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निष्काम कर्मयोगी मुकेश यादव: बीमारी को हरा कर समाज सेवा की अलख जगाने वाले एक सच्चे नायक

एक सरकारी कर्मचारी की अभूतपूर्व जीवन-यात्रा, जो सेवानिवृत्ति के बाद भी अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित करने का अनूठा संकल्प लिए हुए है।

कर्तव्यनिष्ठता और समाज सेवा का अद्भुत संगम: एक निस्वार्थ जीवन-यात्रा

समाज में प्रायः यह धारणा देखने को मिलती है कि सरकारी नौकरी में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति अपने दैनिक दायित्वों से इतर सामाजिक सरोकारों के लिए समय नहीं निकाल पाते। परंतु श्री मुकेश यादव जी ने इस धारणा को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। एक सरकारी कर्मचारी के रूप में अपने दैनिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने के साथ-साथ, वे अपने निजी समय और ऑफिस की छुट्टियों का उपयोग केवल और केवल जनकल्याणकारी कार्यों के लिए करते हैं।

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मुकेश जी के लिए समाज सेवा कोई दिखावा या पद प्राप्ति का जरिया नहीं है। उन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, पद के लालच या प्रचार की भूख के, हमेशा धरातल पर उतरकर काम किया है। उनका मानना है कि नागरिक के रूप में हमारी जिम्मेदारी केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि जिस समाज और कॉलोनी में हम रहते हैं, उसकी बेहतरी में योगदान देना भी हमारा परम कर्तव्य है।

उनकी समाज सेवा की यात्रा बहुआयामी रही है। क्षेत्र के लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने से लेकर स्वच्छता अभियान चलाने, हरियाली बढ़ाने और पार्कों के रखरखाव तक, वे हर मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर नेतृत्व करते हैं। पशुपतिनाथ नगर, कृषि अनुसंधान नगर, दुग्ध बिहार और चबा गेटोर जैसी विभिन्न कॉलोनियों में पेयजल संकट को दूर करने के लिए उन्होंने अभूतपूर्व प्रयास किए। उनके प्रयासों से ट्यूबवेल लगवाए गए, जिससे आज इन कॉलोनियों के सैकड़ों परिवारों और राहगीरों को निरंतर शुद्ध पेयजल सुलभ हो पा रहा है। इसके अतिरिक्त, सड़कों के निर्माण और मरम्मत कार्य को पूरा करवाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे क्षेत्रवासियों का आवागमन सुगम हो सका।

२. कोरोना काल का भीषण संघर्ष, अर्धांगिनी का त्याग और जीजीविषा की मिसाल

जीवन की परीक्षा तब सबसे कठिन होती है जब मनुष्य का स्वास्थ्य उसका साथ छोड़ देता है। वैश्विक कोरोना महामारी के दौरान मुकेश यादव जी भी इस घातक वायरस की चपेट में आ गए थे। बीमारी का प्रकोप इतना भयानक था कि उनकी हालत अत्यंत नाजुक हो गई थी और एक समय ऐसा आया जब उनके जीवन की आस लगभग समाप्त हो चुकी थी।

ऐसे अत्यंत कठिन और निराशाजनक क्षणों में, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण यादव जी एक मजबूत ढाल बनकर उनके सामने खड़ी हुईं। किरण जी की असीम निष्ठा, दिन-रात की अनवरत सेवा, अटूट प्रार्थनाओं और अथक परिश्रम के बल पर मुकेश जी मौत के मुंह से वापस लौट सके। एक पति के जीवन की रक्षा के लिए किरण जी द्वारा किया गया यह त्याग और सेवा भारतीय परिवार व्यवस्था और दांपत्य निष्ठा की एक अद्भुत मिसाल है।

हालांकि, कोरोना से जंग जीतने के बाद मुकेश जी को एक और भारी शारीरिक आघात सहना पड़ा। इस बीमारी के दुष्प्रभावों के कारण उनके चेहरे और मुंह में मुकरमाइकोसिस (ब्लॉक फंगस) नामक बिमारी हो गया। हो गया। शारीरिक रूप से बोलना और सामान्य जीवन जीना उनके लिए अत्यंत कष्टदायी हो गया।

परंतु, मुकेश जी की आत्मशक्ति और संकल्प के आगे यह शारीरिक अक्षमता भी हार मान गई। मुंह में इतनी खतरनाक बिमारी होने के बावजूद उनके हौसले में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने इस शारीरिक कष्ट को कभी अपनी जनसेवा के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। जिस अवस्था में सामान्य व्यक्ति हताश होकर घर बैठ जाता है, उस अवस्था में भी मुकेश जी कॉलोनी की समस्याओं के समाधान के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे, पत्राचार करते रहे और स्वच्छता अभियानों में श्रमदान करते रहे। उनकी यह जीजीविषा और कर्तव्यनिष्ठा समाज के प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर संकटों से घबराने वाली युवा पीढ़ी के लिए एक महान प्रेरणा है।

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३. पर्यावरण संवर्धन और जल संरक्षण के लिए अनवरत प्रयास

मुकेश यादव जी का मानना है कि आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण देना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। इसी सोच के तहत उन्होंने क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निःशुल्क पौध वितरण अभियान चलाया। केवल पौधे बांटना ही नहीं, बल्कि उन्होंने कॉलोनी की गलियों, खाली स्थानों और पार्कों में स्वयं पौधे लगाए और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी ली।

पशुपतिनाथ नगर स्थित सुविधा क्षेत्र एवं सभी सार्वजनिक उद्यानों का कायाकल्प और विकास उनके प्रयासों का ही परिणाम है, ताकि बच्चों, बुजुर्गों और कॉलोनीवासियों को एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण मिल सके। वे स्वयं हाथों में झाड़ू लेकर श्रमदान करते हैं और कॉलोनीवासियों को स्वच्छता का संदेश देते हुए निरंतर प्रेरित करते हैं। इसके अलावा, जब भी कोई आर्थिक रूप से कमजोर या जरूरतमंद व्यक्ति उनके पास आता है, वे यथासंभव अपनी निजी आय से भी उनकी आर्थिक सहायता करने से पीछे नहीं हटते।

जल ही जीवन है — इस बात को गहराई से समझते हुए मुकेश जी ने कॉलोनी को पेयजल संकट से स्थाई मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया। वे लगातार कॉलोनी को बीसलपुर जल परियोजना से जोड़ने के लिए प्रयासरत हैं। प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने से लेकर डिजिटल माध्यमों पर आवाज उठाने तक, उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। यद्यपि आचार संहिता लागू होने के कारण काम में थोड़ा विलंब हुआ, लेकिन वे पूरी दृढ़ता के साथ लगे हुए हैं ताकि हर घर तक बीसलपुर का शुद्ध पानी पहुंच सके।

४. सेवानिवृत्ति का संकल्प और युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक संदेश

अपनी सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद जहाँ अधिकांश लोग विश्राम और आराम का जीवन चुनते हैं, वहीं मुकेश जी का संकल्प एकदम भिन्न और अनूठा है। उनकी ख्वाहिश है कि सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले संपूर्ण समय को वे अपनी कॉलोनी और समाज के चहुंमुखी विकास के लिए समर्पित कर सकें। उनका लक्ष्य है कि वे बिना किसी समय की पाबंदी के चौबीसों घंटे जनहित के कार्यों, पर्यावरण रक्षा, और क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं के समाधान में लगा सकें।

मुकेश यादव जी की यह जीवनी आज की युवा पीढ़ी के लिए एक जीवंत मार्गदर्शिका है। आज का युवा जहाँ करियर की भागदौड़ और निजी स्वार्थों में उलझा हुआ है, वहीं मुकेश जी का जीवन यह सीख देता है कि:

  • सेवा के लिए पद नहीं, नीयत चाहिए: समाज की भलाई करने के लिए किसी बड़े पद पर होना जरूरी नहीं है।
  • विपत्तियों के आगे घुटने न टेकें: जीवन में चाहे प्राणघातक संकट आए या शारीरिक अक्षमता, यदि मन में समाज सेवा का जज्बा है तो कोई भी बीमारी आपके रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकती।
  • समय का प्रबंधन: व्यस्त से व्यस्त दिनचर्या के बावजूद यदि हम चाहें, तो अपने समाज और पर्यावरण के लिए समय निकाल सकते हैं।

मुकेश यादव जी और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण यादव जी का जीवन यह साबित करता है कि जब प्रेम, सेवा और संकल्प एक साथ मिलते हैं, तो न केवल बड़ी से बड़ी बीमारी को हराया जा सकता है, बल्कि संपूर्ण समाज को एक नई दिशा भी दी जा सकती है। संपूर्ण कॉलोनी और समाज को मुकेश जी जैसे निष्काम कर्मयोगी पर गर्व है।

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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