प्रसिद्ध लेखक, व्यंग्यकार, नाटककार, कवि एवं शोधपरक लेखक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी से विशेष बातचीत

कुछ बातचीत केवल बातचीत नहीं होतीं। वे हमें स्मृतियों की उन गलियों तक ले जाती हैं, जहाँ बचपन आज भी जीवित रहता है—पिता की उँगली, साइकिल की छोटी-सी सीट, नर्मदा का शांत प्रवाह, मेले-त्योहार, किताबों की खुशबू और जीवन को समझने की पहली जिज्ञासा।
विनय विमर्श के इस विशेष संवाद में हम ऐसे ही एक समृद्ध और बहुआयामी जीवन की यात्रा को समझने का प्रयास कर रहे हैं—एक ऐसे व्यक्तित्व की, जिनके भीतर आज भी वह जिज्ञासु बालक जीवित है, जो हर नई चीज को देखकर पूछता है—“यह ऐसा क्यों है? यह कैसे काम करता है? इसके पीछे की कहानी क्या है?”
मण्डला की धरती पर जन्मे और पले-बढ़े श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव का जीवन विज्ञान, साहित्य, संस्कृति और संवेदना का सुंदर संगम है। अभियंत्रिकी ने उन्हें तर्क, वैज्ञानिक दृष्टि और अनुशासन दिया, तो साहित्य ने संवेदना, कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति।
उनका साहित्यिक संस्कार किसी एक घटना से नहीं, बल्कि परिवार, पुस्तकों, कवि-गोष्ठियों, सांस्कृतिक परिवेश और जीवन को ध्यान से देखने की आदत से धीरे-धीरे निर्मित हुआ। जैसा कि वे स्वयं कहते हैं—
“मेरे लिए साहित्य की पहली पाठशाला मेरा घर था, पहला विश्वविद्यालय मेरा परिवेश था और पहला पाठ था—जीवन को ध्यान से देखना, सुनना और महसूस करना।”
आइये शुरू करते हैं श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी से यह विशेष बातचीत
विवेक जी, सबसे पहले आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।💐💐 और विनय विमर्श पर आपका हार्दिक स्वागत है
आज का यह विशेष दिन आपके जीवन में सुख, स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर सृजन लेकर आए। आपके भीतर की जिज्ञासा सदैव जीवित रहे, आपकी कलम निरंतर चलती रहे और आपके अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनते रहें।
उम्र बढ़ती रहे, लेकिन मन का वह जिज्ञासु बालक हमेशा जीवित रहे—यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
विनय विमर्श के इस मंच पर आपका हार्दिक अभिनन्दन और आत्मीय स्वागत है।
आपसे बातचीत मेरे लिए केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि आपके समृद्ध जीवन, अनुभवों और साहित्यिक यात्रा को करीब से समझने का अवसर है।
तो आइए, आपकी जीवन-यात्रा के उन पन्नों को पलटते हैं, जहाँ मण्डला का बचपन है, नर्मदा का प्रवाह है, पिता की स्मृतियाँ हैं, साहित्यिक संस्कार हैं और शब्दों से जीवन को समझने की एक निरंतर यात्रा है।

प्रश्न : मण्डला में बीता आपका बचपन कैसा था? बचपन में आपकी रुचियाँ किन चीजों में थीं और उस समय जीवन में कुछ बनने का आपका सपना क्या था? क्या आज के विवेक रंजन श्रीवास्तव में उस बच्चे की कोई इच्छा या सपना अभी भी जीवित है?
उत्तर
अरे वाह! आपके इस सवाल ने तो मुझे सीधे कोई साठ साल पीछे पहुँचा दिया। बचपन की स्मृतियाँ भी बड़ी अजीब होती हैं, समय बीत जाता है, हम बड़े हो जाते हैं, दुनिया बदल जाती है, लेकिन मन के किसी कोने में बचपन वैसा ही सुरक्षित रहता है। मण्डला में बीता मेरा बचपन भी मेरे भीतर आज तक उसी तरह जीवित है।
मेरी माँ बताया करती थीं कि मेरे जन्म के आसपास ही मण्डला में बिजली के कनेक्शन शुरू हुए थे। शहर में बिजली की आपूर्ति डीजल जनरेटर से होती थी। अब इसे संयोग कहिए या कुछ और, लेकिन लगता है कि बिजली से मेरा कोई न कोई नाता प्रारब्ध से ही रहा है!
मेरे बचपन की सबसे सुंदर स्मृतियों में मेरे पिता के साथ बिताई गई शामें हैं। कभी उनकी साइकिल के सामने डंडे पर लगी छोटी-सी सीट पर बैठकर, तो कभी उनकी उँगली पकड़कर, मैं उनके साथ घूमता था। रास्ते भर उनसे बातें होती थीं। शायद उन छोटी-छोटी यात्राओं में ही मैंने दुनिया को पहली बार समझना शुरू किया था।
मेरा बचपन प्रकृति, संस्कृति और साहित्य, इन तीनों की संयुक्त पाठशाला में बीता। एक ओर नर्मदा का शांत और विराट प्रवाह था, दूसरी ओर आसपास के जंगल और उनमें बसी प्रकृति की अपनी दुनिया। जनजातीय जीवन की सहजता और उसकी अपनी सांस्कृतिक लय थी। पिता के साथ इतवारी बाजार की चहल-पहल देखना था। दीपावली पर मड़ई का उत्साह था, होली पर मण्डला के निकट हृदयनगर का विशाल वार्षिक पशुमेला था और संक्रांति पर संगम का बड़ा मेला।
छोटे शहर का जीवन भी अपने आप में एक अनुभव होता है। वहाँ लोग एक-दूसरे को जानते हैं, एक-दूसरे .के सुख-दुःख में शामिल होते हैं। आते जाते घरों के बाहर बैठे लोग एक दूसरे की खैर खबर लिया करते हैं।बाजार, मेले, त्योहार, नदी, जंगल और घर-परिवार, सब मिलकर जीवन का हिस्सा होते हैं। मेरे व्यक्तित्व की नींव इन्हीं अनुभवों के बीच पड़ी।
आज जब आपने उन दिनों को याद दिलाई , तो लगता है कि जीवन की पूँजी वही अनुभव और संस्कार हैं, जो बचपन में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के, अनायास मिल गए हैं। उस समय हमें पता भी नहीं होता कि हम जो देख रहे हैं, जो सुन रहे हैं और जिस वातावरण में जी रहे हैं, वही परिवेश आगे चलकर हमारे व्यक्तित्व और हमारी सोच का हिस्सा बन जाएगा।
बचपन में मेरी रुचियाँ बहुत विविध थीं। विज्ञान मुझे जितना आकर्षित करता था, सायकिल में टायर पर लगा डायनमो कैसे बिजली बनाता था , बचपन में ही समझ लिया था । स्कूल के विज्ञान मॉडल प्रतियोगिता में हिस्सा लेता था। साहित्य भी उतना ही प्रिय था। बाल पत्रिका ‘चंपक’, ‘नंदन’, ‘पराग’ पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता था। इंदौर से प्रकाशित होने वाला ‘बच्चों का अखबार’ भी मैं बड़े चाव से पढ़ता था। किताबें पढ़ना, रेडियो सुनना, नए-नए उपकरणों को समझने की कोशिश करना, चित्र बनाना और प्रकृति को निहारना, इन सबमें मुझे आनंद मिलता था।
मुझे आज भी याद है कि ‘बच्चों का अखबार’ में मेरी एक बाल कविता, ‘बिल्ली बोली म्याऊँ-म्याऊँ’प्रकाशित हुई थी। उस समय वह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी थी। लेकिन तब मैंने यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि मैं बड़ा होकर लेखक बनूँगा। लेखन तब मेरे लिए कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि मन की सहज अभिव्यक्ति था।
हाँ, किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते मेरे भीतर एक इच्छा जरूर आकार लेने लगी थी, मैं ऐसा जीवन जीना चाहता था जिसमें सीखने और कुछ नया करने का अवसर कभी समाप्त न हो। मैं पढ़ाई में मेधावी था और मुझे नई चीजें जानने में हमेशा आनंद आता था।
स्कूल में प्रवेश की मेरी कहानी भी थोड़ी अलग है। मैंने कक्षा पहली में पढ़ाई ही नहीं की। मेरे माता-पिता दोनों शिक्षा विभाग में थे। उन दिनों बच्चों की उम्र का अनुमान लगाने का एक अपना तरीका था। एक हाथ को सिर के ऊपर से दूसरी तरफ ले जाकर कान पकड़वाया जाता था। फिर कुछ सवाल-जवाब होते थे और हेडमास्टर जी तय करते थे कि बच्चे को किस कक्षा में प्रवेश दिया जाए। मेरे साथ भी यही हुआ , गुरु जी श्री तुरकर मास्साब जी ने मुझ से सवाल जवाब किए , और मुझे सीधे कक्षा दूसरी में प्रवेश मिल गया। इस तरह मैं जीवन भर अपनी कक्षा में सबसे कम आयु का विद्यार्थी रहा।
स्कूल और कॉलेज के दिनों में निबंध प्रतियोगिताएँ, वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताएँ मेरी प्रिय गतिविधियाँ थीं। इनमें मुझे पुरस्कार भी खूब मिले। समय के साथ उन पुरस्कारों में से बहुत कुछ इधर-उधर हो गया, लेकिन प्रतियोगिताओं में मिली किताबें आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। इसलिए मैं अक्सर कहता हूँ, किताबें सबसे श्रेष्ठ उपहार होती हैं।
मेरे जीवन में विज्ञान और साहित्य दोनों साथ-साथ चलते रहे। अभियंत्रिकी ने मुझे तर्क, वैज्ञानिक दृष्टि और अनुशासन दिया, जबकि साहित्य ने संवेदना, कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे व्यक्तित्व के ये दोनों पक्ष कहीं न कहीं उसी बचपन में आकार लेने लगे थे।
आपने जानना चाहा है कि आज के विवेक रंजन श्रीवास्तव में क्या उस बच्चे का कोई सपना अभी भी जीवित है?
हाँ, बिल्कुल। वह बच्चा आज भी मेरे भीतर है। वही जिज्ञासु बच्चा, जो किसी नई चीज को देखकर पूछता है , पापा यह ऐसा क्यों है? यह कैसे काम करता है? इसके पीछे की कहानी क्या है? वही बच्चा मुझे हर नई पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। वही किसी सामाजिक विसंगति को देखकर प्रश्न उठाता है। वही किसी नए विषय को समझने की बेचैनी पैदा करता है और फिर उसके बारे में लिखने का साहस देता है।
उम्र बढ़ती है, लेकिन यदि जिज्ञासा जीवित रहे तो मन कभी उम्रदराज नहीं होता।
आज मेरे बच्चों के माध्यम से भी मुझे दुनिया भर को घूमने तथा नए ढंग से देखने और समझने के अनेक अवसर मिलते हैं। नई पीढ़ी के अनुभव, उसकी सोच, उसकी तकनीक और उसके बदलते हुए जीवन को देखकर मेरा वही पुराना जिज्ञासु मन फिर सक्रिय हो उठता है। मैं चीजों को केवल देखना नहीं चाहता, उन्हें समझना चाहता हूँ। और जो समझ में आता है, उसे दूसरों के साथ बाँटने की इच्छा होती है। नया सीखने की इच्छा सदैव मुझ पर हावी होती है।
इसलिए मेरे अनुभव कभी डायरी बन जाते हैं, कभी संस्मरण, कभी कविता, कभी निबंध और कभी किसी अन्य विधा में शब्दों का रूप ले लेते हैं।
सोचता हूं शायद बचपन में मेरे भीतर जो सबसे बड़ा सपना रहा होगा , वह किसी एक पद या पेशे का सपना नहीं था। वह था, सीखते रहना, जिज्ञासु बने रहना और जीवन को लगातार नए ढंग से समझते रहना।
आज भी वही सपना मेरे भीतर जीवित है।
मण्डला का वह बच्चा, जो कभी पिता की साइकिल के आगे बैठकर शहर की गलियों में घूमता था, आज भी मेरे भीतर कहीं बैठा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब उसकी दुनिया मण्डला की गलियों, नर्मदा के तट, जंगलों, मेलों और किताबों तक फैली थी; आज दुनिया बहुत बड़ी हो गई है। लेकिन उसे देखने, समझने और जानने की उत्सुकता अब भी वैसी ही है। यह ताकत जिज्ञासा और किताबों से ही मिलती है।
शायद मेरी सबसे बड़ी खुशी यही है कि जीवन ने मुझे उस बच्चे को बड़ा तो होने दिया, लेकिन उसे मेरे भीतर से जाने नहीं दिया।
प्रश्न : आप एक समृद्ध साहित्यिक परिवार में जन्मे। परिवार और बचपन के वातावरण ने आपके भीतर साहित्य के बीज किस तरह बोए? क्या कोई ऐसी पारिवारिक स्मृति या व्यक्ति है, जिसे आप अपने साहित्यिक संस्कारों की पहली प्रेरणा मानते हैं?
उत्तर
मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता था, बल्कि जिया जाता था। हमारे घर में पुस्तकों की उपस्थिति उतनी ही स्वाभाविक थी, जितनी परिवार के सदस्यों की। किताबें अलमारियों में बंद रहने वाली वस्तुएँ नहीं थीं। वे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं। घर में साहित्यिक चर्चाएँ होती थीं, कविताएँ पढ़ी और सुनाई जाती थीं, लेखन पर बातचीत होती थी और शब्दों के साथ जीने का एक सहज संस्कार वातावरण में घुला हुआ था। मम्मी पापा की आपस की स्कूल की दिन भर की बातें, शहर की साहित्यिक सांस्कृतिक चर्चा में बड़ा होते होते मैं भी भागीदार बनता गया।
मेरे लिए साहित्य का पहला परिचय किसी किताब के पन्नों से कम और घर के वातावरण से अधिक हुआ। मैंने देखा कि कविता केवल कागज पर लिखी हुई पंक्तियाँ नहीं होती, वह जीवन को देखने का एक तरीका भी हो सकती है। शब्द केवल सूचना देने के लिए नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर की संवेदना को छू सकते हैं, समाज के प्रश्नों को सामने ला सकते हैं और समय की स्मृतियों को सुरक्षित रख सकते हैं।
मेरे पिताजी और परिवार के सदस्यों ने मुझे कभी यह नहीं कहा कि मुझे लेखक बनना चाहिए। उन्होंने मुझे लेखन का कोई लक्ष्य भी नहीं दिया। इसके बजाय उन्होंने मेरे भीतर एक अच्छे पाठक को विकसित किया। मुझे पढ़ने की आदत दी, सुनने की आदत दी और सबसे महत्वपूर्ण, ध्यान से देखने की आदत दी।
बचपन में मैं पिताजी के साथ कवि-गोष्ठियों, मुशायरों और नाटकों में जाया करता था। उस समय शायद मुझे यह पूरी तरह समझ में नहीं आता था कि इन अनुभवों का मेरे व्यक्तित्व पर कितना गहरा प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वे शामें, वे मंच, कवियों की आवाजें, श्रोताओं की प्रतिक्रियाएँ और साहित्य को लेकर होने वाली चर्चाएँ मेरे लिए किसी अनौपचारिक साहित्यिक पाठशाला से कम नहीं थीं।
पिताजी मुझे हर दिन नोट्स बनाने के लिए भी कहते थे। दिन भर में मैंने क्या पढ़ा, क्या सुना, क्या देखा, उसे लिखने की आदत उन्होंने डाली। उस समय यह एक सामान्य-सा अभ्यास लगता था, कई बार बोरिंग भी , लेकिन बाद में समझ आया कि यह केवल नोट्स लिखना नहीं था , यह जीवन को ध्यान से देखने और अनुभवों को शब्दों में दर्ज करने का अभ्यास था।
मेरा मानना है कि अच्छा लेखक बनने से पहले अच्छा पाठक बनना जरूरी है। जो व्यक्ति पढ़ता है, वह दूसरों के अनुभवों से गुजरता है। वह अलग-अलग जीवनों को समझता है, अलग-अलग दृष्टियों से परिचित होता है और धीरे-धीरे उसकी अपनी दृष्टि भी व्यापक होती जाती है। शायद मेरे लेखकीय संस्कारों की पहली और सबसे महत्वपूर्ण नींव यही थी, पढ़ना, सुनना, देखना और फिर उसे अपने भीतर उतरने देना। शब्दों से मानस पटल पर चित्र बनाना ।
मेरे साहित्यिक संस्कारों में मेरे माता-पिता की भूमिका स्वाभाविक रूप से बहुत महत्वपूर्ण रही है। मेरी माँ की अपनी प्रकाशित पुस्तकें हैं। मेरे पिताजी साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार थे। उन्होंने भगवद्गीता, रघुवंश और मेघदूत जैसे कालजयी ग्रंथों का हिंदी में छंदबद्ध काव्य-अनुवाद किया, जिसके लिए उन्हें गार्गी सम्मान भी प्राप्त हुआ। उनकी रचनात्मकता में आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय भावधारा का सुंदर समन्वय था। उनके लिए साहित्य केवल सौंदर्यबोध नहीं था। उसमें जीवन-दृष्टि भी थी, संस्कृति का बोध भी था और राष्ट्र के प्रति संवेदनशीलता भी।
मेरे दादाजी की स्मृतियाँ भी पिता जी बताया करते थे, स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में मण्डला के नवयुवक प्रभात फेरियों में उनके गीत गाया करते थे। जब मैं आज इस बात को याद करता हूँ, तो यह मेरे लिए केवल परिवार की एक गौरवपूर्ण स्मृति नहीं रह जाती। यह उस समय के मण्डला के सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन की एक जीवंत तस्वीर बन जाती है।
कल्पना करता हूं, स्वतंत्रता आंदोलन का दौर है, मण्डला की गलियों में सुबह का उजाला फैल रहा है, नवयुवकों की टोली प्रभात फेरी में निकल रही है और उनके कंठ से देशभक्ति के गीत गूँज रहे हैं। उन गीतों के रचयिता मेरे दादाजी थे। उस समय मैं वहाँ उपस्थित नहीं था, लेकिन परिवार की स्मृतियों और बाद में सुनी गई उन कहानियों ने मेरे भीतर इतिहास और साहित्य के उस संबंध को गहराई से स्थापित किया, जिसमें शब्द केवल शब्द नहीं रहते, वे समय की आवाज बन जाते हैं।
शायद यही कारण है कि मेरे लिए साहित्य की कोई एक निश्चित शुरुआत बताना कठिन है। यदि कोई पूछे कि मेरे भीतर साहित्य का पहला बीज किसने बोया, तो मैं किसी एक व्यक्ति का नाम लेकर उस कहानी को सीमित नहीं कर सकता। मेरे पिताजी ने मुझे पढ़ने और लिखने की अनुशासनपूर्ण दृष्टि दी, मेरी माँ की अपनी साहित्यिक सक्रियता ने घर में रचनात्मकता का वातावरण बनाए रखा, दादाजी की रचनाएँ और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी उनकी स्मृतियाँ मेरे लिए साहित्य की सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका का परिचय बनीं और मण्डला के सांस्कृतिक परिवेश ने इन सबको जीवन की वास्तविक मिट्टी दी।
इसलिए मैं कहूँगा कि मेरे साहित्यिक संस्कार पूरे पारिवारिक और सांस्कृतिक विरासत की देन हैं। एक ही व्यक्ति का नाम लेना हो तो मैं स्पष्ट रूप से अपने स्व पिता जी को याद कर सकता हूं।
लेखक शायद किसी पाठ्यक्रम से नहीं बनता और न ही किसी एक घटना से। वह अनेक छोटी-छोटी स्मृतियों, अनुभवों, पाठों, संवादों और संस्कारों से शनैः शनैः निर्मित होता है। बचपन में सुनी हुई कोई कविता, किसी पुस्तक का कोई वाक्य, पिता के साथ सुनी हुई कोई कवि-गोष्ठी, किसी नाटक का कोई दृश्य, किसी बुजुर्ग की कही हुई कोई बात या किसी सामाजिक घटना का मन पर पड़ा प्रभाव, ये सब मिलकर भीतर कहीं जमा होते रहते हैं। फिर किसी दिन कोई अनुभव उन्हें छूता है और वे शब्दों में बाहर आने लगते हैं।
परिवार ने मुझे भाषा दी, साहित्य ने दृष्टि दी, परिवेश ने संवेदना दी, समाज ने विषय दिए और जीवन ने उन सबको अभिव्यक्ति का अवसर दिया।
आज जब मैं अपने लेखन की ओर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे उसमें अपने परिवार की छाया अवश्य दिखाई देती है। लेकिन यह छाया किसी अनुकरण की नहीं है। मैंने अपने पूर्वजों और माता-पिता से साहित्य की विरासत तो पाई, लेकिन अपने समय और अपने अनुभवों के प्रश्नों से अपनी भाषा और अपनी अभिव्यक्ति स्वयं तलाशने की कोशिश की।
मेरे लिए यह भी महत्वपूर्ण रहा कि परिवार में साहित्य का वातावरण होने के बावजूद लेखन को कभी किसी विशेष उपलब्धि या प्रतिष्ठा के रूप में मेरे सामने नहीं रखा गया। साहित्य हमारे जीवन का सहज हिस्सा था। शायद इसी कारण वह मेरे भीतर किसी दबाव या महत्वाकांक्षा के रूप में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक स्वाभाविक प्रवृत्ति के रूप में विकसित हुआ।
मुझे लगता है कि साहित्य का सबसे गहरा संस्कार वही होता है, जो बिना बताए मिल जाए।
जिस घर में बच्चा यह देखता हुआ बड़ा होता है कि पिता किताब पढ़ रहे हैं, माँ लिख रही हैं, घर में साहित्य पर चर्चा हो रही है, कवि-गोष्ठियों में जाना हो रहा है, कोई कविता सुनकर उस पर बात हो रही है और किसी सामाजिक घटना को केवल घटना मानकर छोड़ देने के बजाय उसके अर्थ पर विचार किया जा रहा है, वहाँ साहित्य धीरे-धीरे जीवन-दृष्टि का हिस्सा बन जाता है। मेरे बचपन में यही हुआ।
शायद इसलिए आज भी मेरे लिए लिखना केवल साहित्यिक कर्म नहीं है। यह अपने समय को समझने की एक कोशिश है। जो कुछ देखता हूँ, जो कुछ पढ़ता हूँ, जो अनुभव करता हूँ और जो भीतर प्रश्न पैदा करता है, उसे शब्दों में व्यक्त करने की इच्छा होती है। कभी वह कविता बन जाता है, कभी संस्मरण, कभी डायरी, कभी निबंध और कभी किसी अन्य विधा में आकार लेता है।शायद यही मेरे साहित्यिक परिवार की सबसे बड़ी विरासत है, मुझे लेखक बनने का आदेश नहीं मिला, बल्कि जीवन को पढ़ना सिखाया गया।
पिताजी ने मुझे किताबों के पास बैठाया, परिवार ने साहित्य के बीच बड़ा किया, दादाजी की स्मृतियों ने शब्दों की सामाजिक शक्ति का परिचय कराया और मण्डला ने मुझे जीवन के विविध रंग दिखाए। इन सबने मिलकर मेरे भीतर जो संस्कार बोए, वे समय के साथ अंकुरित होते रहे।
आज भी जब मैं लिखने बैठता हूँ, तो कहीं न कहीं वह बच्चा मेरे साथ बैठा होता है, जो कभी पिता के साथ कवि-गोष्ठी में गया था, जिसने पहली बार किसी कविता को ध्यान से सुना था, जिसने किताबों को अपना साथी बनाया था और जिसे हर दिन कुछ पढ़ने, कुछ सुनने और कुछ लिखकर सुरक्षित रखने की आदत दी गई थी।
इस अर्थ में यदि मुझे अपने साहित्यिक संस्कारों की पहली प्रेरणा को एक वाक्य में कहना हो, तो मैं यही कहूँगा, कि
मेरे लिए साहित्य की पहली पाठशाला मेरा घर था, पहला विश्वविद्यालय मेरा परिवेश था और पहला पाठ था, जीवन को ध्यान से देखना, सुनना और महसूस करना।
शायद उसी पाठ की निरंतरता में आज भी मेरा लेखन चल रहा है। अब पात्र बदल गए हैं, मेरी पत्नी जो स्वयं एक साहित्यिक परिवार से है, वह मेरी रचनाओं की पहली क्रिटिक होती है। साहित्य , संस्कृति पर वैसी ही चर्चाएं घर में होती हैं।
प्रश्न : आपने अभियंत्रिकी की पढ़ाई की और विद्युत मंडल में मुख्य अभियंता के रूप में लंबा कार्यकाल बिताया। एक अभियंता से साहित्यकार बनने और फिर साहित्य के माध्यम से समाज को देखने की आपकी पूरी यात्रा कैसी रही?क्या यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ या जीवन में कोई ऐसा निर्णायक क्षण आया जिसने आपको साहित्य की ओर पूरी तरह मोड़ दिया?
उत्तर
मैं इसे किसी परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि जीवन की एक समानांतर और स्वाभाविक यात्रा मानता हूँ। अभियंत्रिकी मेरा पेशा था, जबकि साहित्य मेरे भीतर की सहज प्रवृत्ति। दोनों कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे के परिपूरक बनकर मेरे जीवन को समृद्ध करते रहे। दिन के समय मैं विद्युत व्यवस्था की जटिल तकनीकी समस्याओं के समाधान में व्यस्त रहता था, और जब भी अवसर मिलता, मन के भीतर उमड़ते विचारों को शब्दों में ढालकर मनुष्य, समाज और उसकी विसंगतियों को समझने का प्रयास करता था। यह अभिव्यक्ति प्रक्रिया मेरी अपनी मानसिक थकान उतारने का तरीका बन गया था।
मुख्य अभियंता के रूप में कार्य करते हुए मुझे गाँवों, कस्बों और शहरों के जीवन को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला। वहाँ केवल तकनीकी चुनौतियाँ ही नहीं थीं, बल्कि गहरे सामाजिक, आर्थिक और मानवीय प्रश्न भी थे। इन अनुभवों ने मेरे भीतर संवेदना और दृष्टि दोनों को विकसित किया और आगे चलकर मेरे व्यंग्य, नाटकों तथा लेखों की आधारभूमि बने।
मेरे लिए साहित्य किसी एक निर्णायक क्षण की देन नहीं था, बल्कि यह जीवन के साथ-साथ धीरे-धीरे विकसित होने वाली एक सतत प्रक्रिया रही है। अभियंत्रिकी ने मुझे समस्याओं का तार्किक विश्लेषण करना सिखाया, जबकि साहित्य ने उन समस्याओं के भीतर छिपे मनुष्य को देखने और समझने की दृष्टि दी। इसी संतुलन के कारण मेरे लेखन में अनुभव की यथार्थता और संवेदना की गहराई दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं।
इस प्रकार, अभियंता से साहित्यकार बनने की मेरी यात्रा किसी एक मोड़ की नहीं, बल्कि जीवन के साथ निरंतर बहती हुई एक ऐसी धारा है, जिसमें अनुभव, संवेदना और अभिव्यक्ति, तीनों एक साथ प्रवाहित होते रहे हैं।
प्रश्न :. एक अभियंता समस्याओं को तर्क, संरचना और समाधान की दृष्टि से देखता है, जबकि साहित्यकार मनुष्य, भावनाओं और संवेदनाओं की दृष्टि से। आपके भीतर का अभियंता और साहित्यकार जब किसी सामाजिक समस्या को देखते हैं, तो दोनों में से किसकी दृष्टि अधिक प्रभावी रहती है?
उत्तर
मेरे भीतर अभियंता और साहित्यकार दो अलग-अलग व्यक्ति नहीं हैं। वे एक ही मन के दो पक्ष हैं और मुझे लगता है कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परिपूरक हैं। जीवन को समझने और समाज को देखने में दोनों ने मुझे अपनी-अपनी तरह से समृद्ध किया है।
एक अभियंता किसी समस्या को देखकर सबसे पहले यह जानना चाहता है कि समस्या है क्या, उसका मूल कारण कहाँ है, उसकी संरचना कैसी है और उसका समाधान किस प्रकार संभव है। वह समस्या को केवल स्वीकार नहीं करता, उसके पीछे की प्रक्रिया और कारण-परिणाम के संबंध को समझने की कोशिश करता है। ऑप्टिमम रिसोर्स से वह समस्या को हल करना चाहता है।
साहित्यकार की दृष्टि किंचित भिन्न होती है। वह यह पूछता है कि उस समस्या का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? उसके कारण किसकी जिंदगी बदल रही है? किसके सपने टूट रहे हैं? किसके भीतर कोई मौन पीड़ा जन्म ले रही है? वह आँकड़ों के पीछे छिपे मनुष्य को देखना चाहता है।
मेरे लिए इन दोनों दृष्टियों का साथ मिलना ही सबसे महत्वपूर्ण है।
जब मैं किसी सामाजिक समस्या को देखता हूँ, तो मेरे भीतर का अभियंता उसके कारण और समाधान की तलाश करता है, जबकि साहित्यकार उसके मानवीय पक्ष को समझने की कोशिश करता है। अभियंता पूछता है, ‘इसे ठीक कैसे किया जा सकता है?’ और साहित्यकार पूछता है, ‘इससे प्रभावित मनुष्य के साथ क्या हो रहा है?’
मेरा विश्वास है कि केवल तर्क से समाज नहीं चलता और केवल संवेदना से समाज की समस्याएँ हल नहीं होतीं। यदि तर्क हो, लेकिन संवेदना न हो, तो समाधान बहुत बार यांत्रिक और अमानवीय हो सकता है। दूसरी ओर, यदि संवेदना तो हो, लेकिन तर्क और व्यावहारिकता न हो, तो हम पीड़ा को समझ तो सकते हैं, लेकिन उसके समाधान तक पहुँच पाना कठिन हो जाता है।
इसलिए मैं किसी एक को अधिक प्रभावी नहीं मानता। मेरे लिए वास्तविक प्रभावशीलता उस बिंदु पर है, जहाँ तर्क संवेदना से मिलता है और संवेदना समाधान की दिशा में आगे बढ़ती है।
शायद यही कारण है कि मेरी दृष्टि में किसी भी सामाजिक समस्या का समाधान केवल व्यवस्था बदलने से नहीं होता; मनुष्य को समझे बिना व्यवस्था भी अधूरी रहती है। सड़क, पुल, भवन या कोई तकनीकी संरचना बनाना अभियंता का काम हो सकता है, लेकिन समाज की वास्तविक संरचना मनुष्यों से बनती है। वहाँ केवल गणना पर्याप्त नहीं होती। वहाँ विश्वास, संबंध, न्याय, संवेदना और मानवीय गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
मेरे लेखन में भी इन दोनों दृष्टियों का प्रभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से जब मैं व्यंग्य लिखता हूँ, तो मेरा उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था की आलोचना करना नहीं होता। व्यंग्य मेरे लिए समाज को आईना दिखाने का एक माध्यम है। मैं चाहता हूँ कि पाठक पहले मुस्कुराए, फिर उस मुस्कान के पीछे छिपी विडंबना को पहचाने और अंततः स्वयं से कोई प्रश्न पूछे। वहीं ना रुके उसे किसी हल तक पहुंचाना मेरा लेखन में देखा जा सकता है। शायद इसलिए ही इंदौर से प्रसिद्ध आलोचक सुषमा जी ने मुझे व्यंग्य का वैज्ञानिक लिखा है। जबलपुर की प्रोफेसर डा स्मृति शुक्ल ने मेरे व्यंग्य में परसाई , जोशी और त्यागी जी का ट्रिपाइड ढूंढ निकाला है।
व्यंग्य में भी मुझे लगता है कि अभियंता और साहित्यकार साथ-साथ चलते हैं। अभियंता विसंगति की संरचना पहचानता है, यह व्यवस्था कहाँ और कैसे असंतुलित हुई। साहित्यकार उस विसंगति के भीतर छिपे मानवीय पक्ष को सामने लाता है। एक उसकी बनावट समझता है, दूसरा उसकी पीड़ा।
शायद इसी कारण मेरे लिए लेखन केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि विचार की भी प्रक्रिया है। मैं किसी विषय को महसूस करना चाहता हूँ, लेकिन उसके पीछे के कारणों को समझना भी चाहता हूँ। मैं प्रश्न उठाना चाहता हूँ, लेकिन जहाँ संभव हो वहाँ समाधान की संभावना को भी तलाशना चाहता हूँ।
अगर मुझे अपने भीतर के अभियंता और साहित्यकार में से किसी एक को चुनना ही पड़े, तो शायद मैं ऐसा कर ही न पाऊँ। क्योंकि मेरे लिए दोनों ने मिलकर ही मेरी दृष्टि बनाई है।
अभियंता ने मुझे सिखाया कि किसी समस्या की जड़ तक कैसे पहुँचना है और साहित्यकार ने सिखाया कि उस जड़ से जुड़े मनुष्यों को कैसे देखना है। अभियंता समाधान खोजता है, साहित्यकार यह सुनिश्चित करता है कि समाधान में मनुष्य कहीं खो न जाए।
मेरे लिए यही संतुलन सार्थक है।कह सकता हूँ कि मेरे भीतर का अभियंता पूछता है, ‘समस्या का समाधान क्या है?’और भीतर का साहित्यकार धीरे से पूछता है ‘समाधान करते समय मनुष्य का क्या होगा?’
शायद मेरे लेखन और मेरी सामाजिक दृष्टि की सबसे बड़ी ताकत इन्हीं दोनों प्रश्नों के बीच कहीं स्थित है।
अभियंता का ऑप्टिमम रिसोर्स यूटिलाइजेशन मेरे साहित्यकार को शब्दों को वेस्ट नहीं करने देता । मेरी कविताये न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कहना चाहती हैं।
प्रश्न : आपने नौकरी, तकनीकी जिम्मेदारियों और पारिवारिक जीवन के साथ निरंतर लेखन किया। क्या लेखन आपके लिए समय मिलने पर किया जाने वाला काम था या जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी एक ऐसी आंतरिक आवश्यकता, जिसे टाला नहीं जा सकता था?
उत्तर
मेरे लिए लेखन कभी शौक भर नहीं रहा। यदि ऐसा होता, तो नौकरी की व्यस्तताओं के बीच वह बहुत पहले छूट गया होता। मेरे लिए लेखन आत्मसंवाद का माध्यम रहा है। जब कोई विचार भीतर लगातार दस्तक देता है, तब उसे शब्द देना विवशता हो जाता है।
मैंने कभी यह प्रतीक्षा नहीं की कि एक दिन पूरा समय मिलेगा, तब लिखूँगा। किसी के जीवन में ऐसा दिन शायद कभी नहीं आता। मैंने समय निकाला, समय बनाया और कई बार समय से भी संघर्ष किया। यही कारण है कि अभियंत्रिकी की जिम्मेदारियों के साथ-साथ लेखन की निरंतरता बनी रही। कई बार विधा परिवर्तन जरूर किया, कविता में कम में बड़ी बात कहने का यत्न किया । अमिधा में सीधे निबंध में समझाने की जगह लक्षणा और व्यंजना में व्यंग्य किए । कई बार डायरी में या फोन के नोट पेड पर विचार का हिंट लिखकर बाद में उसे डेवलप किया , फिर भी कई रचनाये गर्भ में ही रह गईं।
मेरा मानना है कि लेखक पहले जीवन जीता है, फिर लिखता है। नौकरी, परिवार, समाज और लोगों के बीच रहने से जो अनुभव मिले, वही मेरी सबसे बड़ी साहित्यिक पूँजी बने। यदि जीवन में अनुभव न हों, तो शब्द केवल कथन रह जाते हैं । वे साहित्य नहीं बन पाते।
प्रश्न :. आप व्यंग्य, नाटक, कविता, जीवनी, वैज्ञानिक-तकनीकी लेखन और पुस्तक समीक्षा, लगभग हर प्रमुख विधा में सक्रिय रहे हैं। क्या आप स्वयं को किसी एक विधा में सबसे अधिक सहज महसूस करते हैं या हर विषय अपने लिए अलग विधा चुनकर आपके पास आता है?
उत्तर
मैंने अपने लेखन जीवन में कभी यह तय नहीं किया कि मुझे केवल व्यंग्यकार बनना है, केवल कवि या नाटककार बनना है। मेरे लिए विधा कभी साध्य नहीं रही, वह हमेशा अभिव्यक्ति का साधन रही है। मैं किसी विषय को पहले से किसी निश्चित विधा के साँचे में ढालने के बजाय उसे उसकी प्रकृति के अनुरूप व्यक्त करना अधिक स्वाभाविक मानता हूँ।
कई बार कोई सामाजिक विसंगति भीतर बेचैनी पैदा करती है। वह बेचैनी धीरे-धीरे प्रश्न में बदलती है और फिर व्यंग्य का रूप ले लेती है। व्यंग्य मेरे लिए केवल हँसाने या किसी पर कटाक्ष करने का माध्यम नहीं है। उसकी सार्थकता तभी है, जब मुस्कान के पीछे कोई गंभीर प्रश्न छिपा हो और पाठक हँसने के बाद कुछ क्षण ठहरकर सोचने को विवश हो।
कभी कोई ऐतिहासिक या जीवंत व्यक्तित्व अपने समय, संघर्ष और विचारों के साथ मेरे सामने आता है, तो उसके जीवन को समझने के लिए जीवनी , उपन्यासिक अभिव्यक्ति या संस्मरण का सहारा लेना पड़ता है। कोई प्रसंग दर्शक संवाद माँगता है, तो वह नाटक की ओर चला जाता है। कोई अनुभूति इतनी सघन होती है कि उसे विस्तार की आवश्यकता नहीं होती, कुछ पंक्तियाँ ही पर्याप्त लगती हैं, तो वह कविता बन जाती है। प्रकृति, पर्यावरण और मनुष्य के साथ हमारे संबंधों को भी कई बार कविता अधिक गहराई से व्यक्त कर पाती है, तो कभी नाटक या गद्य। बाल कहानियां, लघुकथा आदि भी विशिष्ट और विषय सापेक्ष होती हैं।
इसी तरह, अभियंत्रिकी और विज्ञान की मेरी पृष्ठभूमि ने मुझे वैज्ञानिक एवं तकनीकी लेखन की ओर भी स्वाभाविक रूप से प्रेरित किया। मेरे लिए विज्ञान और साहित्य कभी दो विरोधी संसार नहीं रहे। विज्ञान हमें बताता है कि कोई चीज कैसे काम करती है, जबकि साहित्य कई बार यह समझने में सहायता करता है कि उसका मनुष्य और समाज पर क्या अर्थ है। एक ज्ञान देता है, दूसरा उस ज्ञान को मानवीय संदर्भ देता है।
मेरा मानना है कि ज्ञान तभी अधिक सार्थक होता है, जब वह समाज तक सरल, स्पष्ट और बोधगम्य भाषा में पहुँच सके। यदि कोई वैज्ञानिक या तकनीकी विचार केवल विशेषज्ञों की भाषा तक सीमित रह जाए, तो उसका सामाजिक प्रभाव भी सीमित हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिक लेखन में भी मैं भाषा को केवल सूचना का माध्यम नहीं, संवाद का माध्यम मानता हूँ।
पुस्तक समीक्षा भी मेरे लिए इसी व्यापक साहित्यिक यात्रा का हिस्सा है। किसी पुस्तक को पढ़ना केवल उसके बारे में राय देना नहीं है। वह लेखक के विचार-संसार में प्रवेश करना, उसकी दृष्टि को समझना और फिर पाठकों के सामने उस पुस्तक के महत्व को अपने ढंग से रखने की प्रक्रिया है। इस अर्थ में समीक्षा भी एक तरह का संवाद है। लेखक, पुस्तक और पाठक के बीच का चश्मा मेरा पुस्तक चर्चा स्तंभ है।
शायद मेरे लेखन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि मैं विधाओं के बीच कोई कठोर दीवार नहीं देखता। एक विधा में अर्जित अनुभव दूसरी विधा में भी काम आता है। कविता संवेदना को गहरा करती है, नाटक संवाद की शक्ति सिखाता है, व्यंग्य विसंगतियों को पहचानना सिखाता है, जीवनी मनुष्य और समय के संबंध को समझाती है, विज्ञान तर्क देता है और पुस्तक समीक्षा आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करती है। ये सभी अनुभव अंततः एक-दूसरे में कहीं न कहीं घुलते-मिलते रहते हैं।
इसलिए यदि मुझसे पूछा जाए कि मेरी सबसे प्रिय या सबसे सहज विधा कौन-सी है, तो शायद मैं किसी एक का नाम नहीं ले पाऊँगा। मेरे लिए वह विधा सबसे प्रिय है, जिसमें उस समय का विषय अपने आपको सबसे स्वाभाविक रूप से व्यक्त कर सके। लेकिन फिर भी जितना कुछ मैने लिखा है, जितनी किताबें अब तक प्रकाशित हुई हैं, उनके गणित से भी कहा जा सकता है कि व्यंग्य ही मेरा फोकस रहा है। मैं यह मानता हूँ कि विषय अपनी विधा स्वयं चुनता है।
लेखक का काम शायद इतना ही है कि वह उस आवाज को ध्यान से सुने और उसे उसके स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त होने दे। यदि किसी विषय को कविता चाहिए तो उसे कविता बनने देना चाहिए, यदि वह व्यंग्य की माँग करता है तो व्यंग्य बनने देना चाहिए और यदि वह विचार, तथ्य और तर्क की माँग करता है तो उसे निबंध या वैज्ञानिक-तकनीकी लेख के रूप में सामने आना चाहिए। साहित्य का लालित्य ललित निबन्ध में ही आनंद देता है।
शायद इसीलिए मेरे भीतर का अभियंता और साहित्यकार भी यहाँ फिर साथ दिखाई देते हैं। अभियंता मुझे संरचना और स्पष्टता देता है, साहित्यकार संवेदना और भाषा। दोनों मिलकर यह तय करते हैं कि किसी विचार को पाठक तक किस तरह पहुँचाया जाए।
अंततः मेरे लिए लेखन विधाओं का प्रदर्शन नहीं, विचारों और अनुभवों की यात्रा है। विधाएँ उस यात्रा के अलग-अलग रास्ते हैं। कोई रास्ता नदी के किनारे से जाता है, कोई जंगल के बीच से, कोई शहर की गलियों से और कोई किसी अनजान पहाड़ी की ओर। मंजिल हर बार अलग हो सकती है, रास्ता भी बदल सकता है, लेकिन यात्रा का मूल उद्देश्य वही रहता है, जीवन को समझना और उसे ईमानदारी से शब्द देना। लेखन से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा पाना ।
प्रश्न : आपके व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों पर चोट करते हैं। क्या व्यंग्य लिखते समय आपका उद्देश्य केवल व्यवस्था की आलोचना करना होता है या आप यह भी चाहते हैं कि पाठक हँसने के बाद कुछ देर चुप होकर अपने आसपास की दुनिया के बारे में सोचे?
उत्तर
मेरे लिए व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर प्रहार करने का माध्यम नहीं है। उसका उद्देश्य समाज के भीतर छिपी उन विडंबनाओं को सामने लाना है, जिन्हें हम रोज़ देखते हुए भी अनदेखा कर देते हैं। यदि व्यंग्य केवल हँसा दे और सोचने पर विवश न करे, तो वह मनोरंजन तो हो सकता है, साहित्य नहीं।
मैं चाहता हूँ कि पाठक पहले मुस्कुराए, फिर स्वयं से प्रश्न पूछे। क्या यह विसंगति केवल व्यवस्था की है, या कहीं न कहीं हम भी उसके सहभागी हैं? व्यंग्य का सबसे बड़ा प्रभाव तब होता है, जब पाठक को लगे कि लेखक किसी और पर नहीं, हम सब पर लिख रहा है।
मेरे व्यंग्यों में कटुता नहीं, आत्मालोचन का आग्रह रहता है। मेरा विश्वास है कि समाज का परिवर्तन उपदेशों से कम और संवेदनशील आत्मबोध से अधिक होता है। यदि कोई पाठक मेरी रचना पढ़ने के बाद अपने व्यवहार में थोड़ा-सा परिवर्तन भी करता है, तो मैं अपने लेखन को सार्थक मानता हूँ।
व्यंग्य की सार्थकता केवल विसंगतियों को उजागर करने में नहीं, उनके समाधान का रास्ता दिखलाने में होती है। व्यंग्य को सत्ता का विरोधी समझा जाता है, जबकि वास्तव में व्यंग्य पक्ष या विपक्ष से ऊपर प्रतिपक्ष होता है, जो दोनों पक्षों की गलतियों पर प्रहार से नहीं चूकता ।
प्रश्न : ‘जलनाद’ जैसे नाटक में पर्यावरण का प्रश्न है, जबकि ‘जल-जंगल-जमीन’ जैसे लेखन में प्रकृति और समाज का गहरा संबंध दिखाई देता है। क्या आपको लगता है कि विकास की वर्तमान दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति को संसाधन समझ लिया है, संबंध नहीं?
उत्तर
मेरा मानना है कि भारतीय संस्कृति ने प्रकृति को सदैव परिवार का सदस्य माना है। हमने नदियों को माँ कहा, वृक्षों की पूजा की और पर्वतों को देवत्व प्रदान किया। लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता संवेदना का नहीं, उपभोग का एवं दोहन का होता गया।
विकास आवश्यक है, किन्तु ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को न छीने। यदि जंगल केवल लकड़ी का भंडार और नदी केवल पानी की पाइपलाइन बनकर रह जाए, तो अंततः मनुष्य भी अपनी जड़ों से कट जाएगा।
मंडला और नर्मदा अंचल ने मुझे प्रकृति को बहुत निकट से देखने का अवसर दिया है। मैंने अनुभव किया है कि पर्यावरण का प्रश्न केवल पेड़ों का नहीं, संस्कृति, समाज और मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न है। साहित्य का दायित्व है कि वह इस चेतना को जीवित रखे। आँकड़े चेतावनी देते हैं, लेकिन साहित्य मनुष्य के भीतर संवेदना जगाता है। वही संवेदना पर्यावरण संरक्षण का सबसे मजबूत आधार बन सकती है। मेरी पर्यावरण संबंधी किताबों एवं जलनाद जैसे नाटकों में मैने यही स्वर दिया है।
जब साहित्य कला जगत इस प्रयास को स्वीकार करता है तो खुशी होती है। जलनाद को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सहित विश्व वाणी संस्थान आदि से पुरस्कृत किया गया है।
प्रश्न : आपने रानी दुर्गावती और टंट्या भील जैसे ऐतिहासिक एवं जनजातीय नायकों पर लिखा है। इतिहास के ऐसे पात्रों को लिखते समय लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है, तथ्यों को बचाना, लोकस्मृतियों को समझना या वर्तमान पीढ़ी से उनका संबंध स्थापित करना?
उत्तर
मेरे विचार से इन तीनों में कोई एक दूसरे से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का संकलन नहीं है, और लोककथाएँ केवल कल्पना नहीं होतीं। दोनों के बीच एक ऐसा सेतु बनाना पड़ता है, जहाँ तथ्य भी सुरक्षित रहें और उस युग की आत्मा भी पाठकों तक पहुँचे।
रानी दुर्गावती हों या टंट्या भील, उनके जीवन को केवल वीरगाथा बनाकर प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी आवश्यक है कि उन्होंने अपने समय की किन परिस्थितियों में संघर्ष किया और उनके विचार आज भी हमें क्या सिखाते हैं।
नई पीढ़ी तक इन जन नायकों के संदर्भ अलग अलग माध्यम से लगातार पहुंचाई जानी चाहिए जिससे उनके बलिदान , वीरता और परिपक्वता का यथार्थ जीवंत प्रेरणा बने। रानी दुर्गावती पहली महिला योद्धा थीं जिन्होंने अकबर की सेना को कई बार हराया किन्तु अंततोगत्वा उन्होंने अपनी अस्मिता बचाने रण भूमि पर आत्म बलिदान दिया।
इसी तरह जननायक टंट्या भील भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड करेक्टर था। जिसने निमाड़ क्षेत्र में अंग्रेजी शासन को हिला दिया था।
मेरा प्रयास सदैव यह रहा है कि इतिहास को वर्तमान से जोड़ा जाए। यदि नई पीढ़ी किसी ऐतिहासिक चरित्र को केवल परीक्षा के प्रश्न के रूप में जानती है, तो लेखक का दायित्व अधूरा रह जाता है। लेकिन यदि वह उस चरित्र से प्रेरणा लेकर अपने समय को समझने लगे, तभी इतिहास जीवंत बनता है।
प्रश्न : भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी व्यक्तित्व पर लिखते हुए आज के समय में लेखक को किन बातों से सावधान रहना चाहिए, ताकि इतिहास किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार मात्र न बन जाए और उस व्यक्तित्व की वास्तविक जटिलता भी पाठकों तक पहुँच सके?
उत्तर
इतिहास के महापुरुष किसी एक दल, विचारधारा या समय की निजी संपत्ति नहीं होते। भगत सिंह जैसे व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके लेखन, अध्ययन, वैचारिक विकास और राष्ट्रीय दृष्टि, तत्कालीन परिदृश्य जिसमें उनके जैसा होनहार युवक हंसते हुए फाँसी पर चढ़ गया था, सभी तथ्यों को साथ लेकर चलना पड़ता है। केवल उनके साहस का वर्णन करना या केवल उनकी वैचारिक मान्यताओं को रेखांकित करना, दोनों ही अधूरी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
लेखक का दायित्व किसी पूर्वाग्रह की पुष्टि करना नहीं, बल्कि पाठक के सामने यथासंभव संतुलित और प्रामाणिक चित्र रखना है। इतिहास का सम्मान तभी होता है, जब तथ्य, संदर्भ और मानवीय जटिलताएँ समान महत्व प्राप्त करें।
मेरे विचार से भगत सिंह की सबसे बड़ी विरासत उनका निर्भीक चिंतन है। उन्होंने प्रश्न पूछने का साहस दिया, अध्ययन का महत्व बताया और राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना। यदि आज का लेखक इस व्यापक दृष्टि को ईमानदारी से प्रस्तुत कर सके, तो वह इतिहास के साथ भी न्याय करेगा और वर्तमान समाज के प्रति भी अपना दायित्व निभाएगा। उन पर लिखी उपन्यासिक जीवनी में मैने यही ध्यान रखा है।
प्रश्न :. आज की राजनीति और समाज में विचारों का ध्रुवीकरण बहुत बढ़ गया है। क्या आपको लगता है कि लेखक को राजनीतिक पक्षधरता से पूरी तरह दूर रहना चाहिए, या अन्याय और सामाजिक विसंगतियों के सामने तटस्थ रहना भी एक प्रकार की पक्षधरता है?
उत्तर
लेखक का पहला दायित्व किसी दल के प्रति नहीं, बल्कि सत्य और समाज के प्रति होता है। राजनीति जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, इसलिए साहित्य उससे पूरी तरह अलग भी नहीं रह सकता। किंतु लेखक यदि किसी विचारधारा का प्रवक्ता बन जाए, तो उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
मैं मानता हूँ कि अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार या सामाजिक असमानता के सामने मौन रहना भी एक प्रकार की पक्षधरता है। लेखक का काम किसी राजनीतिक झंडे को उठाना नहीं, बल्कि मनुष्य और मानवीय मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना है। यदि उसकी लेखनी सत्ता से प्रश्न पूछती है, तो उसे विपक्ष से भी प्रश्न पूछने का साहस होना चाहिए। उसे सरकारी सम्मान या अन्य व्यक्तिगत हितों से पहले लेखकीय दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।
मेरे व्यंग्यों में व्यवस्था की आलोचना है, लेकिन किसी व्यक्ति विशेष के प्रति द्वेष नहीं। मैं मानता हूँ कि साहित्य का स्वर संतुलित, विवेकपूर्ण और नैतिक होना चाहिए। लेखक की विश्वसनीयता इसी में है कि वह समय के दबाव से नहीं, अपने अंतःकरण की आवाज़ से लिखे।
प्रश्न : आप वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक-तकनीकी लेखन को भी महत्व देते हैं। आज जब सोशल मीडिया पर अफवाहें, अंधविश्वास और अधूरी जानकारी बहुत तेजी से फैलती है, क्या साहित्य वैज्ञानिक सोच विकसित करने में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है?
उत्तर
निश्चय ही। विज्ञान और साहित्य को अक्सर दो अलग-अलग धाराएँ मान लिया जाता है, जबकि दोनों का मूल उद्देश्य मनुष्य को अधिक जागरूक बनाना है। विज्ञान प्रश्न पूछना सिखाता है और साहित्य संवेदनशील होकर उत्तर खोजने की प्रेरणा देता है। विज्ञान प्रौद्योगिकी सुविधाएं जुटाता है पर उनकी वैचारिक दिशा साहित्य तय करता है।
आज सूचना का विस्फोट है, लेकिन विवेक का विकास उसी गति से नहीं हुआ। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, पर सत्य और असत्य के बीच भेद करने की क्षमता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल प्रयोगशाला नहीं, बल्कि प्रमाण, तर्क और खुले मन से विचार करना है। नैतिकता का जो ह्रास समाज में नजर आ रहा है, उसकी थोड़ी जिम्मेदारी शिक्षा , व्यवस्था की कमियां और साहित्य की भी हैं।
मैंने तकनीकी विषयों पर सरल भाषा में इसलिए लिखा कि सामान्य पाठक भी विज्ञान को अपने जीवन से जोड़कर समझ सके। यदि साहित्य मनुष्य के भीतर जिज्ञासा, तर्कशीलता और प्रश्न करने का साहस पैदा करता है, तो वह वैज्ञानिक चेतना का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। विज्ञान को जनमानस को समझाना भी साहित्य की जिम्मेदारी है।
प्रश्न : आप लंबे समय से ब्लॉगिंग, ई-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी और डिजिटल मंचों से जुड़े हैं। क्या डिजिटल माध्यमों ने साहित्य को नए पाठक दिए हैं या त्वरित लोकप्रियता की चाह ने साहित्यिक धैर्य और गहराई को कुछ हद तक प्रभावित भी किया है?
उत्तर
हर नई तकनीक अपने साथ अवसर भी लाती है और चुनौतियाँ भी। मैंने डिजिटल माध्यमों को साहित्य का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसका विस्तार माना है। ब्लॉग, ई-पत्रिकाएँ , इंटरनेट रेडियो और ऑनलाइन मंचों ने ऐसे अनेक पाठकों तक साहित्य पहुँचाया है, जो पारंपरिक पत्रिकाओं से नहीं जुड़ पाते थे। विशेष रूप से प्रवासी भारतीयों और युवा पीढ़ी के लिए यह एक महत्वपूर्ण सेतु बना है।
लेकिन यह भी सच है कि त्वरित प्रतिक्रिया और लोकप्रियता की संस्कृति ने धैर्य को कुछ कम किया है। कई बार लेखक लिखने से अधिक ‘दिखने’ की चिंता करने लगता है। साहित्य ‘लाइक’ और ‘शेयर’ से बड़ा होता है। उसकी वास्तविक कसौटी समय है।
मेरा विश्वास है कि माध्यम बदलते रहेंगे, लेकिन अच्छी रचना की प्रासंगिकता कभी समाप्त नहीं होगी। लेखक को तकनीक का उपयोग अवश्य करना चाहिए, पर अपनी रचनात्मक गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए। नई ए आई तकनीक ने कार्य सुगम किया है किन्तु कोई भी तकनीक मानवीय मौलिकता , भावना के नैसर्गिक पक्ष के समावेश से ही प्रभावी बन सकती है, रचनात्मक गहराई , धैर्य , समय और इसी मौलिक लेखकीय दायित्व को समझ कर लिखने से आ सकती है।
प्रश्न :आप ‘वर्तिका’ जैसी साहित्यिक संस्था और ई-अभिव्यक्ति जैसे डिजिटल मंच से जुड़े हैं। आज के साहित्यिक वातावरण को देखते हुए आपको सबसे अधिक चिंता किस बात की है, पाठकों की घटती संख्या, साहित्य में बढ़ती गुटबाजी, पुरस्कारों की राजनीति या लेखक और समाज के बीच कम होता संवाद?
उत्तर
मेरे विचार से इन सभी प्रश्नों की जड़ एक ही है, साहित्य और समाज के बीच घटता हुआ आत्मीय संवाद। यदि लेखक समाज की धड़कनों से दूर हो जाएगा, तो पाठक भी उससे दूर होने लगेंगे। फिर चंद कतिपय लेखकों के शार्ट कट से पुरस्कार, गुटबाजी और प्रतिष्ठा के विवाद अधिक दिखाई देंगे, वास्तविक जनोन्मुखी साहित्य कम होगा ।
आज आवश्यकता ऐसे साहित्य की है जो आम आदमी के जीवन, उसकी आशाओं, संघर्षों और बदलती दुनिया से जुड़ा हो। साहित्य यदि केवल सीमित दायरों में घूमता रहेगा, तो उसकी सामाजिक भूमिका कमजोर होगी।
मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि साहित्य संवाद का माध्यम बने। चाहे मंच पर हो, पत्रिका में, ब्लॉग पर या डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर, लेखक और पाठक के बीच जीवंत संबंध बना रहना चाहिए। लेखक को अपना कैनवास वैश्विक रखना चाहिए। कट्टरता , संकुचित दृष्टि साहित्य नहीं बन सकता। मेरा विश्वास है कि जहाँ पाठकों और रचनाकार में संवाद जीवित है, वहाँ साहित्य का भविष्य भी सुरक्षित है। पाठकों की संख्या बढ़ रही है, संप्रेषण के माध्यम बदल रहे हैं, लेखक का नये मीडियम में हस्तक्षेप करना समय की आवश्यकता है।
प्रश्न :. आज का युवा अपनी बात मनवाने के लिए आंदोलन और विरोध के रास्ते को पहले की तुलना में अधिक महत्व देता दिखाई देता है। आप इसे लोकतंत्र में जागरूक नागरिकता की सकारात्मक अभिव्यक्ति मानते हैं या आपको लगता है कि आंदोलन से पहले संवाद, अध्ययन और धैर्य को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए? और यदि आप आज के युवा से इस विषय पर केवल एक बात कहना चाहें, तो वह क्या होगी?
उत्तर
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार उतना ही आवश्यक है जितना सहमति का। इसलिए मैं युवाओं की जागरूकता और सक्रियता का स्वागत करता हूँ। लेकिन किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके शोर में नहीं, उसके अध्ययन, नैतिक आधार और उद्देश्य की स्पष्टता में होती है।
इतिहास बताता है कि जिन आंदोलनों के पीछे गहरा चिंतन, व्यापक संवाद और समाजहित का दृष्टिकोण था, वही स्थायी परिवर्तन ला सके। केवल आवेग से परिवर्तन नहीं आता; उसके लिए धैर्य, अनुशासन और निरंतर प्रयास भी चाहिए।
यदि आज के युवाओं से मैं केवल एक बात कहना चाहूँ, तो यही कहूँगा, कि “अपनी आवाज़ अवश्य उठाइए, लेकिन उससे पहले स्वयं को इतना पढ़िए, समझिए और तैयार कीजिए कि आपकी आवाज़ केवल विरोध की नहीं, समाधान की भी आवाज़ बने। राष्ट्र को सबसे अधिक आवश्यकता ऐसे युवाओं की है, जिनके भीतर ऊर्जा के साथ विवेक भी हो।” केवल हठवादिता रास्ता नहीं हो सकता । समस्या को उजागर करना स्वागतेय है पर उसका समाधान क्या हो यह भी सुझाना बौद्धिकता है। युवा आक्रोश व्यवस्था को मथकर यदि समस्याओं के स्थाई हल निकाल सकें तो इससे बेहतर भला क्या हो सकता है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव, इन दिनों लंदन में
विवेक जी, आपसे बातचीत करना मेरे लिए सचमुच एक अत्यंत आत्मीय और समृद्ध अनुभव रहा।
आपके उत्तरों के माध्यम से ऐसा लगा जैसे हम केवल प्रश्नों के उत्तर नहीं खोज रहे थे, बल्कि आपके जीवन की उन पगडंडियों पर साथ चल रहे थे, जहाँ मण्डला का एक जिज्ञासु बालक प्रकृति, परिवार, किताबों और संस्कृति के बीच जीवन को समझना सीख रहा था। आपने अपने बचपन, परिवार, साहित्यिक संस्कारों और जीवन-यात्रा की स्मृतियों को जिस आत्मीयता से साझा किया, उसके लिए मैं हृदय से आपका आभार व्यक्त करता हूँ।
आपसे बातचीत करके मुझे बेहद खुशी हुई, विवेक जी।
आज आपके जन्मदिन के विशेष अवसर पर हुई यह बातचीत मेरे लिए और भी यादगार बन गई है। आपको एक बार फिर जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और आपकी कलम इसी तरह जीवन, समाज और समय की धड़कनों को शब्द देती रहे—यही मेरी शुभकामना है।
विनय विमर्श के इस विशेष संवाद में अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
विनय जी, आपका भी हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद।
आपके प्रश्न केवल प्रश्न नहीं थे। उन्होंने मुझे अपने जीवन की उन स्मृतियों तक लौटने का अवसर दिया, जिन्हें समय की व्यस्तता में हम अक्सर पीछे छोड़ आते हैं।
आपने मेरे बचपन, मण्डला, पिता की स्मृतियों, परिवार, साहित्यिक संस्कारों और जीवन की यात्रा को जिस आत्मीयता और संवेदनशीलता से छुआ, वह मेरे लिए विशेष अनुभव रहा।
आपकी बातचीत में केवल जानकारी जानने की जिज्ञासा नहीं थी, बल्कि व्यक्ति को समझने की संवेदना थी। आपके प्रश्नों के माध्यम से मैंने अपने ही जीवन को कई बार एक नए दृष्टिकोण से देखा।
बचपन से आज तक की इस यात्रा को आपके साथ साझा करना मेरे लिए भावुक और आनंददायक दोनों रहा। आपने मेरे जीवन के विभिन्न पड़ावों को जिस संवेदनशीलता और आत्मीयता के साथ शब्दों में उकेरा, उसके लिए मैं आपका विशेष रूप से आभारी हूँ।
विनय विमर्श जैसे मंच संवाद को केवल बातचीत नहीं रहने देते, बल्कि उसे अनुभवों और स्मृतियों की साझी यात्रा बना देते हैं।
आपसे बातचीत करके मुझे भी बहुत प्रसन्नता हुई।
आपकी लेखनी और पत्रकारिता इसी तरह साहित्य, समाज और जीवन के विविध पक्षों को सामने लाती रहे—यही मेरी शुभकामना है।
स्नेह और शुभकामनाओं सहित,
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लेखक एवं साक्षात्कारकर्ता
✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार


विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
यह पुस्तक Amazon पर उपलब्ध है:
👉 “मन-मोदी” – विनय श्रीवास्तव
https://www.amazon.in/dp/B0G69QT373

