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जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी… वह नाम है श्री राजेंद्र गुप्ता

एक संपादक, जिन्होंने अनजान लेखक में भविष्य का लेखक देख लिया

3 सितंबर को उनके जन्मदिन के अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए मेरे मन में उनके प्रति केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि गहरी कृतज्ञता का भाव भी उमड़ता है। जीवन में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जिनका एक छोटा-सा सहयोग हमारी पूरी दिशा बदल देता है। मेरे लिए राजेंद्र गुप्ता जी उन्हीं चुनिंदा व्यक्तित्वों में से एक हैं।

कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे लोगों से मिलाती है, जिनकी अहमियत उस समय शायद हम पूरी तरह समझ नहीं पाते, लेकिन वर्षों बाद जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो महसूस होता है कि हमारी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर वही व्यक्ति हमारे साथ खड़ा था। उस समय हमें लगता है कि हमें बस एक छोटा-सा अवसर मिला है, लेकिन वही अवसर आगे चलकर हमारी पूरी पहचान बन जाता है। मेरे जीवन में श्री राजेंद्र गुप्ता जी की भूमिका कुछ ऐसी ही है।

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आज जब मेरी कलम देश के अलग-अलग समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में चलती है, जब मेरे लेख देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंचते हैं और जब मेरी पुस्तक ‘मन–मोदी’ मेरे हाथ में होती है, तब अनायास ही मेरा मन वर्ष 2011 की उस पहली सीढ़ी पर लौट जाता है। उस समय मैं लेखक नहीं था। पत्रकारिता की दुनिया से मेरा कोई विशेष परिचय नहीं था। मेरे पास विचार थे, भावनाएं थीं, देश और समाज को लेकर बेचैनी थी, लेकिन उन भावनाओं को शब्दों में ढालने का हुनर अभी विकसित नहीं हुआ था।

देश में अन्ना आंदोलन चल रहा था। वातावरण में बदलाव की एक बेचैनी थी। हर तरफ भ्रष्टाचार, व्यवस्था और देश के भविष्य को लेकर चर्चा हो रही थी। मेरे भीतर भी बहुत कुछ चल रहा था। मन कहता था कि अपनी बात लोगों तक पहुंचानी चाहिए, लेकिन यह नहीं पता था कि शुरुआत कहां से करूं।

और तभी मेरे जीवन में राजेंद्र गुप्ता जी आए।

उन्होंने मुझे देखा और शायद मेरे भीतर उस लेखक को पहचान लिया, जिसे मैं खुद भी नहीं पहचानता था। उन्होंने मुझे अपने अखबार में लिखने का अवसर दिया। आज सोचता हूं तो लगता है कि वह केवल एक लेख प्रकाशित करने का निर्णय नहीं था। वह मेरे जैसे अनजान व्यक्ति के शब्दों पर किया गया एक ऐसा विश्वास था, जिसने मेरी जिंदगी बदल दी।

एक संपादक के लिए किसी नए लेखक का पहला लेख शायद अखबार के एक पन्ने की जगह भरता है, लेकिन उस नए लेखक के लिए वही पन्ना पूरी जिंदगी की पहली सीढ़ी बन सकता है।

मेरे लिए भी वह पन्ना ऐसा ही था।

उस दिन शायद राजेंद्र गुप्ता जी को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उन्होंने जिस व्यक्ति को लिखने का अवसर दिया है, वह आने वाले वर्षों में लगातार लिखता रहेगा। लेकिन मेरे लिए वह अवसर किसी वरदान से कम नहीं था। पहली बार लगा कि मेरे विचारों की भी कोई कीमत है, मेरी आवाज भी किसी तक पहुंच सकती है और मेरी कलम भी कुछ कह सकती है।

फिर धीरे-धीरे शब्द मेरे साथी बनते गए। लेखन मेरी आदत बना, फिर जुनून बना और अंततः मेरी पहचान का हिस्सा बन गया। देश के अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लिखने का अवसर मिला। मेरे लेख विदेशों में भी प्रकाशित हुए। और एक दिन मेरी अपनी पुस्तक ‘मन–मोदी’ भी पाठकों के सामने आई।

लेकिन इस पूरे सफर की शुरुआत में खड़े व्यक्ति को मैं कैसे भूल सकता हूं?

राजेंद्र गुप्ता जी मेरे लिए केवल ‘अभी तक क्राइम टाइम्स’ के संपादक नहीं हैं। वे मेरी लेखकीय यात्रा के उन पहले व्यक्तियों में हैं, जिनके विश्वास ने मुझे खुद पर विश्वास करना सिखाया।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वे प्रतिभा को नाम और पहचान से नहीं तौलते। वे नए लोगों को अवसर देते हैं। उन लोगों को भी, जिनके पास कोई बड़ा परिचय नहीं होता, जिनका नाम पहले से किसी अखबार में नहीं छपा होता और जिन्हें खुद अपनी क्षमता पर पूरा भरोसा नहीं होता।

नए लेखक के लिए पहला अवसर कितना महत्वपूर्ण होता है, यह वही समझ सकता है जिसने कभी पहली बार अपनी रचना किसी संपादक को भेजी हो। मन में डर होता है—पता नहीं छपेगी या नहीं? लोग पढ़ेंगे या नहीं? कोई स्वीकार करेगा या नहीं?

ऐसे समय में यदि कोई संपादक कह दे—“लिखिए, हम प्रकाशित करेंगे”, तो वह केवल शब्द नहीं होते, वे किसी नए लेखक के लिए हौसले की पूरी दुनिया होते हैं।

राजेंद्र गुप्ता जी ने न जाने कितने लोगों को यह हौसला दिया है।

उनके अखबार से लिखना शुरू करने वाले कितने ही नए लेखक आगे चलकर अपनी पहचान बना चुके हैं। किसी की पहली रचना को जगह देकर उसे आगे बढ़ते देखना शायद उनके लिए सबसे बड़ी खुशी होती है। यही कारण है कि वे केवल संपादक नहीं, बल्कि नए लेखकों के लिए एक मार्गदर्शक और अवसर देने वाले व्यक्तित्व हैं।

और उनके व्यक्तित्व की दूसरी बड़ी खूबी है—उनकी मृदुलता।

आज की पत्रकारिता और सामाजिक जीवन में जहां पद के साथ कई बार दूरी और औपचारिकता आ जाती है, वहीं राजेंद्र गुप्ता जी के व्यवहार में एक सहज आत्मीयता दिखाई देती है। उनसे बात करते हुए कभी ऐसा महसूस नहीं होता कि सामने कोई बड़ा पदाधिकारी या संपादक बैठा है। उनकी बातचीत में अपनापन है और व्यवहार में विनम्रता।

शायद यही कारण है कि उनके आसपास के लोग उनसे केवल पद के कारण नहीं, बल्कि दिल से जुड़े रहते हैं।

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मेरे लिए तो यह जुड़ाव और भी गहरा है।

क्योंकि मैं उस यात्रा का साक्षी हूं, जिसमें उन्होंने एक अनजान व्यक्ति को लेखक बनने का अवसर दिया था। आज मेरी उपलब्धियां चाहे जितनी हों, मेरी लेखनी चाहे जितनी दूर पहुंच गई हो, लेकिन मेरे मन में अपने उस पहले अवसर का महत्व कभी कम नहीं हो सकता।

जब भी कोई मेरी लेखकीय यात्रा के बारे में पूछता है, तो मेरे पास उपलब्धियों की एक लंबी सूची हो सकती है, लेकिन मेरे मन में सबसे पहले एक व्यक्ति का नाम आता है—राजेंद्र गुप्ता।

मेरी किताब ‘मन–मोदी’ का प्रकाशन भी उनकी प्रेरणा से जुड़ा है। यह मेरे लिए सिर्फ पुस्तक का प्रकाशित होना नहीं, बल्कि उस विश्वास की अगली कड़ी है, जिसकी शुरुआत 2011 में हुई थी।

आज 3 सितंबर को उनके जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं तो यह शुभकामना औपचारिक नहीं है। इसके पीछे वर्षों की स्मृतियां हैं, एक लेखक की कृतज्ञता है और उस व्यक्ति के प्रति सम्मान है, जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी।

राजेंद्र गुप्ता जी,

किसी ने सच ही कहा है—
“जीवन में कुछ लोग हमें मंजिल तक नहीं पहुंचाते, लेकिन वे हमारी पहली यात्रा शुरू जरूर करवा देते हैं।”

आप मेरे लिए वही व्यक्ति हैं।

आपने मेरी मंजिल तय नहीं की, लेकिन आपने मुझे पहला कदम उठाने का साहस दिया। आपने मेरे लिए रास्ता नहीं चुना, लेकिन मुझे रास्ते पर चलने का अवसर दिया। आपने मेरी पहचान नहीं बनाई, बल्कि मुझे अपनी पहचान बनाने का मंच दिया।

आज यदि मेरी कलम देश-विदेश में कहीं अपनी जगह बना पा रही है, तो उसकी पहली दस्तक आपके अखबार के दरवाजे पर हुई थी।

इसलिए आपके जन्मदिन पर मेरे शब्दों में शुभकामनाओं से अधिक आभार है।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख और निरंतर सफलता प्रदान करे। आपकी मृदुल मुस्कान यूं ही बनी रहे, आपका हृदय यूं ही नए लोगों के लिए खुला रहे और आपकी कलम आने वाली पीढ़ियों के उन लेखकों को भी अवसर देती रहे, जिनके भीतर बहुत कुछ कहने की क्षमता है, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं।

शायद किसी नए लेखक की पहली रचना जब आपके अखबार में प्रकाशित होगी, तो वह लेखक वर्षों बाद पीछे मुड़कर उसी तरह आपको याद करेगा, जैसे आज मैं आपको याद कर रहा हूं।

और तब उसे भी शायद यही महसूस होगा—

“मेरी कलम की पहली पहचान देने वाला इंसान कोई संपादक भर नहीं था… वह मेरे सपने पर विश्वास करने वाला इंसान था।”

राजेंद्र गुप्ता जी, जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं।

आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें, दीर्घायु हों और यूं ही अनगिनत नई प्रतिभाओं के लिए अवसर, विश्वास और प्रेरणा का स्रोत बने रहें।

आपके प्रति हृदय से आभार।
सादर नमन।

— विनय श्रीवास्तव

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