दिल्ली का जंतर-मंतर अब केवल विरोध-प्रदर्शन की जगह नहीं रह गया है। ऐसा लगता है जैसे यह लोकतंत्र का स्थायी ‘आंदोलन कार्यालय’ बन चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कर्मचारी स्थायी हैं, लेकिन मुद्दे बदलते रहते हैं। कभी किसान, कभी छात्र, कभी कर्मचारी, कभी सामाजिक कार्यकर्ता और कभी कोई नया चेहरा—हर कोई अपनी-अपनी मांग लेकर आता है। फिर धीरे-धीरे कुछ राजनीतिक चेहरे मंच पर पहुंचते हैं, कुछ कैमरे पहुंचते हैं और देखते ही देखते आंदोलन का मूल मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है।
आज छात्रों का आंदोलन भी कुछ ऐसा ही मोड़ लेता दिखाई दे रहा है। छात्र अपनी मांगों और भविष्य को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन राजनीति भी खाली हाथ नहीं आती। वह अपने साथ माइक, कैमरा, नारे और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का पूरा सामान लेकर पहुंचती है। छात्र सोचते हैं कि वे अपने भविष्य के लिए लड़ रहे हैं और राजनीति सोचती है कि शायद उसे अपना खोया हुआ भविष्य मिल जाए!

आंदोलन शुरू होता है छात्रों के नाम पर, लेकिन कुछ समय बाद सवाल उठने लगता है—आखिर इस आंदोलन का असली नेता कौन है? जो सामने है, वह कहता है कि मैं नेता नहीं हूं। जो नेता है, वह कहता है कि मैं आंदोलन का हिस्सा नहीं हूं। जो आंदोलन का हिस्सा नहीं है, वही टीवी चैनलों पर सबसे बड़ा प्रवक्ता बनकर बैठा है। और जो वास्तव में आंदोलन कर रहे हैं, वे शायद स्वयं सोच रहे होंगे कि हमारी मांगों की आवाज़ आखिर किसके माइक से बाहर जा रही है?
भारत की जनता आंदोलन और राजनीति का यह खेल पहले भी देख चुकी है। अन्ना आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ। देश की जनता सड़कों पर उतरी। व्यवस्था बदलने की बातें हुईं। राजनीति की गंदगी साफ करने का संकल्प लिया गया। लेकिन राजनीति भी बड़ी अद्भुत चीज है। आप झाड़ू लेकर उसकी गंदगी साफ करने निकलते हैं और कुछ वर्षों बाद पता चलता है कि झाड़ू ही राजनीति का सबसे बड़ा चुनाव चिह्न बन चुकी है!
जो लोग कहते थे कि राजनीति गंदी है, वे राजनीति में आ गए। जो कहते थे कि हम सत्ता नहीं चाहते, वे सत्ता तक पहुंच गए। जो कहते थे कि हम व्यवस्था बदलेंगे, वे स्वयं व्यवस्था का हिस्सा बन गए। और जो राजनीति कीचड़ साफ करने निकले थे, वे बाद में जनता को समझाने लगे कि असली कीचड़ तो दूसरे दलों में है!
इतिहास की यही विडंबना है—आंदोलन किसी के नाम पर शुरू होता है, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ कोई और उठा लेता है। आंदोलन का चेहरा धीरे-धीरे पीछे चला जाता है और राजनीति का चेहरा आगे आ जाता है। जनता नारे लगाती रह जाती है और राजनीति अपना अगला अध्याय लिख देती है।
अब सोनम वांगचुक छात्रों और युवाओं के मुद्दों को लेकर सामने आए। उनके व्यक्तित्व और संघर्ष को लेकर लोगों में सम्मान है। लेकिन राजनीति किसी भी आंदोलन को अकेला छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती। वह धीरे-धीरे आती है। पहले समर्थन करती है, फिर मंच साझा करती है, फिर नारे बदलती है और अंत में आंदोलन की दिशा ही बदलने लगती है।
कई बार आंदोलन शुरू करने वाला व्यक्ति पीछे हो जाता है और मंच पर ऐसे चेहरे दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि वे वर्षों से इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। आंदोलन छात्रों का होता है, लेकिन उसमें राजनीति अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगती है। छात्र भविष्य की चिंता करते हैं और कुछ लोग अपने राजनीतिक भविष्य की!
सरकार कहती है—आइए, बातचीत करते हैं। आंदोलनकारी कहते हैं—पहले हमारी मांगें मानो। सरकार कहती है—मांगों पर चर्चा करेंगे। आंदोलनकारी कहते हैं—पहले चर्चा करो। और बातचीत वहीं खड़ी रह जाती है, जहां से शुरू हुई थी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार बातचीत करे तो किससे करे?
छात्रों से?
आंदोलन के नेताओं से?
राजनीतिक दलों से?
या फिर उन स्वयंभू प्रवक्ताओं से जो हर आंदोलन के बाद टीवी स्टूडियो में प्रकट हो जाते हैं?
यह लोकतंत्र का नया संस्करण है—आंदोलन सबका, नेतृत्व अस्पष्ट और जिम्मेदारी किसी की नहीं!

आज आंदोलन भी कैमरे के बिना अधूरा लगता है। कैमरा हो तो आंदोलन राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और कैमरा हटे तो आंदोलन का तापमान भी कम होने लगता है। नारे ऐसे बनाए जाते हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल हों। बयान ऐसे दिए जाते हैं जिनसे अगले दिन बहस हो। और कभी-कभी तो लगता है कि आंदोलनकारी सरकार से कम और कैमरे से अधिक संवाद कर रहे हैं।
मूल मुद्दा बेचारा एक कोने में बैठा इंतजार करता रहता है कि कोई उसकी भी बात कर ले!
छात्रों की मांग थी—शिक्षा और भविष्य।
बहस शुरू हो गई—राष्ट्रवाद पर।
मांग थी—अधिकारों की।
चर्चा होने लगी—राजनीतिक विचारधाराओं की।
सवाल था—छात्रों का भविष्य।
मंच पर चर्चा होने लगी—किसका राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल है!
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पवित्र है। सरकार की आलोचना लोकतंत्र की ताकत है। शांतिपूर्ण आंदोलन व्यवस्था को आईना दिखाते हैं। लेकिन विरोध और अराजकता के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। जब तक आंदोलन शांतिपूर्ण है, वह लोकतंत्र की आवाज़ है। लेकिन जब उसमें हिंसा, अपमान, तोड़फोड़ और राष्ट्र-विरोधी प्रवृत्तियां प्रवेश करने लगती हैं, तो मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है।
फिर आंदोलन अधिकारों का नहीं, अराजकता का प्रतीक बनने लगता है।
पुलिस से टकराव हो तो कहा जाता है—यह संघर्ष है।
सेना के जवानों का अपमान हो तो कहा जाता है—यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।
पत्रकारों से बदसलूकी हो तो कहा जाता है—यह आक्रोश है।
और देश को तोड़ने वाले नारों पर सवाल उठे तो कहा जाता है—यह लोकतंत्र है!
तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या आंदोलन के नाम पर सब कुछ जायज़ हो जाता है?
जंतर-मंतर लोकतंत्र की आवाज़ का मंच बने, यह स्वागत योग्य है। लेकिन उसे राजनीतिक लॉन्चिंग पैड बना देना लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। इतिहास गवाह है कि कई आंदोलन जनता के नाम पर शुरू हुए, लेकिन अंत में किसी एक व्यक्ति की राजनीति बन गए।
कई लोग व्यवस्था बदलने निकले और स्वयं व्यवस्था का हिस्सा बन गए।
कई लोग राजनीति की कीचड़ साफ करने निकले और बाद में उसी कीचड़ को अपना राजनीतिक घर बना लिया।
इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन चल रहा है या किसी नए राजनीतिक चेहरे की तलाश?
छात्रों को भी यह तय करना होगा कि उनका आंदोलन कौन चलाएगा और उसका लाभ किसे मिलेगा। क्योंकि आंदोलन आपका हो सकता है, आपकी समस्याएं वास्तविक हो सकती हैं और आपके नारे सच्चे हो सकते हैं—लेकिन यदि नेतृत्व आपके हाथ में नहीं है, तो परिणाम किसी और के पक्ष में जा सकता है।
राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जनता आंदोलन करती है, नेता उसका समर्थन करते हैं, कैमरे उसे दिखाते हैं और अंत में कोई नया राजनीतिक चेहरा जन्म ले लेता है।
फिर जनता पीछे मुड़कर पूछती है—
“हम तो अपना भविष्य बचाने निकले थे… यह नया नेता कहां से पैदा हो गया?”
✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार


विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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