
4 अगस्त की शाम R Bharat के ‘पूछता है भारत’ कार्यक्रम में अर्णब गोस्वामी के साथ पूर्व महाराष्ट्र गृह मंत्री अनिल देशमुख का लाइव संवाद केवल एक टेलीविजन इंटरव्यू नहीं था। इसे उस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में देखने की जरूरत है, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति, मुंबई पुलिस और पत्रकारिता को लंबे समय तक कटघरे में खड़ा रखा। आज जब उसी दौर के एक प्रमुख राजनीतिक किरदार के सामने बैठकर अर्णब गोस्वामी ने पुराने सवाल उठाए और बातचीत में उस समय की घटनाओं को लेकर महत्वपूर्ण बातें सामने आईं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्षों से दबे कुछ सवाल फिर जनता के सामने खड़े हो गए हैं।
अँटीलिया प्रकरण को भला कौन भूल सकता है। फरवरी 2021 में मुकेश अंबानी के आवास अँटीलिया के बाहर विस्फोटक सामग्री से भरी SUV मिलने और उसके बाद वाहन मालिक मनसुख हिरेन की संदिग्ध मौत ने पूरे देश को हिला दिया था। जांच आगे बढ़ी तो मुंबई पुलिस के अधिकारी सचिन वाजे की भूमिका सामने आई और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मामले की जांच अपने हाथ में ली। इसके बाद मुंबई पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठते रहे। तत्कालीन मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह और तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने इस पूरे मामले को केवल अपराध की जांच न रहने देकर महाराष्ट्र की राजनीति का बड़ा संकट बना दिया।
आज के इंटरव्यू ने इन्हीं सवालों को फिर सामने ला दिया है। अगर उस समय अँटीलिया प्रकरण के पीछे किसी बड़ी साजिश, राजनीतिक संरक्षण अथवा पुलिस तंत्र के दुरुपयोग की भूमिका थी, तो उसकी पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। यह किसी राजनीतिक दल को बचाने या किसी दूसरे दल को कठघरे में खड़ा करने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि आखिर उस समय हुआ क्या था? किसने क्या किया, किसके निर्देश पर किया और किस उद्देश्य से किया गया? इन प्रश्नों का उत्तर अब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया से मिलना चाहिए।
इसी संदर्भ में अर्णब गोस्वामी के खिलाफ हुई कार्रवाई को भी अलग करके नहीं देखा जा सकता। नवंबर 2020 में अन्वय नाइक मामले में अर्णब की गिरफ्तारी ने देशभर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सत्ता के दुरुपयोग को लेकर बहस छेड़ दी थी। उस समय महाराष्ट्र की तत्कालीन सरकार और अर्णब गोस्वामी के बीच खुला टकराव था। अर्णब सरकार के खिलाफ लगातार मुखर थे और उनके चैनल पर सत्ता से तीखे सवाल उठाए जा रहे थे। गिरफ्तारी के बाद अर्णब और उनके समर्थकों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया। उस समय उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर जो सवाल उठे थे, वे आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
अर्णब गोस्वामी की पत्रकारिता की शैली से हर कोई सहमत हो, यह आवश्यक नहीं है। उनके कार्यक्रमों और भाषा की आलोचना भी हो सकती है। लेकिन एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने जिस दबाव का सामना किया, उसके बावजूद अपनी आवाज और अपने सवालों को बंद नहीं किया। उन्होंने हार नहीं मानी और अपने आरोपों तथा अपने पक्ष पर लगातार कायम रहे। पत्रकारिता में यही साहस महत्वपूर्ण है। पत्रकार गलत हो सकता है, लेकिन किसी पत्रकार के सवालों का जवाब सत्ता को तथ्यों और तर्क से देना चाहिए, पुलिस या प्रशासनिक दबाव से नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम में आज सामने आया एक और महत्वपूर्ण पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लाइव कार्यक्रम में उद्धव ठाकरे के पक्ष से जुड़े प्रवक्ता द्वारा अर्णब गोस्वामी से माफी मांगे जाने की घटना इस बात का संकेत है कि समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं और कभी-कभी वही घटनाएं नए संदर्भ में सामने आती हैं। यदि उस समय अर्णब के साथ हुई कार्रवाई या व्यवहार को लेकर आज सार्वजनिक मंच पर माफी मांगने की आवश्यकता महसूस हुई है, तो यह अपने आप में गंभीर राजनीतिक और पत्रकारिता संबंधी सवाल खड़े करता है। आखिर उस समय ऐसा क्या हुआ था कि आज माफी की नौबत आई?
मेरे विचार से अब अँटीलिया प्रकरण की पूरी सुनवाई और उससे जुड़े सभी पहलुओं की एक बार फिर गंभीर समीक्षा होनी चाहिए। मनसुख हिरेन की मौत, सचिन वाजे की भूमिका, परमबीर सिंह से जुड़े आरोप, तत्कालीन गृह विभाग की भूमिका और कथित राजनीतिक संरक्षण—इन सभी सवालों को एक साथ देखा जाना चाहिए। साथ ही अर्णब गोस्वामी और रिपब्लिक नेटवर्क के खिलाफ उस दौर में हुई कार्रवाइयों की भी स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। यदि सब कुछ कानून के अनुसार हुआ था तो जांच उसे स्पष्ट करे, और यदि कहीं सत्ता, पुलिस या राजनीति का दुरुपयोग हुआ था तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
यहां मुद्दा अर्णब गोस्वामी बनाम उद्धव ठाकरे, अनिल देशमुख बनाम परमबीर सिंह या किसी राजनीतिक दल की जीत-हार का नहीं है। मुद्दा लोकतंत्र में सत्ता और पत्रकारिता के रिश्ते का है। सरकारें बदलती हैं, मुख्यमंत्री बदलते हैं, मंत्री और पुलिस अधिकारी बदलते हैं, लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जनता के जानने का अधिकार स्थायी होना चाहिए।
आज अगर वर्षों पुराने घटनाक्रम पर किसी पूर्व मंत्री के बयान और उसी दौर के राजनीतिक प्रतिनिधि की सार्वजनिक माफी नए सवाल पैदा करती है, तो उन सवालों से बचने के बजाय उनकी तह तक जाना चाहिए। किसी को बचाने के लिए नहीं, किसी को फंसाने के लिए नहीं—बल्कि सच सामने लाने के लिए।
अर्णब गोस्वामी की तारीफ इसलिए नहीं कि वे हर मुद्दे पर सही हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने दबाव के बावजूद सवाल पूछना नहीं छोड़ा। और आज की स्थिति में सबसे बड़ी जीत किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की नहीं, सच और स्वतंत्र पत्रकारिता की होनी चाहिए।
अँटीलिया प्रकरण की पूरी सच्चाई सामने आए, उस दौर की राजनीतिक और पुलिस भूमिका स्पष्ट हो और यदि पत्रकारिता को दबाने के लिए सत्ता का इस्तेमाल हुआ था तो उसकी जिम्मेदारी भी तय हो। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता अस्थायी है, राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन सवाल पूछने की आजादी और सच जानने का अधिकार ही लोकतंत्र की स्थायी ताकत है।
✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार


विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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