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पद रहित सेवा ही विकास का मूलमंत्र, जिसे जयपुर के ये समाजसेवी अपने कर्म से कर रहे हैं साकार

“वतन की मिट्टी से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं, तिरंगे से बढ़कर कोई सम्मान नहीं और देश के लिए कुछ कर गुजरने से बढ़कर कोई गौरव नहीं।” स्वतंत्रता दिवस केवल उस आजादी का उत्सव नहीं है, जो हमें वर्षों के संघर्ष और असंख्य बलिदानों के बाद मिली, बल्कि यह अवसर हमें यह सोचने का भी देता है कि हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी किस तरह निभा रहे हैं। देश केवल सीमाओं पर खड़े सैनिकों से नहीं बनता, बल्कि उन असंख्य सामान्य नागरिकों के छोटे-छोटे, लेकिन निरंतर प्रयासों से भी मजबूत होता है, जो बिना किसी पद, प्रचार या अपेक्षा के अपने आसपास के समाज को बेहतर बनाने में जुटे रहते हैं।

जयपुर के पशुपतिनाथ नगर और आसपास के सामाजिक परिवेश में ऐसे ही कुछ लोग हैं, जिनकी पहचान किसी बड़े पद या सरकारी सम्मान से नहीं, बल्कि उनके रोजमर्रा के व्यवहार और समाज के प्रति समर्पण से बनती है। श्री मदन जी नामा, श्री मुकेश यादव जी, श्री उमेश श्रृंगी जी और श्री रामस्वरूप जी ऐसे ही चार समाजसेवी हैं, जो अपने-अपने तरीके से समाज के लिए उपयोगी काम कर रहे हैं। इनका जीवन यह संदेश देता है कि समाजसेवा के लिए न किसी पद की जरूरत है और न किसी मंच की। जरूरत है तो केवल संवेदनशील मन, जिम्मेदारी की भावना और लगातार कुछ अच्छा करने की इच्छा की।

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श्री मदन जी नामा : उम्र बढ़ी, लेकिन सेवा का उत्साह आज भी युवा

लगभग 70 वर्ष की आयु में जब अधिकांश लोग अपने निजी जीवन, परिवार और आराम को प्राथमिकता देने लगते हैं, तब श्री मदन जी नामा आज भी सामाजिक सरोकारों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाए हुए हैं। उनका परिवार खुशहाल और भरा-पूरा है, जीवन की आवश्यक जिम्मेदारियां भी उन्होंने पूरी की हैं, लेकिन इसके बावजूद समाज और प्रकृति के प्रति उनकी सक्रियता कम नहीं हुई।

श्री मदन जी नामा की समाजसेवा का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि इसमें दिखावे की कोई जगह नहीं है। वे रोजाना पक्षियों के भोजन और पानी तक का ध्यान रखते हैं। गर्मी के दिनों में जब मनुष्य के लिए भी पानी का इंतजाम चुनौती बन जाता है, तब बेजुबान पक्षियों के लिए पानी और दाने की व्यवस्था करना उनके संवेदनशील व्यक्तित्व को सामने लाता है। धार्मिक अनुष्ठानों में अग्रणी रहते हैं। वह भी सिर्फ अपने लिए या अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरी कॉलोनीवासियों की सामूहिक भागीदारी के साथ आगे बढ़ते हैं।

दरअसल, समाजसेवा का अर्थ केवल बड़े आयोजनों में दिखाई देना नहीं है। किसी प्यासे पक्षी के लिए पानी रखना भी सेवा है, किसी जरूरतमंद के काम आना भी सेवा है और अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाने की चिंता करना भी सेवा है। मदन जी का जीवन इसी सहज सेवा-भाव का उदाहरण है।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने सेवा को अवसर नहीं, बल्कि आदत बनाया है। परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए समाज के लिए समय निकालना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने यह साबित किया है कि यदि मन में इच्छा हो तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती। उनकी सक्रियता नई पीढ़ी के लिए भी संदेश है कि जीवन के हर पड़ाव पर समाज के लिए कुछ न कुछ किया जा सकता है।

श्री मुकेश यादव : नौकरी के बाद भी समाज के लिए समय

श्री मुकेश यादव जी की कहानी उस सामान्य नागरिक की कहानी है, जो अपनी नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपने आसपास के लोगों की सुविधाओं के लिए भी लगातार प्रयास करता है। वे सेवानिवृत्ति के करीब हैं। उनका शैक्षणिक आधार कृषि विज्ञान से जुड़ा है। उन्होंने एसकेएन कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर से बी.एससी. (एग्रीकल्चर) की शिक्षा प्राप्त की है, जबकि एम.एससी. की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। वर्तमान में वे तकनीकी सहायक/तकनीकी अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

लेकिन मुकेश यादव जी की पहचान केवल उनकी नौकरी तक सीमित नहीं है। कार्यालय से लौटने के बाद जब अधिकांश लोग दिनभर की थकान उतारने के लिए आराम करना चाहते हैं, तब वे अपनी कॉलोनी के आसपास की समस्याओं पर ध्यान देते हैं। सफाई व्यवस्था, पार्क की देखभाल, सड़क और रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए वे लगातार सक्रिय रहते हैं।

उनकी सामाजिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण पक्ष विकास से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाना है। वर्ष 2017 में विकास समिति के पंजीकरण की प्रक्रिया में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वयं को उसके संस्थापक के रूप में जोड़ा। सड़कों और रोड लाइट जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए विभिन्न जनप्रतिनिधियों और संबंधित लोगों से संपर्क करना, समस्याओं को सामने रखना और उनके समाधान के लिए प्रयास करना उनके सामाजिक कार्यों का हिस्सा रहा है।

धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। मंदिर में धार्मिक आयोजनों और पाठ आदि में सहयोग से लेकर कॉलोनी में पार्क तथा अन्य सुविधाजनक स्थानों के विकास तक, उनका प्रयास रहा है कि सामुदायिक जीवन केवल घरों की चारदीवारी तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने वाले बेहतर सार्वजनिक स्थान भी उपलब्ध हों।

वर्ष 2018 से पौधरोपण और हरियाली को बढ़ावा देने के लिए भी वे प्रयासरत हैं। इसके लिए संबंधित उद्यान विभाग से पत्राचार और अन्य माध्यमों से लगातार प्रयास करना बताता है कि उनके लिए पर्यावरण केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा है। सफाई के लिए लोगों को प्रेरित करना भी इसी सोच का विस्तार है।

मुकेश यादव की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई एक काम नहीं, बल्कि लगातार काम करते रहने की उनकी आदत है। पद समाप्त हो सकता है, नौकरी समाप्त हो सकती है, लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदारी समाप्त नहीं होनी चाहिए—उनकी सक्रियता यही संदेश देती है।

श्री उमेश श्रृंगी : कानून की समझ के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी

श्री उमेश श्रृंगी जी पेशे से अधिवक्ता हैं और राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर में वकालत से जुड़े रहे हैं। उनका शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन अनुशासन, कानून की समझ और सामाजिक संपर्क से जुड़ा रहा है। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से एलएल.बी. की शिक्षा प्राप्त की तथा वर्ष 2000 में राजस्थान बार काउंसिल में नामांकन कराया।

लेकिन उमेश जी की पहचान केवल एक अधिवक्ता के रूप में करना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। कॉलोनी के विकास से जुड़े विषयों पर उनकी रुचि और भागीदारी निरंतर बनी रहती है। लोगों की समस्याओं को सुनना, उनके समाधान के लिए बातचीत करना और सामुदायिक गतिविधियों को व्यवस्थित रूप देना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है।

त्योहारों और राष्ट्रीय अवसरों पर कार्यक्रमों के आयोजन तथा संचालन में भी उमेश जी की भूमिका उल्लेखनीय रही है। ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन के अवसर नहीं होते; वे पड़ोस के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं और सामुदायिक भावना को मजबूत करते हैं। किसी कार्यक्रम की योजना बनाना, लोगों को जोड़ना, मंच का संचालन करना और पूरे आयोजन को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाना एक अलग तरह की सामाजिक जिम्मेदारी है, जिसे वे सहजता से निभाते हैं।

एक अधिवक्ता के रूप में कानून और व्यवस्था की समझ ने भी उनके सामाजिक व्यक्तित्व को एक विशेष दृष्टि दी है। समाज में किसी समस्या का समाधान केवल शिकायत करने से नहीं होता; उसके लिए संवाद, नियमों की जानकारी और उचित मंच तक बात पहुंचाने की आवश्यकता होती है। उमेश श्रृंगी जी की सक्रियता इसी व्यावहारिक सोच को दर्शाती है।

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उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि पेशेवर जीवन और सामाजिक जीवन अलग-अलग द्वीप नहीं हैं। यदि अपनी विशेषज्ञता और अनुभव का थोड़ा सा हिस्सा भी समाज के काम आ सके, तो वही वास्तविक सामाजिक योगदान है।

श्री रामस्वरूप जी : ज्ञान के विस्तार से समाजसेवा तक

श्री रामस्वरूप जी का व्यक्तित्व शिक्षा और सामाजिक सरोकारों का सुंदर मेल दिखाई देता है। उन्होंने राजनीति विज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र जैसे तीन महत्वपूर्ण विषयों में एम.ए. किया है। इन विषयों का अध्ययन अपने आप में समाज, राजनीति, इतिहास और मानवीय व्यवहार को समझने की एक व्यापक दृष्टि देता है। शायद यही कारण है कि उनकी रुचि भी किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उनके शौक में हर क्षेत्र में सामाजिक कार्य करना प्रमुख रूप से शामिल है।

राजनीति विज्ञान व्यक्ति को व्यवस्था को समझना सिखाता है, इतिहास समाज की यात्रा से परिचित कराता है और समाजशास्त्र मनुष्य तथा समुदाय के संबंधों को समझने की दृष्टि देता है। इन तीनों विषयों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति के लिए समाज को केवल दर्शक की तरह देखना संभव नहीं होता। रामस्वरूप जी की सामाजिक सक्रियता इसी व्यापक दृष्टिकोण से प्रेरित दिखाई देती है।

समाजसेवा का वास्तविक अर्थ भी यही है कि हम अपने आसपास की जरूरतों को समझें और अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दें। कभी किसी व्यक्ति की समस्या सुनना, कभी किसी सामाजिक गतिविधि में सहयोग करना, कभी लोगों को जोड़ना और कभी किसी अच्छे कार्य के लिए स्वयं आगे बढ़ना—सेवा के ये छोटे प्रयास मिलकर एक मजबूत सामाजिक वातावरण तैयार करते हैं।

रामस्वरूप जी की शिक्षा और सामाजिक रुचि उन्हें समाज को व्यापक दृष्टि से देखने की क्षमता देती है। उनका योगदान इस बात की याद दिलाता है कि पढ़ाई का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान का उपयोग समाज को बेहतर बनाने में करना भी है।

इन चारों की सेवा में छिपा है स्वतंत्रता दिवस का वास्तविक संदेश

इन चारों समाजसेवियों की कार्यशैली अलग है। किसी ने प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना को सेवा का माध्यम बनाया है, किसी ने कॉलोनी की सफाई, पार्क, सड़क और रोशनी जैसे मूलभूत विषयों को अपना दायित्व माना है, किसी ने अपने पेशेवर अनुभव और संगठन क्षमता को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ा है और किसी ने शिक्षा तथा व्यापक सामाजिक दृष्टि के माध्यम से सेवा को जीवन का हिस्सा बनाया है। लेकिन इन सभी में एक बात समान है—बिना किसी बड़े पद की अपेक्षा के समाज के लिए कुछ करने की इच्छा।

आज जब सामाजिक जीवन में कई बार सेवा भी प्रचार और प्रतिष्ठा से जोड़कर देखी जाने लगी है, ऐसे लोगों का योगदान और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ये लोग यह बताते हैं कि समाज को बदलने के लिए हमेशा बड़े मंच की आवश्यकता नहीं होती। अपने घर के बाहर की सफाई से शुरुआत की जा सकती है, एक पौधा लगाया जा सकता है, किसी पक्षी के लिए पानी रखा जा सकता है, पार्क को बेहतर बनाया जा सकता है, किसी जरूरतमंद की समस्या सुनी जा सकती है या लोगों को किसी अच्छे आयोजन में जोड़ा जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ऐसे नागरिकों को सम्मानित करने का सबसे सुंदर तरीका यही होगा कि उनके प्रयासों को पहचाना जाए और उनके उत्साह को आगे बढ़ाया जाए। क्योंकि समाज को केवल अधिकारों की बात करने वाले नागरिकों की नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को चुपचाप निभाने वाले नागरिकों की भी उतनी ही आवश्यकता है।

श्री मदन जी नामा, श्री मुकेश यादव, श्री उमेश श्रृंगी जी और श्री रामस्वरूप जी जैसे लोग अपने आसपास के समाज के लिए प्रेरणा हैं। इनकी सेवा शायद अखबारों की सुर्खियों में रोज न आती हो, लेकिन किसी साफ सड़क, किसी हरे-भरे पार्क, किसी सामाजिक आयोजन, किसी प्यासे पक्षी के पानी और किसी व्यक्ति की आसान हुई जिंदगी में इनके प्रयासों की छाप जरूर दिखाई देती है।

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आजादी का अर्थ केवल स्वतंत्र होकर जीना नहीं, बल्कि अपने समाज के प्रति जिम्मेदार होकर जीना भी है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने आसपास के पांच लोगों के जीवन को थोड़ा बेहतर बनाने का संकल्प ले ले, तो देश के विकास की तस्वीर अपने आप बदल सकती है।

यही इन समाजसेवियों की सबसे बड़ी सीख है—पद मिले या न मिले, पहचान बने या न बने, सेवा का रास्ता नहीं रुकना चाहिए। क्योंकि पद व्यक्ति को ऊंचाई देता है, लेकिन सेवा व्यक्ति को समाज के दिल में जगह देती है।

स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर इन चारों समाजसेवियों को नमन और शुभकामनाएं। ईश्वर उन्हें स्वस्थ, सक्रिय और दीर्घायु रखे, ताकि उनकी सेवा-यात्रा आगे भी समाज को प्रेरणा देती रहे और उनके प्रयासों से आने वाली पीढ़ियां यह सीख सकें कि अपने लिए तो हर कोई जीता है, लेकिन दूसरों के लिए जीने वाला जीवन ही वास्तव में सार्थक जीवन है।

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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