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युवाओं की हालत: आज की पीढ़ी का द्वंद्व और अनिश्चितता का सच

युवाओं की स्थिति और दुविधाएँ

आज का युवा न तो पूरी तरह अपने पिता से कदम-से-कदम मिला पा रहा है और न ही पूरी तरह अपने बेटे से मिला पाएगा। वह बीच में फँस गया है, जैसे कोई समुद्र के बीचों-बीच फँस जाए। न तो वह मछली की तरह समुद्र के अंदर जा सकता है और न ही इंसानों की तरह किसी टापू पर आराम से रह सकता है। प्यास लगने पर उसे पानी भी नहीं मिलेगा, जबकि उसकी सबसे बड़ी समस्या ही पानी है।

यह नहीं समझा जाता कि युवा क्या चाहता है, उसकी इच्छाएँ क्या हैं और उसकी रुचि किसमें है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि आज लगभग हर चीज़ को पैसे के चश्मे से देखा जा रहा है। यह स्वाभाविक भी है। आप स्वयं सोचिए कि आप ऐसी दुनिया का हिस्सा हैं जहाँ हवा भी बिकती है और पानी भी बिकता है। ऐसे में जेब में पैसा होना बहुत ज़रूरी हो जाता है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति पैसे के पीछे भाग रहा है, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है।

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जिस काम में हमें अधिक पैसा मिलता है, हम उससे खुश हो जाते हैं और उसे करने लगते हैं। फिर हमें लगने लगता है कि उसी काम में हमारी बहुत रुचि है। क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि जिस काम को करने में खुशी मिले, वही हमारा असली इंटरेस्ट है। लेकिन गहराई से सोचने पर पता चलता है कि वह खुशी काम करने से नहीं, बल्कि काम के बाद मिलने वाले परिणाम, अर्थात् पैसे, से मिल रही है। सच तो यह है कि हममें से बहुत से लोग यह भी नहीं जानते कि वास्तविक खुशी क्या होती है। इंसान अक्सर यह नहीं समझ पाता कि वह वास्तव में किस बात से खुश है।

मान लीजिए आप बाज़ार गए। वहाँ आपने देखा कि 10 रुपये में 2 किलो बैंगन मिल रहे हैं। आप खुशी-खुशी 2 किलो बैंगन खरीद लेंगे। दुकानदार यह सोच सकता है कि शायद आपको बैंगन बहुत पसंद हैं। लेकिन बैंगन खरीदने का असली कारण यह नहीं है कि आपको वह सब्ज़ी पसंद है, बल्कि यह है कि उसका दाम बहुत कम है। आज का युवा भी कुछ ऐसा ही हो गया है। वह उन कामों की ओर अधिक आकर्षित हो रहा है जिनमें उसे अधिक पैसा मिलता है। इसी कारण वह अपने वास्तविक मार्ग से भटकता जा रहा है।

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गलती हमारे माहौल की भी है, क्योंकि समाज केवल कुछ विशेष प्रकार के कामों को ही आर्थिक रूप से महत्त्व देता है। वह जंगल जो इंसानों ने लगाए हैं और वे जंगल जो स्वयं प्रकृति ने बनाए हैं, दोनों में बहुत अंतर होता है। इंसानों द्वारा लगाए गए जंगलों में अक्सर वही पेड़ होते हैं जो आर्थिक लाभ देते हैं। उनके पर्यावरणीय लाभों के बारे में कम सोचा जाता है। जबकि प्राकृतिक जंगलों में ऐसे पेड़ों की संख्या अधिक होती है जो प्रकृति और पर्यावरण को संतुलित रखने में सहायक होते हैं।

यही चीज़ हम अपने साथ भी करते हैं। हम अपने स्वाभाविक (Natural) इंटरेस्ट को पहचान नहीं पाते और एक Artificial इंटरेस्ट विकसित कर लेते हैं।

Artificial इंटरेस्ट कैसे बनता है?

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यदि हमारे परिवार में कोई व्यक्ति किसी ऐसे क्षेत्र में है जहाँ वह बहुत अधिक पैसा कमा रहा है, तो बचपन से उसे देखकर हमारे मन में यह विचार बैठने लगता है कि हमें भी वही काम करना चाहिए। धीरे-धीरे यह सोच हमारे मन में इतनी गहराई से बैठ जाती है कि आगे चलकर हम उसे ही अपना वास्तविक इंटरेस्ट समझने लगते हैं। यह बिल्कुल उस Artificial जंगल की तरह है जिसे इंसान लगाता है। वह देखने में भले ही जंगल लगे, लेकिन उसमें वह प्राकृतिक संतुलन और विविधता नहीं होती जो एक स्वाभाविक जंगल में होती है।

यही कारण है कि आज का युवा भटक गया है।

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लेखक-बिंदेश कुमार झा

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✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

1 thought on “युवाओं की हालत: आज की पीढ़ी का द्वंद्व और अनिश्चितता का सच”

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