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पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) : भक्ति, कृपा और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर (17 मई से 15 जून 2026)

जब स्वयं भगवान ने एक उपेक्षित मास को अपना नाम दिया

सनातन धर्म की परंपराओं में प्रत्येक पर्व, व्रत और मास का अपना विशेष महत्व है, किन्तु वर्ष में आने वाला पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, अत्यंत दुर्लभ और दिव्य माना गया है। यह केवल एक कालखंड नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा का ऐसा आध्यात्मिक उत्सव है, जिसमें साधारण मनुष्य भी अल्प प्रयास से असाधारण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

पुरुषोत्तम मास - हरे कृष्ण!

आज की दुनिया में जब किसी बड़े उत्सव पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, मॉल्स और बाजारों में “महासेल” लगती है, तो लोग उत्साहपूर्वक खरीदारी करते हैं और अधिक लाभ लेने का प्रयास करते हैं। ठीक उसी प्रकार पुरुषोत्तम मास आध्यात्मिक जगत की “महाकृपा अवधि” है, जहाँ भगवान स्वयं भक्तों पर कृपा-वर्षा करते हैं। इस पावन महीने में किया गया जप, तप, दान, सेवा, कथा-श्रवण, भगवद्गीता पाठ, हरिनाम संकीर्तन और भक्ति साधना सामान्य दिनों की तुलना में हजारों गुना अधिक फलदायी मानी गई है।

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यह महीना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मा को भगवान से जोड़ने का अवसर है। यह वह समय है जब भटका हुआ मन पुनः प्रभु के चरणों की ओर लौट सकता है।

पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति : जब एक “त्यक्त मास” बना भगवान का प्रिय

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार चंद्र मास और सौर मास के बीच समय का अंतर संतुलित करने के लिए लगभग हर 32 महीने में एक अतिरिक्त मास आता है, जिसे “अधिक मास” कहा जाता है। प्रारंभ में इस मास का कोई स्वामी नहीं था। सभी शुभ कार्यों से इसे दूर रखा जाता था। विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य इस महीने में वर्जित माने गए।

इस कारण यह मास अत्यंत दुखी और अपमानित रहने लगा। सभी महीनों के बीच वह उपेक्षित और तिरस्कृत था। वह देवताओं के पास गया, किन्तु किसी ने उसे स्वीकार नहीं किया। अंततः वह भगवान विष्णु की शरण में पहुँचा और करुण स्वर में अपनी व्यथा सुनाई।

भगवान विष्णु उस मास की पीड़ा सुनकर अत्यंत द्रवित हो गए। उन्होंने कहा—

“आज से तुम केवल अधिक मास नहीं रहोगे। मैं स्वयं तुम्हें अपना नाम देता हूँ। तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ कहलाओगे, क्योंकि मैं पुरुषों में उत्तम अर्थात पुरुषोत्तम हूँ।”

 हरे कृष्ण!

भगवान ने यह भी वरदान दिया कि इस महीने में की गई भक्ति, जप, दान और साधना का फल अनेक गुना बढ़ जाएगा। तभी से यह मास सभी महीनों में श्रेष्ठ माना जाने लगा।

स्कंद पुराण, पद्म पुराण, नारद पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में पुरुषोत्तम मास की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। विशेष रूप से स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस मास में भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण की भक्ति करता है, उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

क्यों कहा जाता है इसे “भक्ति का महापर्व”?

पुरुषोत्तम मास केवल व्रत रखने का नाम नहीं है। यह आत्मा को शुद्ध करने और जीवन को भगवान की ओर मोड़ने का अवसर है।

आज मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भागते-भागते मानसिक तनाव, भय, असंतोष और अशांति से घिर चुका है। धन बढ़ रहा है, सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन मन की शांति दूर होती जा रही है। ऐसे समय में पुरुषोत्तम मास आत्मा के लिए एक दिव्य विश्राम है।

शास्त्र कहते हैं कि इस महीने में भगवान श्रीकृष्ण विशेष रूप से अपने भक्तों के समीप रहते हैं। जो व्यक्ति इस समय थोड़ी भी श्रद्धा से हरिनाम जप करता है, भगवद्गीता पढ़ता है, श्रीमद्भागवत सुनता है या भगवान को प्रेमपूर्वक भोग अर्पित करता है, उसे आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र प्राप्त होती है।

यह महीना हमें यह सिखाता है कि भगवान बाहरी वैभव नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची भावना देखते हैं। जिस प्रकार भगवान ने एक तिरस्कृत मास को अपना बना लिया, उसी प्रकार वे अपने पास आने वाले प्रत्येक जीव को स्वीकार कर लेते हैं।

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

शास्त्रों में इस मास के दौरान कुछ विशेष साधनाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्हें अत्यंत शुभ माना गया है—

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1. हरिनाम संकीर्तन और जप

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥”

इस महामंत्र का जप इस मास में विशेष फलदायी माना गया है। कहा जाता है कि हरिनाम स्वयं कलियुग का सबसे बड़ा आश्रय है।

2. भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत का पाठ

भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का श्रवण मन को निर्मल करता है। पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन गीता का एक अध्याय पढ़ना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

3. सात्विक जीवन

इस मास में मांसाहार, नशा, क्रोध, कटु वचन और तामसिक भोजन से दूर रहकर सात्विकता अपनाने का विशेष महत्व है।

4. दान और सेवा

गरीबों को भोजन कराना, गौसेवा, मंदिर सेवा, वस्त्र दान तथा जरूरतमंदों की सहायता करना इस महीने में अत्यंत शुभ माना गया है।

5. दीपदान और व्रत

प्रातः स्नान, भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी सेवा तथा दीपदान से घर में आध्यात्मिक वातावरण निर्मित होता है।

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श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर

पुरुषोत्तम मास हमें यह संदेश देता है कि भगवान के दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। जिस अधिक मास को संसार ने अस्वीकार कर दिया था, भगवान ने उसी को सबसे श्रेष्ठ बना दिया। यही भगवान की करुणा है।

आज का मनुष्य बाहरी सफलता के पीछे इतना दौड़ रहा है कि उसने अपने भीतर की आत्मा को भुला दिया है। पुरुषोत्तम मास हमें भीतर झाँकने का अवसर देता है। यह समय है स्वयं से पूछने का—

  • क्या मैं वास्तव में भगवान से जुड़ा हूँ?
  • क्या मेरा जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित रह गया है?
  • क्या मैंने कभी प्रभु के लिए समय निकाला?

श्रीकृष्ण कहते हैं—

“जो भक्त प्रेमपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ।”

भगवान को हमारे धन की आवश्यकता नहीं, उन्हें केवल प्रेम चाहिए। पुरुषोत्तम मास वही प्रेम जागृत करने का पवित्र अवसर है।

निष्कर्ष : जीवन बदलने वाला आध्यात्मिक उत्सव

पुरुषोत्तम मास कोई साधारण महीना नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण का विशेष निमंत्रण है। यह वह समय है जब थोड़ी सी भक्ति भी अनंत कृपा का कारण बन सकती है।

यदि कोई व्यक्ति इस मास में केवल इतना संकल्प ले ले कि वह प्रतिदिन कुछ समय भगवान का स्मरण करेगा, हरिनाम जपेगा और अपने जीवन को सात्विक बनाएगा, तो उसका जीवन धीरे-धीरे दिव्यता की ओर बढ़ने लगता है।

जिस प्रकार संसार की “महासेल” कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार यह दुर्लभ आध्यात्मिक अवसर भी सीमित समय के लिए आता है। इसलिए इसे केवल कैलेंडर का एक अतिरिक्त महीना न समझें। यह भगवान द्वारा दिया गया “भक्ति का पावन उपहार” है।

आइए, इस पुरुषोत्तम मास में हम सब मिलकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अपने जीवन को समर्पित करें और हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से अपने हृदय को निर्मल बनाएं।

हरे कृष्ण! 🙏

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हरे कृष्ण! 🙏
पुरुषोत्तम मास में किया गया प्रत्येक शुभ कार्य अनेक गुना फल प्रदान करता है।

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2 thoughts on “पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) : भक्ति, कृपा और आत्मशुद्धि का दिव्य अवसर (17 मई से 15 जून 2026)”

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