ईमानदार हुई EVM””

  1. पत्रकार कवि संदीप कपूर वक़्तनाम

    वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम पर सटीक विश्लेषण। लेखक पत्रकार विनय श्रीवास्तव जी को साधुवाद।

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