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ललित निबंध-“साहित्यिक पत्रकारिता की शब्द-संस्कृति”

1905 के आसपास प्रयाग से जब ‘सरस्वती’ के नए अंक प्रकाशित होकर आते थे , तो साहित्य में रुचि रखने वाले अनेक पाठक उसकी प्रतीक्षा उसी उत्सुकता से करते थे, जैसे किसान पहली वर्षा की प्रतीक्षा करता है।
वह पत्रिका भाषा का संस्कार, विचार का अनुशासन और समाज का नया बोध लेकर आती थी। वर्षों बाद यही दृश्य ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘हंस’ और ‘दिनमान’ के पाठकों में भी दिखाई दिया। इससे स्पष्ट है कि साहित्यिक पत्रकारिता कभी केवल छपे हुए पन्नों का संसार मात्र नहीं रही, वह समाज की बौद्धिक चेतना का उत्सव रही है।
जब-जब समय ने दिशा खोई, साहित्यिक पत्रकारिता ने शब्दों का दीपक जलाकर उसे मार्ग दिखाया।

साहित्यिक पत्रकारिता में दो तेजस्वी व्यक्तित्व महावीरप्रसाद द्विवेदी और धर्मवीर भारती मील के दिशा दर्शन कराते महान व्यक्तित्व हैं। एक ने साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा को संस्कार दिया, दूसरे ने उसे जन-जन तक पहुँचाया।
साहित्यिक पत्रकारिता भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना का वह जीवंत दस्तावेज़ है, जिसमें युग की धड़कनें, मनुष्य की संवेदनाएँ और भाषा का सौंदर्य एक साथ स्पंदित होते हैं।

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पत्रकारिता का मूल धर्म , समाज को सत्य और समय की जानकारी देना होता है। किंतु साहित्यिक पत्रकारिता का दायित्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। वह केवल घटनाओं का वृत्तांत नहीं लिखती, बल्कि उनके भीतर छिपे अर्थ को उद्घाटित भी करती है। वह समाज की स्मृतियों को संजोती है, संस्कृति के क्षरण पर प्रश्न उठाती है और भाषा को मात्र संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संवेदना का संस्कार मानती है। यही कारण है कि साहित्यिक पत्रकारिता समाचार से अधिक विचार और सूचना से अधिक चेतना का क्षेत्र है।

हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता का विधिवत् आरंभ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। उन्होंने ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चन्द्र मैगज़ीन’ तथा ‘बालबोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्य को राष्ट्रीय जागरण का स्वर बनाया। यह वह समय था जब भारत सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संक्रमण से गुजर रहा था। भारतेन्दु ने पत्रकारिता को जनचेतना का माध्यम बनाया और साहित्य को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा। इसलिए उन्हें केवल आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक ही नहीं, हिंदी पत्रकारिता का भी महत्वपूर्ण शिल्पी माना जाता है।

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इस परंपरा को सुव्यवस्थित आधार महावीरप्रसाद द्विवेदी ने प्रदान किया। सन् 1903 से 1920 तक ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादन ने हिंदी साहित्य का स्वरूप ही बदल दिया। भाषा में शुद्धता, विचार में अनुशासन और साहित्य में सामाजिक उत्तरदायित्व, ये तीनों गुण द्विवेदी जी की संपादकीय दृष्टि की देन हैं। मैथिलीशरण गुप्त, रामचन्द्र शुक्ल, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ तथा अनेक साहित्यकारों को उन्होंने मंच दिया। यह संयोग नहीं कि हिंदी साहित्य का एक संपूर्ण कालखंड ‘द्विवेदी युग’ कहलाता है , वस्तुतः वह साहित्यिक पत्रकारिता के प्रभाव का ही ऐतिहासिक दस्तावेज है।

बीसवीं शताब्दी के मध्य में साहित्यिक पत्रकारिता ने नए विचारों का स्वागत किया। अज्ञेय ने ‘प्रतीक’ और बाद में ‘दिनमान’ के माध्यम से आधुनिक चेतना, बौद्धिक स्वतंत्रता और प्रयोगशीलता को प्रतिष्ठित किया।
धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’ को लोकप्रियता और गुणवत्ता का अद्भुत संगम बना दिया। उनके संपादन में साहित्य केवल पुस्तकालयों की वस्तु नहीं रहा ,वह परिवारों की बैठक तक पहुँचा।
कविता, कहानी, यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण, चित्रकला और सामाजिक विमर्श, सब एक ही मंच पर सजीव दिखाई देने लगे। उन्होंने सिद्ध किया कि उत्कृष्ट साहित्य और व्यापक पाठक-वर्ग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि अनुपूरक हैं।

इसके बाद कमलेश्वर ने ‘सारिका’ और राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को नए विमर्शों की दिशा दी। स्त्री-अस्मिता, दलित चेतना, हाशिए के समाज, बदलते सामाजिक संबंध और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर बहसें प्रारंभ हुईं। साहित्य पहली बार समाज के उन कोनों तक पहुँचा, जहाँ पहले उसकी दृष्टि कम ही गई थी। यही साहित्यिक पत्रकारिता की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसने समय के मौन को सार्थक शब्द दिए।

वस्तुतः साहित्यिक पत्रकारिता केवल रचनाओं का प्रकाशन नहीं करती ,वह साहित्यिक आंदोलनों की वाहक होती है। छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नई कहानी और उत्तर आधुनिक विमर्श, इन सभी धाराओं को मान्य प्रतिष्ठा, साहित्यिक पत्रिकाओं ने ही दी। यदि ‘सरस्वती’, ‘कल्पना’, ‘प्रतीक’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’, ‘हंस’, ‘पूर्वग्रह’ और ‘पहल’ जैसी पत्रिकाएँ न होतीं, तो संभवतः हिंदी साहित्य का विकास इतना व्यापक और बहुआयामी न हुआ होता।

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आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। सूचना की दुनिया डिजिटल हो गई है। समाचार अब क्षणों में विश्वभर में पहुँच जाता है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, परंतु इसी के साथ विचार की गंभीरता और भाषा की गरिमा पर भी संकट उत्पन्न हुआ है। तात्कालिकता ने धैर्य को पीछे छोड़ दिया है। पढ़ने की संस्कृति सिकुड़ रही है। समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान लगातार कम हो रहा है। भाषा में कृत्रिम आकर्षण और बाज़ार की चकाचौंध बढ़ रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि शब्दों के अर्थ से अधिक उनके प्रदर्शन का महत्व हो गया है। जेन जी ने नया भाषाई परिदृश्य बनाया है।

किन्तु इतिहास साक्षी है कि साहित्य कभी बाज़ार की शर्तों पर जीवित नहीं रहा। उसने हर युग में अपने लिए नए रास्ते बनाए हैं। आज भी अनेक ई-पत्रिकाएँ, डिजिटल मंच, साहित्यिक ब्लॉग और पॉडकास्ट साहित्यिक पत्रकारिता को नई ऊर्जा दे रहे हैं। छोटे नगरों और गाँवों के लेखक बिना किसी बड़े प्रकाशक की प्रतीक्षा किए सीधे पाठकों तक पहुँच रहे हैं। माध्यम बदला है, पर शब्दों की गरिमा अब भी वही है।

साहित्यिक पत्रकारिता का भविष्य किसी तकनीक पर नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदना पर निर्भर करता है। जब तक मनुष्य प्रश्न करेगा, अन्याय पर विचलित होगा, सौंदर्य से प्रभावित होगा , कारुणिक भाव पर उसके आँसू निकलेंगे और भाषा में अपने अनुभवों को सुरक्षित रखना चाहेगा, तब तक साहित्यिक पत्रकारिता जीवित रहेगी।
उसका स्वरूप बदल सकता है, माध्यम बदल सकते हैं, किंतु उसका मूल उद्देश्य समाज के विवेक को जागृत रखना ही बना रहेगा ।

आज आवश्यकता इस बात की है कि साहित्यिक पत्रकारिता परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु बने। वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पर्यावरण, वैश्वीकरण, सांस्कृतिक अस्मिता, भाषायी संकट और मानवीय मूल्यों जैसे समकालीन प्रश्नों पर साहित्यिक दृष्टि विकसित करे। तभी वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए उतनी ही प्रासंगिक होगी, जितनी कभी ‘सरस्वती’ और ‘धर्मयुग’ अपने समय में थीं।

अंततः साहित्यिक पत्रकारिता ,नदी के उस निर्मल प्रवाह जैसी प्रतीत होती है, जो अपने पथ में आने वाली हर चट्टान को धैर्य से छूते हुए आगे बढ़ जाती है। उसका उद्देश्य शोर मचाना नहीं, जीवन को सींचना है। समय बदलता रहेगा, माध्यम बदलते रहेंगे, पर जो शब्द मनुष्य के भीतर विचार, करुणा और साहस का दीप जलाते हैं, वे कभी अप्रासंगिक नहीं होते। साहित्यिक पत्रकारिता उन्हीं शब्दों की साधना है। संस्कृति की स्मृति, समाज का विवेक और मनुष्यता की सबसे विश्वसनीय आवाज़ है।

✍️लेखक – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

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