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दोस्ती ऐसी हो कि दोस्त कहे—“तू क्यों घबराता है, मैं हूँ ना!”

कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कल्पना आज के दौर में शायद मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव सी लगती है। वह दोस्ती किसी स्वार्थ, जरूरत या मतलब की जमीन पर खड़ी नहीं थी। वहां न अमीरी-गरीबी का फर्क था, न राजा और साधारण मित्र का अहसास। सुदामा के पास देने के लिए शायद कुछ नहीं था, फिर भी कृष्ण के लिए वह सबसे अनमोल थे। सुदामा ने कुछ मांगा नहीं, लेकिन कृष्ण ने बिना कहे ही अपने मित्र की जिंदगी की तकलीफें पढ़ लीं। यही तो दोस्ती है—जहां शब्दों की जरूरत कम और दिल की जरूरत ज्यादा होती है

आज जब हम मित्रता दिवस मना रहे हैं, सोशल मीडिया पर दोस्तों के साथ तस्वीरें साझा कर रहे हैं और एक-दूसरे को ‘हैप्पी फ्रेंडशिप डे’ कह रहे हैं, तब मन में एक सवाल जरूर उठता है—क्या हमारे जीवन में सचमुच ऐसा कोई दोस्त है, जिसके सामने हम अपने मन का दरवाजा पूरी तरह खोल सकें? ऐसा दोस्त जिसके सामने हमें अपनी कमजोरी छिपाने की जरूरत न पड़े, जिसके सामने हम रो सकें, अपनी असफलता स्वीकार कर सकें और अपनी परेशानी बता सकें।

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शायद हर किसी के पास इसका जवाब ‘हां’ नहीं होगा।

दोस्त बहुत हैं, लेकिन अपना कौन है?

आज हमारे मोबाइल में सैकड़ों, हजारों कॉन्टैक्ट हैं। सोशल मीडिया पर मित्रों की लंबी सूची है। जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने वाले बहुत हैं, तस्वीर पर लाइक करने वाले बहुत हैं और सफलता पर बधाई देने वाले भी बहुत मिल जाएंगे। लेकिन जब जिंदगी अचानक किसी मोड़ पर हमें अकेला छोड़ देती है, तब पता चलता है कि इन हजारों चेहरों में अपना कौन है।

मुश्किल समय दोस्ती की असली परीक्षा होता है। खुशी में तो पूरा जमाना साथ खड़ा हो जाता है, लेकिन दुख में जो चुपचाप आपके पास बैठ जाए, वही अपना है। जो आपकी बात सुनने के लिए अपना जरूरी काम रोक दे, वही अपना है। जो आपकी परेशानी सुनकर तुरंत सलाह देने के बजाय पहले पूछे—“बता, क्या हुआ?”—वही दोस्त है।

और शायद सबसे बड़ा दोस्त वह है जिसके सामने आपको अपने शब्दों को तौलना न पड़े। आप उससे कह सकें—“मैं परेशान हूं।” आप स्वीकार कर सकें कि आज आप कमजोर पड़ गए हैं। आप अपनी असफलता, आर्थिक परेशानी या जिंदगी की कोई ऐसी बात भी साझा कर सकें जिसे दुनिया से छिपाकर रखा है। और सामने से आवाज आए—“तू क्यों घबराता है, मैं हूं ना।”

कितना छोटा सा वाक्य है—“मैं हूं ना।” लेकिन जिंदगी में कभी-कभी यही चार शब्द किसी टूटे हुए इंसान को फिर से खड़ा कर देते हैं।

दोस्ती का मतलब हर वक्त साथ घूमना, पार्टी करना या रोज बात करना नहीं है। कुछ दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे महीनों बात नहीं होती, लेकिन जब बात होती है तो लगता है जैसे कल ही मिले थे। सच्चा दोस्त आपकी जिंदगी की भीड़ में मौजूद रहने वाला चेहरा नहीं, आपकी तन्हाई में याद आने वाला भरोसा होता है।

जब दोस्ती में पैसा घुस जाता है

बदलते समय ने दोस्ती की इस खूबसूरत परिभाषा को भी बहुत कुछ बदल दिया है। आज रिश्तों का एक बड़ा हिस्सा कहीं न कहीं आर्थिक हैसियत, लाभ और जरूरत से प्रभावित होता दिखाई देता है। पैसा बुरा नहीं है, लेकिन जब पैसा रिश्तों से बड़ा हो जाए तो खतरा शुरू होता है।

हाल के वर्षों में ऐसी खबरें भी सामने आती रही हैं, जब पैसों या संपत्ति के लालच में बेहद करीबी रिश्तों तक ने खून का रूप ले लिया। कहीं दोस्त ने दोस्त को धोखा दिया, कहीं बचपन के साथी ने ही अपने मित्र की जान ले ली। ऐसी खबरें केवल अपराध की खबरें नहीं होतीं, वे हमारे भीतर बैठे उस विश्वास को भी झकझोर देती हैं कि जिसे हम अपना समझते हैं, क्या वह वास्तव में अपना है?

सोचिए, जिस दोस्त के साथ बचपन की गलियां साझा की हों, जिसके साथ स्कूल की बेंच पर बैठे हों, जिसके साथ बिना पैसे के चाय पीकर भी घंटों हंसे हों, अगर वही दोस्त किसी दिन पैसों के लिए दुश्मन बन जाए तो इससे ज्यादा भयावह क्या होगा?

यह सवाल केवल उस अपराधी से नहीं है। यह सवाल हम सब से भी है—हमने दोस्ती को आखिर कितना बचाकर रखा है?

आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि जिंदगी में सफल कैसे होना है। उन्हें यह भी सिखाएं कि अच्छा इंसान और अच्छा दोस्त कैसे बनना है। उन्हें बताएं कि हर संबंध का हिसाब पैसे में नहीं लगाया जाता। कुछ रिश्ते बैंक बैलेंस से नहीं, विश्वास से समृद्ध होते हैं।

दोस्ती में बराबरी पैसे से नहीं आती। कृष्ण और सुदामा के बीच जो बराबरी थी, वह दिल की बराबरी थी।

एक ऐसा दोस्त जरूर बचाकर रखिए

हमारी जिंदगी में दोस्त कम हों, लेकिन ऐसे हों जिनके सामने हम अपने होने का अभिनय न करें। ऐसे दोस्त जिनसे बात करने के लिए हमें कोई खास अवसर या बहाना न चाहिए। ऐसे दोस्त जिनसे यह कहने में शर्म न आए कि—“आज मैं ठीक नहीं हूं।”

और केवल ऐसा दोस्त तलाशना ही काफी नहीं है। हमें खुद भी किसी का वैसा दोस्त बनना होगा।

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किसी की परेशानी में उसके साथ खड़े होना होगा। उसकी सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय दिल से खुश होना होगा। उसके राज को राज रखना होगा। उसकी गैरमौजूदगी में उसकी इज्जत बचानी होगी। और सबसे जरूरी—उसके कमजोर समय का फायदा कभी नहीं उठाना होगा।

क्योंकि दोस्ती की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि दोस्त आपकी कमजोरियों का संग्रह नहीं करता, वह आपकी कमजोरियों की हिफाजत करता है।

कभी-कभी दोस्त के पास आपकी समस्या का समाधान नहीं होता। वह आपके लिए पैसा नहीं जुटा सकता, आपकी बीमारी ठीक नहीं कर सकता, आपकी नौकरी वापस नहीं ला सकता या आपके टूटे रिश्ते को जोड़ नहीं सकता। लेकिन वह आपके पास बैठ सकता है। आपका हाथ पकड़ सकता है। आपकी बात सुन सकता है। और कह सकता है—“चिंता मत कर, रास्ता निकल जाएगा।”

यकीन मानिए, कई बार इंसान को समाधान से ज्यादा साथ की जरूरत होती है।

मित्रता दिवस केवल पुराने दोस्तों को याद करने का दिन नहीं होना चाहिए। यह अपने भीतर झांकने का दिन भी होना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि हमने कितने दोस्तों को सिर्फ इसलिए खो दिया क्योंकि हमारे अहंकार ने हमें पहले फोन करने से रोक दिया। कितने रिश्ते केवल इसलिए दूर हो गए क्योंकि हमने ‘सॉरी’ कहने को अपनी हार समझ लिया। कितने दोस्त हमारी जिंदगी से इसलिए निकल गए क्योंकि हम उनकी जरूरत के समय उनके साथ नहीं थे।

समय बहुत तेजी से बदल रहा है। जिंदगी की रफ्तार बढ़ती जा रही है। लोग सफल हो रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं, बड़े घर बना रहे हैं, लेकिन भीतर कहीं अकेले भी होते जा रहे हैं। ऐसे समय में यदि आपके पास एक भी ऐसा दोस्त है जिसके सामने आप अपने दिल की बात कह सकते हैं, तो समझिए आप बहुत अमीर हैं।

उसे संभालकर रखिए।

उससे कभी-कभी बिना किसी काम के फोन करिए। पूछिए—“कैसा है तू?” उसकी बात सुनिए। उसकी खुशियों में शामिल होइए। उसके दुख में उसके साथ बैठिए। और अगर कभी वह जिंदगी से हारता हुआ दिखाई दे तो उसके कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कह दीजिए—“तू क्यों घबराता है, मैं हूं ना।”

शायद दोस्ती के लिए इससे बड़ी कोई दौलत नहीं।

कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता हर किसी के हिस्से में आए, यह संभव नहीं। लेकिन हम अपने जीवन में किसी एक इंसान के लिए कृष्ण और किसी एक के लिए सुदामा तो बन ही सकते हैं। दोस्ती का असली अर्थ भी शायद यही है—जहां लेने से ज्यादा देने की खुशी हो, दिखावे से ज्यादा अपनापन हो, शब्दों से ज्यादा विश्वास हो और स्वार्थ से ऊपर इंसान हो।

इस मित्रता दिवस पर आइए, दोस्तों की संख्या बढ़ाने के बजाय दोस्ती की गहराई बढ़ाने का संकल्प लें।

क्योंकि जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर शायद हमें यह याद नहीं रहेगा कि हमारे पास कितने पैसे थे, कितनी बड़ी गाड़ी थी या सोशल मीडिया पर कितने दोस्त थे। याद आएगा तो बस वह एक दोस्त, जिसने जिंदगी के सबसे मुश्किल मोड़ पर हमारा हाथ थामकर कहा था—

“डर मत… मैं हूं ना!”

और सच कहें तो जिंदगी में इससे बड़ी दौलत शायद कोई नहीं।

✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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