BREAKING UPDATES
► मेरी कलम, मेरी यात्रा और चौदह वर्षों का विश्वास► जनचेतना की कलम को मिला सम्मान: विनय श्रीवास्तव को ‘भारतेन्दु पत्रकारिता गौरव सम्मान-2026’► ­­शरणार्थी शिविर से संयुक्त राष्ट्र तक… फिर राष्ट्रसेवा के शिखर तक—हरदीप सिंह पुरी की वह यात्रा जो हार मानना नहीं सिखाती!► सांस्कृतिक पुनर्जागरण: ‘ट्रियो सेट ऑफ़ थ्री आर्ट्स’ ने मुंबई में पेश की कव्वाली, सूफी और बॉलीवुड की एक आध्यात्मिक शाम► लंदन_डायरी : चर्च में वोटिंग सेंटर और ब्रिटिश लोकतंत्र की सहजता► ‘हनुमान अंश’ की अनोखी कहानी: फिल्म ने दर्शकों को नहीं खोजा, दर्शकों ने खुद खोज ली राह► श्रीकृष्ण का संदेश: परिस्थितियों को नहीं, अपने साहस को पहचानिए► जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी… वह नाम है श्री राजेंद्र गुप्ता► मशहूर गायक शाहिद माल्या की आवाज़ में ग़ज़ल एलबम ‘लवस्ट्रक’ का तीसरा रूहानी नगमा “सिर्फ तुम से” हुआ रिलीज़► मैन ऑफ़ टाइम – अंतर्राष्ट्रीय सदभावना मंच पर ‘मेरा भारत महान’ में गूॅंजा देशभक्त़ि का स्वर, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों ने दिया राष्ट्रहित और विश्व़ कल्याण का संदेश► मेरी कलम, मेरी यात्रा और चौदह वर्षों का विश्वास► जनचेतना की कलम को मिला सम्मान: विनय श्रीवास्तव को ‘भारतेन्दु पत्रकारिता गौरव सम्मान-2026’► ­­शरणार्थी शिविर से संयुक्त राष्ट्र तक… फिर राष्ट्रसेवा के शिखर तक—हरदीप सिंह पुरी की वह यात्रा जो हार मानना नहीं सिखाती!► सांस्कृतिक पुनर्जागरण: ‘ट्रियो सेट ऑफ़ थ्री आर्ट्स’ ने मुंबई में पेश की कव्वाली, सूफी और बॉलीवुड की एक आध्यात्मिक शाम► लंदन_डायरी : चर्च में वोटिंग सेंटर और ब्रिटिश लोकतंत्र की सहजता► ‘हनुमान अंश’ की अनोखी कहानी: फिल्म ने दर्शकों को नहीं खोजा, दर्शकों ने खुद खोज ली राह► श्रीकृष्ण का संदेश: परिस्थितियों को नहीं, अपने साहस को पहचानिए► जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी… वह नाम है श्री राजेंद्र गुप्ता► मशहूर गायक शाहिद माल्या की आवाज़ में ग़ज़ल एलबम ‘लवस्ट्रक’ का तीसरा रूहानी नगमा “सिर्फ तुम से” हुआ रिलीज़► मैन ऑफ़ टाइम – अंतर्राष्ट्रीय सदभावना मंच पर ‘मेरा भारत महान’ में गूॅंजा देशभक्त़ि का स्वर, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों ने दिया राष्ट्रहित और विश्व़ कल्याण का संदेश► मेरी कलम, मेरी यात्रा और चौदह वर्षों का विश्वास► जनचेतना की कलम को मिला सम्मान: विनय श्रीवास्तव को ‘भारतेन्दु पत्रकारिता गौरव सम्मान-2026’► ­­शरणार्थी शिविर से संयुक्त राष्ट्र तक… फिर राष्ट्रसेवा के शिखर तक—हरदीप सिंह पुरी की वह यात्रा जो हार मानना नहीं सिखाती!► सांस्कृतिक पुनर्जागरण: ‘ट्रियो सेट ऑफ़ थ्री आर्ट्स’ ने मुंबई में पेश की कव्वाली, सूफी और बॉलीवुड की एक आध्यात्मिक शाम► लंदन_डायरी : चर्च में वोटिंग सेंटर और ब्रिटिश लोकतंत्र की सहजता► ‘हनुमान अंश’ की अनोखी कहानी: फिल्म ने दर्शकों को नहीं खोजा, दर्शकों ने खुद खोज ली राह► श्रीकृष्ण का संदेश: परिस्थितियों को नहीं, अपने साहस को पहचानिए► जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी… वह नाम है श्री राजेंद्र गुप्ता► मशहूर गायक शाहिद माल्या की आवाज़ में ग़ज़ल एलबम ‘लवस्ट्रक’ का तीसरा रूहानी नगमा “सिर्फ तुम से” हुआ रिलीज़► मैन ऑफ़ टाइम – अंतर्राष्ट्रीय सदभावना मंच पर ‘मेरा भारत महान’ में गूॅंजा देशभक्त़ि का स्वर, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों ने दिया राष्ट्रहित और विश्व़ कल्याण का संदेश

मेरी कलम, मेरी यात्रा और चौदह वर्षों का विश्वास

जब चौदह साल तक उठाई जनहित की आवाज को मिला सम्मान, तो सबसे पहले माता-पिता और श्रीकृष्ण याद आए

कुछ सम्मान ऐसे होते हैं, जिन्हें हाथ में लेते समय आंखें केवल सामने नहीं देखतीं, बल्कि पीछे मुड़कर पूरा जीवन देखने लगती हैं। मेरे लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र गौरव सम्मान-2026 और भारत वैभव सम्मान-2026 ऐसे ही दो अवसर हैं।

सम्मान मंच पर मिला, नाम पुकारा गया, लोगों ने तालियां बजाईं और शुभकामनाएं दीं, लेकिन उस क्षण मेरे भीतर एक अलग ही दुनिया चल रही थी। मुझे लगा जैसे पिछले चौदह वर्षों के वे तमाम दिन एक-एक करके मेरे सामने आकर खड़े हो गए हैं, जब मैंने बिना यह सोचे लिखा कि मेरी बात कितने लोग पढ़ेंगे, मेरी आवाज कितनी दूर जाएगी या मेरी मेहनत को कभी कोई पहचान मिलेगी भी या नहीं।

WhatsApp पर जुड़ें
राजनीति, समाज, अध्यात्म और प्रेरणा — रोज़ नई दृष्टि
✅ अभी Follow करें

उस समय मेरे पास केवल एक विश्वास था—अगर बात सच्ची है और उद्देश्य जनहित का है, तो उसे कहना चाहिए।

✍️👇यह भी पढ़ें

आज जब मेरी पत्रकारिता, साहित्य और जनहित के लिए मुझे सम्मान मिला है, तो मेरे मन में सबसे पहले अपने माता-पिता की याद आती है। सच कहूं तो आज अगर वे मेरे सामने होते तो शायद मैं सबसे पहले उनके चरण छूता और कहता—“देखिए, आपकी दी हुई सीख मेरी जिंदगी में कहीं खोई नहीं है।”

मेरे माता-पिता ने मुझे कोई बड़ी विरासत नहीं दी, लेकिन उन्होंने जो संस्कार दिए, वे मेरे लिए किसी भी संपत्ति से बड़े हैं। उन्होंने मुझे सिखाया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे जैसी हों, ईमानदारी का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। शायद मेरी कलम में जो थोड़ा-सा विश्वास और संवेदना है, उसकी जड़ें वहीं हैं।

आज सम्मान मेरे नाम के साथ जुड़ रहा है, लेकिन मैं इसे अकेले अपना सम्मान नहीं मानता। इसमें मेरे माता-पिता के संस्कार हैं, मेरे परिवार का धैर्य है, मेरे बड़ों का आशीर्वाद है और उन पाठकों का स्नेह है, जिन्होंने मेरी लिखी हुई पंक्तियों में अपना दर्द, अपना सवाल और कभी-कभी अपनी आवाज भी महसूस की।

शुरुआत में नहीं पता था कि यह यात्रा इतनी लंबी होगी

वर्ष 2011 को याद करता हूं तो आज भी मन में एक अलग-सी हलचल होती है। देश में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में जनलोकपाल आंदोलन ने पूरे देश के वातावरण को प्रभावित किया था। मैं भी उस दौर से भीतर तक प्रभावित हुआ। मन में बहुत से सवाल थे और उन सवालों को शब्द देने की इच्छा पैदा हुई।

शायद मुझे तब खुद भी नहीं मालूम था कि यही इच्छा आने वाले चौदह वर्षों तक मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगी।

मेरी लेखन यात्रा को पहला अवसर देने वालों में वरिष्ठ पत्रकार और संपादक राजेंद्र गुप्ता जी का नाम मैं हमेशा सम्मान से लेता हूं। उन्होंने मेरी लेखनी पर विश्वास किया और मुझे लिखने का अवसर दिया। किसी नए लेखक के लिए पहला अवसर केवल एक अवसर नहीं होता, वह उसके आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी होता है।

वह सीढ़ी मेरे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण थी।

फिर धीरे-धीरे लिखना मेरी आदत नहीं, मेरी जरूरत बन गया। सामाजिक विषय हों, जनहित के प्रश्न हों, राजनीति से जुड़े मुद्दे हों, साहित्य हो या समाज में घट रही कोई ऐसी घटना, जो मन को भीतर तक छू जाए—कलम खुद रास्ता खोजने लगी।

कई बार रात देर तक लिखता रहा। कई बार नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच समय निकालना कठिन हुआ। कॉरपोरेट जीवन की अपनी व्यस्तताएं थीं, लेकिन भीतर कहीं पत्रकार और लेखक लगातार जागता रहा।

कई बार सोचा—इतना सब करने से क्या मिलेगा?

फिर मन ने कहा—हर काम का हिसाब पुरस्कार से नहीं होता। कुछ काम आत्मसंतोष के लिए होते हैं।

और मैं फिर लिखने बैठ गया।

✍️👇यह भी पढ़ें

जिसने मेरी कलम को पहली पहचान दी… वह नाम है श्री राजेंद्र गुप्ता

मेरी कलम की सबसे बड़ी ताकत पाठकों का विश्वास रहा

पत्रकारिता में रहते हुए मैंने यह बहुत करीब से महसूस किया कि लेखक की सबसे बड़ी पूंजी उसका पाठक है।

कोई पाठक जब संदेश भेजकर कहता है कि “आपने हमारे मन की बात लिख दी”, तो वह मेरे लिए किसी भी सम्मान से कम नहीं होता। कोई बुजुर्ग आशीर्वाद देता है, कोई युवा अपनी बात साझा करता है, कोई अनजान व्यक्ति किसी लेख को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देता है—ये छोटी-छोटी बातें मेरी लेखनी को आगे बढ़ाती रही हैं।

कई बार मेरे लेखों पर असहमति भी मिली। लेकिन मैंने उसे भी स्वीकार किया, क्योंकि लोकतांत्रिक समाज में संवाद केवल सहमति से नहीं, असहमति से भी मजबूत होता है।

मेरी कोशिश हमेशा यही रही कि मेरी कलम किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा या आलोचना तक सीमित न हो, बल्कि मुद्दे के मानवीय पक्ष को सामने रखे। जनहित मेरे लिए कोई शब्द नहीं, बल्कि पत्रकारिता की वह जिम्मेदारी है जिसे मैंने अपनी तरह से निभाने का प्रयास किया है।

सम्मान मिला तो लगा, चौदह साल सचमुच मेरे साथ चल रहे थे

भारतेंदु हरिश्चंद्र गौरव सम्मान और भारत वैभव सम्मान प्राप्त करते समय मन में एक अजीब-सी शांति थी।

खुशी थी, निश्चित रूप से थी। लेकिन उससे कहीं अधिक कृतज्ञता थी।

मुझे लगा कि ये सम्मान केवल उस व्यक्ति को नहीं मिले हैं, जिसने पिछले कुछ वर्षों में लिखा है। इनके पीछे वह लड़का भी खड़ा है, जिसने कभी सपने देखे थे। वह संघर्ष भी खड़ा है, जिसमें रास्ते हमेशा आसान नहीं थे। वे सभी लोग खड़े हैं, जिन्होंने किसी न किसी मोड़ पर मेरा हाथ पकड़ा।

और मेरे माता-पिता…

उनकी याद उस क्षण सबसे ज्यादा आई।

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें समय समाप्त नहीं कर सकता। माता-पिता का आशीर्वाद मेरे लिए आज भी वैसा ही है। मुझे विश्वास है कि जहां भी वे हैं, मेरी इस यात्रा को देखकर उनका आशीर्वाद मेरे साथ है।

मैंने जीवन में जब भी कोई उपलब्धि हासिल की, मन ने सबसे पहले परिवार की ओर देखा। लेकिन इस बार भावनाएं कुछ ज्यादा थीं। शायद इसलिए कि पत्रकारिता और लेखन मेरे लिए केवल उपलब्धियां नहीं हैं; यह मेरे जीवन की पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।

और फिर श्रीकृष्ण…

मेरे जीवन में श्रीकृष्ण के प्रति आस्था हमेशा रही है।

WhatsApp पर जुड़ें
राजनीति, समाज, अध्यात्म और प्रेरणा — रोज़ नई दृष्टि
✅ अभी Follow करें

जब परिस्थितियां मेरे पक्ष में नहीं थीं, तब भी मैंने कर्म करना नहीं छोड़ा। शायद श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी सीख मेरे लिए यही रही कि मनुष्य को अपने कर्म पर अधिकार है और उसे अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।

इसलिए आज जब सम्मान मिला है, तो मैं इसे अपनी योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं मानता। मैं इसे श्रीकृष्ण की कृपा मानता हूं और अपने लिए एक नई जिम्मेदारी के रूप में देखता हूं।

क्योंकि सम्मान मिलने के बाद रास्ता समाप्त नहीं होता, बल्कि जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

अब मेरी कलम से लोगों की अपेक्षाएं और बढ़ेंगी। और मैं चाहता हूं कि यह अपेक्षा मेरे लिए दबाव नहीं, प्रेरणा बने।

मेरी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है

चौदह साल बहुत लंबा समय होता है।

इन वर्षों में जीवन बदला, परिस्थितियां बदलीं, तकनीक बदली, पत्रकारिता का स्वरूप बदला और पाठकों की अपेक्षाएं भी बदलीं। लेकिन एक चीज नहीं बदली—कुछ अच्छा लिखने और समाज से जुड़े मुद्दों को सामने रखने की मेरी इच्छा।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे अपनी यात्रा में बहुत सारी कमियां भी दिखाई देती हैं। लगता है कि और बेहतर लिखा जा सकता था, कुछ विषयों पर और काम किया जा सकता था, कुछ लोगों की आवाज और मजबूती से सामने लाई जा सकती थी।

लेकिन शायद यही यात्रा की खूबसूरती है।

हम पूर्ण होकर नहीं चलते। चलते-चलते सीखते हैं, गिरते हैं, संभलते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं।

इन दोनों सम्मानों ने मेरे भीतर गर्व से ज्यादा विनम्रता पैदा की है। उन्होंने मुझे यह याद दिलाया है कि मेरी कलम अब केवल मेरी नहीं रही। उसे पढ़ने वाले लोगों का विश्वास भी उसके साथ जुड़ा है।

मैं अपने उन सभी वरिष्ठजनों को नमन करता हूं, जिन्होंने मुझे रास्ता दिखाया। अपने परिवार का आभार व्यक्त करता हूं, जिसने मेरी व्यस्तताओं और लेखन के बीच मुझे समझा। अपने मित्रों और सहयोगियों का धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने कठिन समय में उत्साह बढ़ाया।

और अपने पाठकों से मैं केवल इतना कहना चाहता हूं—आपका स्नेह ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

अगर मेरी किसी एक पंक्ति ने किसी एक व्यक्ति को सोचने पर मजबूर किया, किसी एक निराश व्यक्ति को उम्मीद दी, किसी एक सामाजिक सवाल को आवाज दी या किसी एक पाठक को यह महसूस कराया कि उसकी बात भी महत्वपूर्ण है, तो मेरी कलम का उद्देश्य पूरा हुआ।

आज मुझे मिले ये सम्मान मेरे लिए मंजिल नहीं हैं।

ये उस यात्रा के पड़ाव हैं, जिसने मुझे सिखाया है कि ईमानदारी से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं जाता। हो सकता है पहचान देर से मिले। हो सकता है प्रशंसा देर से आए। हो सकता है वर्षों तक कोई आपकी मेहनत को न देखे।

लेकिन समय सब देखता है।

और जब समय जवाब देता है, तो वह केवल पुरस्कार नहीं देता—वह भीतर एक विश्वास पैदा करता है कि जिस रास्ते पर आप चुपचाप चलते रहे, वह रास्ता गलत नहीं था।

आज मैं अपनी कलम को फिर उसी विश्वास के साथ उठाना चाहता हूं।

श्रीकृष्ण की कृपा, माता-पिता के आशीर्वाद, बड़ों के स्नेह और पाठकों के विश्वास को अपना साथ मानकर।

क्योंकि मेरे लिए पत्रकारिता केवल लिखना नहीं है।

यह समाज के प्रति मेरी जिम्मेदारी है।

और जनहित की आवाज उठाना केवल मेरा काम नहीं है।

यह मेरी आत्मा की आवाज है।

चौदह वर्ष पहले जिस आवाज ने धीरे से शब्दों का रूप लिया था, आज वह दो सम्मानों के साथ मेरे सामने खड़ी है।

मैं भावुक हूं।

मैं कृतज्ञ हूं।

लेकिन सबसे अधिक मैं जिम्मेदार महसूस कर रहा हूं।

क्योंकि अब इस कलम को और दूर तक जाना है।

और जब तक शब्दों में सत्य, मन में संवेदना और कर्म में ईमानदारी बाकी है—यह यात्रा जारी रहेगी।

✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top