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­­शरणार्थी शिविर से संयुक्त राष्ट्र तक… फिर राष्ट्रसेवा के शिखर तक—हरदीप सिंह पुरी की वह यात्रा जो हार मानना नहीं सिखाती!

कुछ जीवन केवल सफलता की कहानी नहीं होते, वे संघर्ष से संकल्प तक पहुंचने की पूरी पाठशाला होते हैं।
श्री हरदीप सिंह पुरी का जीवन भी ऐसी ही एक यात्रा है—जहाँ विभाजन की पीड़ा से शुरू हुई कहानी शिक्षा, अनुशासन, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और अंततः सार्वजनिक जीवन में सेवा के एक लंबे अध्याय में बदलती दिखाई देती है।

15 फरवरी 1952 को दिल्ली के दरियागंज में जन्मे हरदीप सिंह पुरी ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जिसने देश के विभाजन का दर्द बहुत करीब से देखा था। उनके माता-पिता, सरदार भगत सिंह पुरी और सरदारनी कुंदन पुरी, विभाजन के बाद लाहौर से भारत आए और शुरुआती दिनों में शरणार्थी शिविर में रहकर जीवन को फिर से खड़ा किया। एक ऐसा परिवार, जिसके सामने सब कुछ दोबारा शुरू करने की चुनौती थी, उसने अपने बच्चों को सबसे बड़ी पूंजी के रूप में शिक्षा दी।

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यही शायद इस जीवन-कथा का पहला बड़ा संदेश है—परिस्थितियां मनुष्य की शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन उसका भविष्य नहीं।

पिता के राजनयिक जीवन के कारण बचपन के कुछ वर्ष जर्मनी के बॉन और किशोरावस्था का एक हिस्सा ब्रिटेन के बर्मिंघम में बीता। वहीं दूसरी ओर भारत में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा की सुविधा न होने पर उन्होंने दिल्ली सहित विभिन्न स्थानों पर बोर्डिंग स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की। अलग-अलग संस्कृतियों और समाजों को करीब से देखने का यह अनुभव आगे चलकर उनके व्यक्तित्व में व्यापक दृष्टि का आधार बना।

लेकिन इस कहानी की खूबसूरती यह है कि विदेशों में रहने का अनुभव उन्हें अपनी जड़ों से दूर नहीं ले गया। बल्कि भारत को बाहर से देखने और दुनिया को भारत की दृष्टि से समझने का अवसर मिला। यही दृष्टि आगे चलकर उनके राजनयिक जीवन की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी।

शिक्षा से नेतृत्व तकजब किताबों के बीच आकार लेने लगा व्यक्तित्व

हरदीप सिंह पुरी की कहानी में शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं रही। वह उनके व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला बनी।

उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से इतिहास में बीए ऑनर्स और उसके बाद एमए किया। कॉलेज के दिनों में ही उनके भीतर नेतृत्व और संवाद की क्षमता दिखाई देने लगी। वे हिंदू कॉलेज संसद के प्रधानमंत्री चुने गए और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी सक्रिय रहे। उनकी वक्तृत्व क्षमता ने उन्हें छात्र जीवन में ही अलग पहचान दी।

शायद यही वह समय था जब उनके भीतर दो महत्वपूर्ण गुण एक साथ विकसित हुए—इतिहास को समझने की दृष्टि और वर्तमान को प्रभावित करने का साहस।

शिक्षा पूरी करने के बाद वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास के व्याख्याता भी रहे। अध्यापन के दौरान भी छात्र राजनीति और सार्वजनिक जीवन के प्रति उनकी रुचि बनी रही। यह अनुभव बाद में उनके राजनयिक और राजनीतिक जीवन में संवाद की क्षमता का आधार बना। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने के लिए केवल उसके पदों को देखना पर्याप्त नहीं होता। यह देखना भी जरूरी है कि उसने अपनी यात्रा की शुरुआत किस सोच के साथ की थी। हरदीप पुरी के मामले में शिक्षा, इतिहास, बहस और सार्वजनिक संवाद ने आगे की राह तैयार की।

उनके जीवन में आगे आने वाला भारतीय विदेश सेवा का अध्याय इसी तैयारी का स्वाभाविक विस्तार था।

कूटनीति के कठिन गलियारों से दुनिया के सबसे बड़े मंच तक

1974 में भारतीय विदेश सेवा में प्रवेश के साथ हरदीप सिंह पुरी की जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ। लगभग 39 वर्षों तक उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। टोक्यो और कोलंबो से लेकर लंदन, जिनेवा, ब्राजील और न्यूयॉर्क तक की उनकी राजनयिक यात्रा केवल भौगोलिक विस्तार नहीं थी; यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं को समझने की लंबी प्रक्रिया कोलंबो में प्रथम सचिव के रूप में उनका कार्यकाल विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। 1987 में उन्होंने श्रीलंका के जाफना क्षेत्र में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के प्रमुख वी. प्रभाकरण से मुलाकात की और नई दिल्ली के साथ बातचीत के लिए उन्हें तैयार करने की कोशिश की। इसके बाद भारत-श्रीलंका समझौते की दिशा में घटनाक्रम आगे बढ़ा। कूटनीति का संसार दूर से जितना चमकदार दिखाई देता है, उसके भीतर उतना ही धैर्य, संयम और जटिल परिस्थितियों को समझने की क्षमता चाहिए होती है। यहां शब्द केवल शब्द नहीं होते। एक वाक्य संबंध बना सकता है और एक गलत शब्द तनाव पैदा कर सकता है।

हरदीप पुरी का राजनयिक अनुभव आगे बढ़ता गया। रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में उनकी नियुक्ति भी उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। वे ऐसे पद पर पहुंचे जहाँ विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच के संबंधों को नजदीक से समझने का अवसर मिला।

1999 से 2002 तक ब्रिटेन में भारत के उप उच्चायुक्त के रूप में उन्होंने राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को व्यापक बनाने पर काम किया। उनके आधिकारिक जीवन-वृत्त के अनुसार, उन्होंने ब्रिटेन के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच ‘Friends of India’ समूहों की स्थापना को बढ़ावा दिया और द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को विभिन्न क्षेत्रों तक विस्तारित करने के प्रयास किए।

लेकिन उनकी अंतरराष्ट्रीय यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय संयुक्त राष्ट्र से जुड़ा रहा।

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में और बाद में न्यूयॉर्क में भारत के स्थायी प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने बहुपक्षीय कूटनीति में भारत की भूमिका निभाई। उन्होंने व्यापार वार्ताओं, मानवाधिकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर काम किया। 2009 से 2013 के बीच संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अगस्त 2011 में वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष बने और 2011-12 में आतंकवाद निरोधी समिति की अध्यक्षता भी की। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं थी। यह उस भारतीय राजनयिक की यात्रा का परिणाम थी, जिसने वर्षों तक दुनिया के अलग-अलग मंचों पर भारत की बात रखने की जिम्मेदारी निभाई थी।

और यहां उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—ऊंचे पद तक पहुंचने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस पद की जिम्मेदारी को समझना होता है।

कूटनीति से राजनीति तकसेवा का बदला मंच, संकल्प नहीं

2013 में भारतीय विदेश सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की ओर से संवाद करने वाले हरदीप सिंह पुरी ने सार्वजनिक राजनीति का रास्ता चुना। 2014 में वे औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। यह परिवर्तन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि कूटनीति और चुनावी राजनीति की कार्यशैली एक जैसी नहीं होती। राजनयिक के रूप में जहां पर्दे के पीछे बातचीत, धैर्य और संतुलन की भूमिका बड़ी होती है, वहीं राजनीति में जनता के बीच रहकर अपने विचारों और कार्यों के लिए जवाबदेही का सामना करना पड़ता है।

सितंबर 2017 में उन्हें आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। इसके बाद उन्हें नागरिक उड्डयन तथा वाणिज्य और उद्योग से संबंधित अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी मिलीं। 2020 में वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए। जुलाई 2021 में उन्हें केंद्रीय मंत्री के रूप में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस तथा आवास और शहरी मामलों की जिम्मेदारी मिली। 2024 में नई सरकार के गठन के बाद उन्होंने फिर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। यहां एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—उनकी सार्वजनिक भूमिका का दायरा केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। शहरी विकास, आवास, नागरिक उड्डयन और ऊर्जा जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारियों ने उनके प्रशासनिक अनुभव को व्यापक बनाया।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे रणनीतिक क्षेत्र में उनकी भूमिका विशेष महत्व रखती है, क्योंकि ऊर्जा केवल ईंधन का विषय नहीं है। ऊर्जा का संबंध उद्योग, परिवहन, घरेलू जीवन, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।

2024 में मंत्रालय का कार्यभार संभालते हुए उन्होंने भारत की ऊर्जा उपलब्धता, सामर्थ्य और टिकाऊ विकास से जुड़ी चुनौतियों पर जोर दिया। मंत्रालय से संबंधित सरकारी दस्तावेजों में प्राकृतिक गैस के विस्तार, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण जैसे विषयों पर उनके वक्तव्यों और पहलों को दर्ज किया गया है। प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में गैस-आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के विस्तार और ऊर्जा क्षेत्र में तकनीक तथा नवाचार के उपयोग जैसे मुद्दे भी उनके सार्वजनिक कार्यक्षेत्र का हिस्सा रहे हैं। इस पूरी यात्रा को देखें तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—भूमिका बदलती रही, लेकिन सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने की दिशा बनी रही।

चढ़दी कलाकी सोचजब सफलता केवल पद नहीं, दृष्टि बन जाती है

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हरदीप सिंह पुरी के व्यक्तित्व को केवल राजनयिक और राजनेता के रूप में देखना उनकी कहानी को अधूरा समझना होगा। उनके जीवन में पारिवारिक संस्कार और सिख परंपरा से जुड़े मूल्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उनके आधिकारिक जीवन-वृत्त में समानता, सेवा, समावेशिता और ‘चढ़दी कला’ की भावना को उनके जीवन-मूल्यों से जोड़ा गया है। ‘नाम जपो’, ‘कीरत करो’ और ‘वंड छको’ जैसे सिद्धांतों को वे जीवन की दिशा से जोड़ते हैं। चढ़दी कलाका भाव कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मकता और आगे बढ़ते रहने की मानसिकता से जुड़ा है। शायद यही कारण है कि उनके जीवन की शुरुआत और वर्तमान के बीच जितना अंतर दिखाई देता है, उतना ही स्पष्ट उनके भीतर संघर्ष से सीखने का भाव भी दिखाई देता है।

एक शरणार्थी परिवार में जन्म लेना किसी व्यक्ति की नियति नहीं बन गया। वह जीवन की शुरुआत थी।

दिल्ली के एक परिवार से निकलकर दुनिया के विभिन्न देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करना, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करना और फिर भारत सरकार में मंत्री के रूप में जिम्मेदारियां संभालना—यह यात्रा बताती है कि जीवन में शुरुआती कठिनाइयां अंतिम परिचय नहीं होतीं।

उनका पारिवारिक जीवन भी सार्वजनिक जीवन की इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी पत्नी लक्ष्मी एम. पुरी भी भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी रही हैं और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुकी हैं। परिवार के भीतर दो राजनयिकों की यह यात्रा अपने आप में उस वातावरण को दर्शाती है जिसमें सार्वजनिक सेवा, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि साथ-साथ विकसित हुई।

हरदीप पुरी की पहचान का एक और पहलू उनका लेखन है। वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर पुस्तकें लिख चुके हैं। ‘Perilous Interventions: The Security Council and the Politics of Chaos’, ‘Delusional Politics: Back To The Future’ और ‘Separating the Wheat from the Chaff: Decoding Dominant Narratives’ उनके प्रकाशित कार्यों में शामिल हैं। लेखन और वक्तृत्व उनके व्यक्तित्व के ऐसे हिस्से हैं, जिनमें उनके राजनयिक अनुभव, इतिहास की समझ और सार्वजनिक संवाद का अनुभव एक साथ दिखाई देता है।

एक जीवन, कई पड़ाव और एक बड़ा संदेशशुरुआत जहां भी हो, मंजिल तय नहीं होती

हरदीप सिंह पुरी की जीवन-यात्रा को अगर एक वाक्य में समझना हो तो शायद वह होगा—संघर्ष को अपनी पहचान मत बनने दीजिए, उसे अपनी ताकत बनाइए।

विभाजन के बाद विस्थापन का दर्द झेल चुके परिवार से शुरुआत।
फिर शिक्षा।
छात्र जीवन में नेतृत्व।
अध्यापन।
भारतीय विदेश सेवा।
दुनिया के अलग-अलग देशों में भारत का प्रतिनिधित्व।
संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च कूटनीतिक मंच।
और अंततः भारतीय राजनीति तथा केंद्रीय मंत्रिमंडल में जिम्मेदारी।

यह क्रम किसी एक दिन में नहीं बना। इसके पीछे दशकों का अनुशासन, अध्ययन, अनुभव और निरंतर काम था।

उनकी कहानी युवाओं को यह संदेश देती है कि सफलता को केवल किसी पद, पुरस्कार या प्रतिष्ठा के रूप में नहीं देखना चाहिए। सफलता का असली अर्थ है—हर अगले अवसर के लिए खुद को तैयार रखना।

कई बार जिंदगी हमें ऐसी जगह से शुरुआत कराती है जहां हमारे पास बहुत कम होता है। लेकिन अगर सीखने की इच्छा बची रहे, मेहनत की आदत बनी रहे और परिस्थितियों के सामने उम्मीद खत्म न हो, तो वही छोटी शुरुआत आगे चलकर बड़ी कहानी बन सकती है।

हरदीप सिंह पुरी का जीवन इसी विचार का एक उदाहरण है।

उनकी यात्रा यह भी बताती है कि सार्वजनिक जीवन में अनुभव की कोई सीमा नहीं होती। एक राजनयिक का अनुभव बाद में प्रशासनिक काम में काम आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों की समझ ऊर्जा नीति में उपयोगी हो सकती है। इतिहास का अध्ययन वर्तमान को देखने की दृष्टि दे सकता है। और छात्र जीवन में विकसित संवाद की क्षमता दशकों बाद भी सार्वजनिक जीवन में उपयोगी रह सकती है।

यानी जीवन में सीखी गई कोई भी बात व्यर्थ नहीं जाती—वह किसी किसी अगले पड़ाव पर हमारी ताकत बनकर लौटती है।

आज जब युवा पीढ़ी सफलता को अक्सर बहुत जल्दी हासिल करना चाहती है, तब ऐसी जीवन यात्राएं धैर्य का महत्व समझाती हैं। हर उपलब्धि के पीछे वर्षों की तैयारी छिपी होती है। हर बड़े पद के पीछे अनेक छोटे-छोटे अनुभव होते हैं। और हर सार्वजनिक पहचान के पीछे एक लंबा निजी संघर्ष भी होता है, जिसे दुनिया अक्सर देख नहीं पाती।

श्री हरदीप सिंह पुरी की कहानी का सबसे प्रेरक पक्ष यही है कि उनकी यात्रा किसी एक क्षेत्र की सफलता तक सीमित नहीं रही। शिक्षा से कूटनीति, कूटनीति से वैश्विक नेतृत्व और वहां से सार्वजनिक राजनीति तक—हर पड़ाव ने अगले पड़ाव की जमीन तैयार की।

यही जीवन का सबसे बड़ा पाठ हैरास्ता बदल सकता है, भूमिका बदल सकती है, परिस्थितियां बदल सकती हैं; लेकिन यदि सीखने और आगे बढ़ने की इच्छा बनी रहे, तो यात्रा कभी रुकती नहीं।

एक शरणार्थी परिवार की स्मृतियों से शुरू हुई यह यात्रा आज भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री की जिम्मेदारी तक पहुंची है। इसीलिए हरदीप सिंह पुरी की कहानी केवल एक राजनेता की जीवनी नहीं, बल्कि संघर्ष, शिक्षा, अनुशासन, अनुभव और निरंतर आगे बढ़ते रहने की कहानी है।

और शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत सीख यही है—

जीवन आपको कहां से शुरू करता है, यह हमेशा आपके हाथ में नहीं होता; लेकिन उस शुरुआत को आप कहां तक ले जाते हैं, उसमें आपकी मेहनत, आपका अनुशासन और आपका संकल्प बहुत मायने रखता है।

यही वह सोच है जो एक साधारण शुरुआत को असाधारण यात्रा में बदल सकती है।

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✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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