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सरकार बदली, पीड़ा नहीं: डीटीसी पेंशनर्स की कराहती ज़िंदगी और सत्ता से सीधा सवाल

सरकारें बदलती रहीं, चेहरे बदले, दावे और वादे भी नए होते गए—लेकिन दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के पेंशनर्स की ज़िंदगी जस की तस बनी हुई है। सत्ता बदले एक वर्ष हो चुका है, पर जिन बुजुर्गों ने पूरी उम्र ईमानदारी से दिल्ली की सेवा की, उनकी पीड़ा आज भी अनसुनी है।

डीटीसी पेंशनर्स से जुड़ा दृश्य

सरकार बदली, हालात क्यों नहीं बदले?

दिल्ली की सत्ता बदली है। विपक्ष में रहते हुए जिन आश्वासनों से उम्मीदें जगाई गई थीं, सत्ता में आने के बाद वे ज़मीन पर उतरती नहीं दिख रहीं। नए चेहरे, नई सरकार और “सुशासन” के दावों के बावजूद डीटीसी के सेवानिवृत्त कर्मचारी आज भी उसी अपमान और अनिश्चितता के साथ जीने को मजबूर हैं। उनके लिए सरकार बदली है, हालात नहीं।

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बीस हजार पेंशनर्स और अनदेखी पीड़ा

डीटीसी के लगभग बीस हजार से अधिक पेंशनर्स—जिनमें बड़ी संख्या में विधवाएं भी शामिल हैं—आज अपने ही अधिकार के लिए सड़कों पर हैं। किसी ने ड्राइवर बनकर भीषण गर्मी, सर्दी और प्रदूषण में बस चलाई, किसी ने कंडक्टर के रूप में रोज़ यात्रियों से जूझते हुए ईमानदारी से काम किया, तो किसी ने वर्कशॉप और दफ्तरों में निगम को संभाले रखा। आज वही लोग अपने बुढ़ापे में पेंशन की एक-एक किश्त के लिए आंदोलन करने को मजबूर हैं। हाईकोर्ट का आदेश और सरकारी उदासीनता। यह कोई नई समस्या नहीं है। केजरीवाल सरकार के समय भी डीटीसी पेंशनर्स को लंबा संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि डीटीसी के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को हर महीने की पहली तारीख को पेंशन दी जाए। अदालत ने यह भी माना कि पेंशन में देरी बुजुर्गों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कुछ समय तक आदेश का पालन हुआ, लेकिन आज स्थिति फिर वहीं पहुंच चुकी है—
महीनों तक पेंशन का इंतज़ार, ज्ञापन, धरना और अंत में केवल आश्वासन।

पेंशन नहीं तो जीवन नहीं: सम्मानजनक बुढ़ापे की मांग करते डीटीसी के बुज़ुर्ग

दिल्ली की सड़कों पर जब भी कोई आंदोलन दिखता है, तो अक्सर भीड़ में कुछ झुकी हुई पीठें, कांपते हाथ और धूप में खड़े थके हुए चेहरे दिखाई देते हैं। ये चेहरे किसी राजनीतिक लाभ की चाह में नहीं, बल्कि अपने ही हक़ के लिए खड़े होते हैं। ये दिल्ली परिवहन निगम के पेंशनर्स हैं, जिन्होंने अपनी जवानी शहर की रफ्तार को थामे रखने में लगा दी, और आज बुढ़ापे में वही शहर उनकी आवाज़ सुनने से कतराता दिखता है। सरकारें बदलती रहीं, नारे बदले, वादे बदले, लेकिन इन बुज़ुर्गों की पीड़ा जस की तस बनी रही।

डीटीसी के पेंशनर्स की कहानी केवल एक विभाग या एक संगठन की कहानी नहीं है, यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें सेवा के बाद सम्मान नहीं, बल्कि संघर्ष लिखा है। जिन हाथों ने वर्षों तक बसों के स्टीयरिंग थामे, टिकट काटे, वर्कशॉप में पसीना बहाया, आज वही हाथ पेंशन की फाइलें उठाए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। कभी मुख्यमंत्री आवास के बाहर, कभी जंतर-मंतर पर, तो कभी दफ्तरों की सीढ़ियों पर बैठकर वे बस इतना पूछते हैं कि क्या जीवन भर की सेवा के बाद इतना हक़ भी नहीं कि समय पर पेंशन मिल सके।

पेंशन इन बुज़ुर्गों के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि जीवन रेखा है। इसी पेंशन से घर का किराया, बिजली-पानी का बिल, दवाइयों का खर्च और बच्चों पर निर्भर न रहने की थोड़ी-सी आत्मसम्मान की उम्मीद जुड़ी है। लेकिन जब महीनों तक पेंशन नहीं आती या अधूरी आती है, तो घर का बजट चरमरा जाता है। कई पेंशनर्स बताते हैं कि दवा खरीदनी है या बिजली का बिल भरना है, यह फैसला उन्हें हर महीने करना पड़ता है। जिन लोगों ने कभी यात्रियों से टिकट के पैसे गिने, आज वे खुद पैसों की गिनती में उलझे रहते हैं।

इस पीड़ा का सबसे क्रूर पहलू बीमारी है। उम्र के साथ बीमारियां आती हैं, लेकिन इलाज के लिए पैसा चाहिए। डीटीसी पेंशनर्स में ऐसे अनगिनत बुज़ुर्ग हैं जो मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारें और निजी अस्पतालों का भारी खर्च उनके लिए किसी सजा से कम नहीं। कई बार सुनने को मिलता है कि इलाज के अभाव में किसी पेंशनर की हालत बिगड़ गई, और किसी परिवार ने अपने बुज़ुर्ग को समय पर दवा न मिलने के कारण खो दिया। क्या यही उस सेवा का प्रतिफल है जो उन्होंने राजधानी को दी?

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हर सरकार चुनाव से पहले बुज़ुर्गों, कर्मचारियों और पेंशनर्स की बात करती है। घोषणाएं होती हैं, आश्वासन दिए जाते हैं, और कहा जाता है कि समस्या का समाधान प्राथमिकता में है। लेकिन चुनाव बीतते ही फाइलें फिर धूल खाने लगती हैं। डीटीसी पेंशनर्स के लिए यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि भावनात्मक आघात भी है। उन्हें लगता है कि वे व्यवस्था के लिए केवल तब तक महत्वपूर्ण थे जब तक वे काम कर रहे थे। सेवानिवृत्ति के बाद उनका अस्तित्व जैसे कागजों में सिमट कर रह गया।

आंदोलन इन बुज़ुर्गों की मजबूरी बन चुका है। ठंड, गर्मी, बारिश, किसी भी मौसम में वे सड़कों पर उतर आते हैं। उनके पास न तो बड़ी राजनीतिक ताकत है और न ही मीडिया मैनेजमेंट का हुनर। फिर भी वे तख्तियां लेकर खड़े होते हैं, नारे लगाते हैं, और उम्मीद करते हैं कि शायद इस बार उनकी आवाज़ सुनी जाएगी। कई बार पुलिस की सख्ती झेलनी पड़ती है, कई बार आश्वासन देकर उन्हें घर भेज दिया जाता है। लेकिन समस्या वहीं की वहीं रहती है।

इन आंदोलनों का असर उनके पारिवारिक जीवन पर भी पड़ता है। घर में तनाव बढ़ता है, बच्चों को लगता है कि माता-पिता की मेहनत का कोई मूल्य नहीं। कुछ पेंशनर्स तो यह कहते हुए भावुक हो जाते हैं कि वे अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, इसलिए पेंशन के लिए लड़ रहे हैं। यह लड़ाई केवल पैसों की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की है। वे चाहते हैं कि उन्हें भी सम्मानजनक बुढ़ापा मिले, जिसमें रोजमर्रा की जरूरतों के लिए हाथ फैलाना न पड़े।

सत्ता से सीधा सवाल यही है कि आखिर डीटीसी पेंशनर्स की समस्या का स्थायी समाधान कब होगा। क्या हर बार आंदोलन ही आखिरी रास्ता रहेगा। क्या बुज़ुर्गों को यह साबित करना पड़ेगा कि वे अभी जिंदा हैं, तभी उन्हें पेंशन मिलेगी। सरकारें अक्सर वित्तीय संकट का हवाला देती हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या आर्थिक योजनाओं में उन लोगों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए जिन्होंने वर्षों तक सरकारी सेवा दी। यदि पेंशन समय पर और पूरी नहीं मिलती, तो यह व्यवस्था की विफलता नहीं तो और क्या है।

डीटीसी पेंशनर्स की यह कराहती ज़िंदगी हमें सोचने पर मजबूर करती है। यह केवल एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय में हर सरकारी कर्मचारी के भविष्य का संकेत है। आज अगर इन बुज़ुर्गों की आवाज़ अनसुनी रह जाती है, तो कल किसी और की बारी होगी। समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि वे इस पीड़ा को समझें और केवल कागजी वादों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाएं।

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार बदलने से केवल चेहरे बदलते हैं, पीड़ा नहीं। डीटीसी पेंशनर्स आज भी उसी उम्मीद के साथ सड़कों पर खड़े हैं कि शायद कोई दिन ऐसा आएगा जब उन्हें अपने हक़ के लिए आंदोलन नहीं करना पड़ेगा। वह दिन जब पेंशन समय पर मिलेगी, दवाइयों की चिंता नहीं होगी, और वे शांति से अपने बुढ़ापे के दिन जी सकेंगे। सवाल बस इतना है कि क्या सत्ता उनके इस इंतजार को समझने को तैयार है, या फिर उनकी कराहती आवाज़ यूं ही शोर में दबती रहेगी।

— विनय श्रीवास्तव
(लेखक, ब्लॉगर व स्वतंत्र पत्रकार)

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