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पटना की गलियों से मायानगरी तक: “एक पल का जीना, फिर तो है जाना…” लिखने वाले बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और शायर विजय अकेला की अनकही दास्तान

विशेष साक्षात्कार ✍️ विनय श्रीवास्तव (लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार)

ज़िंदगी को जीतने की आरज़ू में यूँ हुआ, ज़िंदगी भी ना मिली और रूह प्यासी हो गई…….विजय अकेला

बॉलीवुड के मशहूर गीतकार, शायर और संवेदनशील शब्दों के जादूगर श्री विजय अकेला — एक ऐसा नाम, जिसने अपने अल्फाज़ों से करोड़ों दिलों की धड़कनों को आवाज़ दी। फिल्म “कहो ना प्यार है” का अमर गीत —

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“एक पल का जीना, फिर तो है जाना…
तोहफ़ा क्या लेकर जाएँ, दिल ये बताना…”

— लिखने वाले विजय अकेला सिर्फ गीतकार नहीं, बल्कि संघर्ष, संवेदनाओं, अधूरी मोहब्बतों, टूटे सपनों और जिंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों से निकले हुए शब्दों के रचनाकार हैं।

पटना की गलियों से निकलकर मुंबई की चमकती दुनिया तक पहुँचने का उनका सफर जितना प्रेरक है, उतना ही मार्मिक भी।
उनके भीतर एक ऐसा शायर बसता है, जिसने दर्द को भी शायरी बना दिया और अकेलेपन को भी अपनी पहचान।

जाने-माने स्वतंत्र पत्रकार, ब्लॉगर और ‘मन-मोदी’ पुस्तक के लेखक विनय श्रीवास्तव ने विजय अकेला जी से एक बेहद आत्मीय, भावुक और दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाली बातचीत की।

इस विशेष संवाद में विजय अकेला जी ने अपने संघर्ष, थिएटर, मोहब्बत, फिल्मी दुनिया, शायरी, परिवार, माता-पिता, सफलता, अकेलेपन और आशा भोसले जी के साथ अपने भावनात्मक रिश्ते तक — हर पहलू पर खुलकर बात की।

आइए पढ़ते हैं यह बेहद खास, संवेदनशील और आत्मा को छू लेने वाला संवाद…

vinayvimarsh.org के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन 💐💐है विजय अकेला जी।

विजय अकेला : बहुत बहुत धन्यवाद विनय जी। 😊

प्रश्न :

आपके जीवन के उस अनकहे सफर के बारे में हमारे पाठकों को बताइए, जिसे आपने आज तक सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया और जिसने भीतर ही भीतर आपको सबसे अधिक गढ़ा।

विजय अकेला :

“देखिए विनय जी… हम शायर लोग बड़े-बड़े ख्वाब देखते हैं। सिर्फ देखते ही नहीं, उन्हें पूरा करने की जिद भी रखते हैं। मगर जिंदगी हर ख्वाहिश पूरी नहीं करती। और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं… वही शायरी बनकर हमारे सामने लौट आती हैं। मैंने बहुत कम मौकों पर खुलकर कहा है, लेकिन आज कह रहा हूँ —

‘ज़िंदगी को जीतने की आरज़ू में यूँ हुआ,
ज़िंदगी भी ना मिली और रूह प्यासी हो गई…’

इंसान कई बार अपने सपनों तक नहीं पहुँच पाता, लेकिन एक शायर उन अधूरे सपनों को अपने अल्फाज़ों में मुकम्मल करने की कोशिश करता रहता है। मेरी शायरी… दरअसल मेरी अधूरी जिंदगी की पूरी कहानी है।”

प्रश्न :

आपसे बातचीत का यह सफर जितना आगे बढ़ रहा है, उतना ही महसूस हो रहा है कि आपके भीतर सिर्फ एक गीतकार नहीं, बल्कि अनुभवों, संवेदनाओं और संघर्षों की पूरी एक जीवंत कहानी बसती है। हम चाहेंगे कि हमारे पाठकों को उस विजय अकेला से भी रूबरू होने का अवसर मिले, जो शोहरत और गीतों की दुनिया से पहले अपने सपनों, संघर्षों और भावनाओं के साथ जी रहा था। वह कौन-सा पल था जब दिल ने पहली बार कहा कि आपकी असली पहचान एक गीतकार के रूप में ही बनने वाली है? और क्या उस समय आपके माता-पिता तथा परिवार को भी इस बात का एहसास था कि घर का यह बेटा एक दिन अपने शब्दों से लाखों दिलों को छूने वाला है?

विजय अकेला :

“देखिए… क़िस्सा मुख़्तसर यह है कि मैं एक एक्टर बनने के लिए पटना से एम.ए. ऑनर्स (अंग्रेज़ी) करके मुंबई आया था। यहाँ पहुँचने से पहले पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स भी किया था।

‘माध्यम’ और ‘मोबाइल थिएटर’ जैसी संस्थाओं से जुड़कर सफ़दर हाशमी साहब का ‘औरत’, असगर वजाहत साहब का ‘दोनों मारे जाएंगे’, प्रेमचंद जी के नाटक और ‘ब्रह्म का स्वांग’ जैसे मंचन किए। इन्हीं अनुभवों ने भीतर एक ज़मीन तैयार की और उसी ज़मीन को लेकर मैं मुंबई आया।

मुंबई आने पर यह समझ आया कि यहाँ काम सबको अपने बच्चों और रिश्तेदारों को देना है। नए लोगों के लिए रास्ते आसान नहीं होते। संघर्ष बहुत था… पढ़ाई भी साथ चल रही थी। फिर मैंने महसूस किया कि फिल्मों का जो इतिहास मेरे जहन में दर्ज है, उसके कारण फिल्म पत्रकारिता करना मेरे लिए आसान हो रहा है। उस वक्त ऑनलाइन दुनिया नहीं थी। जानकारी किताबों, याददाश्त और जुनून से मिलती थी।

पत्रकारिता करते-करते फिल्मी दुनिया के लोगों से मुलाकात होने लगी। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन, आनंद बख्शी साहब, मजरूह साहब, निदा फाज़ली — सबके करीब आने का मौका मिला। धीरे-धीरे एक्टिंग पीछे छूटती गई और शायरी भीतर गहराती चली गई।

और फिर मुंबई की बारिशें…मोहब्बत, बारिशें और टूटा हुआ दिल… एक शायर बनने की इससे आसान डगर कोई नहीं।”

अगर उस शहर में आप आशिक हो जाएँ, तो समझिए खत्म हो गए। मुंबई की बारिशों ने मेरे भीतर के शायर को जगा दिया।
मुंबई की बारिशें बड़ी जानलेवा होती हैं। उनमें इंसान लुटता भी है, मिटता भी है… मगर बाद में पता चलता है कि वही आपको एक बेहतर शायर बना रही थीं।

“फिर एक दिन एक पत्रकार की हैसियत से राजेश रोशन साहब से मुलाकात हुई। एक गीतकार के जाने के बाद उन्होंने एक धुन सुनाई — और उसी वक्त मैंने लिखा:

‘एक पल का जीना, फिर तो है जाना,
तोहफ़ा क्या लेकर जाएँ, दिल ये बताना।
खाली हाथ आए थे हम, खाली हाथ जाएंगे,
बस प्यार के दो मीठे बोल झिलमिलाएंगे…’

मेरे पहले ही गीत ने मुझे मंज़िल तक पहुँचा दिया। मुझे खुद लगा —‘मेरी अर्थी पर भी शायद यही गीत बजेगा…’

फिर उस सफलता ने मेरे भीतर के संघर्ष को थोड़ा थाम लिया। दुनिया देख ली… शोहरत देख ली… और फिर वापस किताबों और शायरी की दुनिया में लौट आया। माँ उस वक्त इस दुनिया में नहीं थीं, जब यह गीत आया। लेकिन बाबूजी थे — पटना में एक रिटायर्ड एग्जीक्यूटिव इंजीनियर की जिंदगी जी रहे थे। जब अखबारों, टेलीविजन और राष्ट्रीय माध्यमों में मेरे बारे में बातें होने लगीं, तो उन्हें खुशी हुई होगी। क्योंकि इस दुनिया में अगर कोई शख्स सचमुच चाहता है कि उसका बेटा उससे भी आगे जाए… तो वह सिर्फ एक पिता होता है।”

प्रश्न :

आज के गीतों में वह भावनात्मक गहराई और शब्दों की खुशबू कम दिखाई देती है, जो पुराने दौर में सहज रूप से महसूस होती थी। आप इस बदलाव को कैसे देखते हैं?

विजय अकेला :

“बदलाव हर दौर में होता है और होना भी चाहिए। आज के गीतकार और संगीतकार भी बेहद प्रतिभाशाली हैं।

लेकिन हाँ… यह सच है कि आज हमारे पास शैलेंद्र नहीं हैं, साहिर नहीं हैं, आनंद बख्शी नहीं हैं। आज लता जी नहीं हैं… आशा जी जैसी आवाज़ें दुर्लभ हो चुकी हैं… रफ़ी साहब, किशोर कुमार, तलत महमूद — ये सिर्फ नाम नहीं थे, एहसास थे। उस दौर में गीत सिर्फ सुने नहीं जाते थे… महसूस किए जाते थे। आज तकनीक बढ़ी है, लेकिन शब्दों की आत्मा कहीं पीछे छूटती जा रही है। आज भी शैलेंद्र, साहिर और आनंद बख्शी की कमी महसूस होती है

“गीत सिर्फ सुने नहीं… महसूस भी किए जाने चाहिए

प्रश्न :

आज संगीत की दुनिया तेज़ी से बदल रही है, जहाँ कुछ गीत कुछ ही दिनों में लोकप्रिय होकर उतनी ही जल्दी भुला भी दिए जाते हैं। ऐसे दौर में आप अपने शब्दों की आत्मा और संवेदनशीलता को किस तरह जीवित रखते हैं, ताकि गीत केवल सुने न जाएँ बल्कि महसूस भी किए जाएँ?

विजय अकेला :

“आज गीत जल्दी भुला दिए जाते हैं। संगीत भी उन्हें हमेशा जिंदा नहीं रख पाता, गायकी भी नहीं।

इसमें मैं सबसे पहले शायरी की तरफ इशारा करूंगा। व्यावसायिक दुनिया में शायरी को पैसा मिलता है, लेकिन कई बार उसी वजह से उसकी आत्मा पीछे छूट जाती है। अगर गीतकार अपने मन और आत्मा की सुनकर लिखे, तो आज भी ऐसे गीत बन सकते हैं जो पीढ़ियों तक जिंदा रहें।

साहिर का वह दौर अब नहीं रहा, जब लोग उनका दीवान ढूँढ़ते थे और एक-एक नज़्म पर कंपोजीशन बनती थी। आज हमारे पास लता, आशा, किशोर, रफ़ी जैसी आवाज़ें भी नहीं हैं… तो वह बात कैसे होगी?”

“आसान अल्फाज़ों में बड़ी बात कहना ही असली शायरी है

प्रश्न :

गीत और शब्दों की दुनिया में आपके सबसे प्रिय गीतकार कौन रहे हैं?

विजय अकेला :

“फिल्मी दुनिया में वही शायर सबसे ज्यादा पसंद किए गए, जिन्होंने आसान अल्फाज़ों में बड़ी बातें कही।

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शैलेंद्र साहब लिखते हैं —

‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार,
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार…’

देखिए… कितनी बड़ी बात कितनी आसानी से कह दी गई।

मैं जिस दौर में जवान हो रहा था, उस वक्त आनंद बख्शी साहब और मजरूह साहब के गीत हर तरफ सुनाई देते थे। उन्हीं से बहुत कुछ सीखा। और अगर फिल्मों से बाहर की बात करें… तो मीर और दाग़ का कोई जवाब नहीं।”

“हम शायर लोग अपनी बात इशारों में कहना पसंद करते हैं”

प्रश्न :

आपने संघर्ष, सफलता, अस्वीकृति और तालियों—सभी रंगों को करीब से देखा है। आज जब आप अपने सफर को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह कौन-सी सीख है जिसने आपको भीतर से बेहतर इंसान बनाया?

विजय अकेला :

“हम शायर लोग अपनी बात इशारों में कहना पसंद करते हैं। हम तो अपनी महबूबा से भी गुलज़ार साहब के शब्दों में कहते हैं —‘तुम आ गए हो, नूर आ गया है…’

‘तुम आ गई हो’ नहीं… बस यही फर्क एक सधे हुए शायर का होता है। शायरी मेरे लिए इबादत है।

प्रश्न :

आपके आने वाले और वर्तमान प्रोजेक्ट्स के बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए।

विजय अकेला :

“शायरी मेरी रूह का हिस्सा है, इसलिए लिखना मेरे लिए सिर्फ पेशा नहीं, इबादत है।

बहुत जल्द मेरी दूसरी शायरी की किताब आने वाली है। मेरी पहली किताब ‘लश्कर’ को पाठकों ने बहुत प्यार दिया था और अब अगली किताब ‘जिहाद’ नए एहसास और नए तेवर के साथ आएगी।

एक शेर मुलाहिज़ा फ़रमाइए —

‘हम नशे की बोतलें हैं, बंद रहने दो हमें,
खुल गईं तो फिर सियासत में विरासत ख़त्म है…’

इसके अलावा एक फिल्म बनाने की भी पुरानी ख्वाहिश है, जो शायद जल्द पूरी हो। कुछ छोटे और बड़े फिल्म प्रोजेक्ट्स पर भी काम चल रहा है।”

“‘अकेला’ सिर्फ नाम नहीं… एक एहसास है”

प्रश्न :

आपके नाम के साथ जुड़ा “अकेला” शब्द अपने आप में गहरी कहानी का एहसास कराता है। इसके पीछे क्या कहानी है?

विजय अकेला :

“करीब 15 साल की उम्र में ही मुझे महसूस होने लगा था कि इंसान इस दुनिया में अकेला आता है और अकेला ही चला जाता है। रिश्ते-नाते, दोस्तियाँ — सब कहीं न कहीं एक छलावा-से लगते थे। तभी तय कर लिया था कि अपने नाम के साथ ‘अकेला’ जोड़ूँगा… और वही आगे चलकर मेरी पहचान बन गया।”

“कुछ आवाज़ों का कोई विकल्प नहीं होता… और आशा जी उन्हीं में से एक हैं”

प्रश्न :

आप आशा जी के बहुत बड़े प्रशंसक रहे हैं। हाल ही में रिलीज़ हुई आपकी गीत “दिल की बात कीजिए, यूँ हँसी न कीजिए…” भी उन्होंने ही गाया है। उनके साथ अपने अनुभव के बारे में कुछ बताइए।

विजय अकेला :

यादों का ख़ज़ाना : आशा जी के साथ बिताए वे अनमोल पल

  • मुझे याद है आशा जी की ख़्वाहिश थी एक ऐसी रिकॉर्डिंग स्टूडियो की जो ग्राउंड फ़्लोर ही पे हो ताके उन्हें सीढ़ियों से या लिफ़्ट से चढ़ना-उतरना न पड़े । रिकॉर्डिंग – Geet Audio craft – अँधेरी (पश्चिम) में रखी गई थी । उनकी पसन्द ही के रिकॉर्डिस्ट को बुलाया गया था । जो बार – बार यही कह रहे थे कि आशा जी इस उम्र में आप सभी का गाना गा रही हैं , आपको धन्य होना चाहिए ।
  • बात वर्ष 2009 की है, जब स्वर कोकिला Asha Bhosle जी ने मुझे आईपीएल के लिए एक जश्न गीत लिखने के लिए बुलाया था। गीत की धुन R. D. Burman साहब के मशहूर गीत “प्यार करने वाले प्यार करते हैं शान से” से प्रेरित थी। मैंने पूरे मन और भावनाओं के साथ वह गीत लिखा। रिकॉर्डिंग भी पूरी हो गई थी और मन में एक नई उम्मीद जन्म ले चुकी थी। लेकिन तभी खबर आई कि लोकसभा चुनावों के कारण आईपीएल भारत में आयोजित नहीं होगा और वह गीत भी रद्द कर दिया गया। यह सुनकर मैं भीतर से टूट सा गया। जिस गीत में मैंने अपने सपने और अपनी भावनाएँ पिरोई थीं, वह लोगों तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो गया।

मेरी उदासी को शायद Asha Bhosle जी ने महसूस कर लिया था। उन्होंने मुस्कुराते हुए बहुत सहजता से कहा,
“ये सब चलता रहता है…”

फिर उन्होंने मुझे Robbie Williams की एक डीवीडी देते हुए कहा,
“आपको याद है आपका अपना वह गीत? रिकॉर्ड तो पहले हो गया था, अब मेरे हाथ लगा है। इसे संभाल कर रखिए… यही फिल्मी दुनिया की सच्चाई है।”

उनके शब्दों में अपनापन भी था, अनुभव भी और एक कलाकार के संघर्षों की गहरी सच्चाई भी। उस दिन मैंने महसूस किया कि बड़े कलाकार केवल अपनी कला से महान नहीं बनते, बल्कि अपने व्यवहार और संवेदनाओं से भी लोगों के दिलों में बस जाते हैं।

आशा जी की सिर्फ एक झलक पा लेना भी अपने आप में सौभाग्य की बात है। मैं खुद को बेहद खुशकिस्मत मानता हूँ कि मुझे उनके साथ काम करने और उनका स्नेह पाने का अवसर मिला। वे सिर्फ एक महान गायिका नहीं, बल्कि करोड़ों संगीत प्रेमियों की धड़कन हैं। उनकी आवाज़ में एक ऐसा जादू है, जो सीधे दिल में उतर जाता है। मेरे लिखे कई गीतों को उन्होंने अपनी खूबसूरत आवाज़ दी है, यह मेरे जीवन के सबसे गर्व भरे पलों में से एक है।

आशा भोसले जी के साथ बिताए हुए पलों की मेरे पास ऐसी अनमोल स्मृतियाँ हैं, जो समय के साथ और भी अधिक कीमती होती चली जाती हैं। उनकी यादों का यह ख़ज़ाना मेरे जीवन की वह अमूल्य धरोहर है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती। हाल ही में रिलीज़ हुआ गीत —

‘दिल की बात कीजिए, यूँ हँसी न कीजिए…
आपको मेरी क़सम, दिल्लगी न कीजिए…’

— मेरे दिल के बेहद करीब है। इस गीत की रिलीज़ उनके बाहर होने की वजह से रुकी रही। उन्होंने कई बार कहा कि किसी और सिंगर से गवा लीजिए, लेकिन हम इंतज़ार करते रहे। क्योंकि कुछ आवाज़ों का कोई विकल्प नहीं होता… और आशा जी उन्हीं में से एक हैं। उनका आशीर्वाद, उनका स्नेह और उनका अपनापन हमेशा मेरे साथ रहा है, और यही मेरे लिए सबसे बड़ी पूंजी है।”

vinayvimarsh.org के लिए आपने अपने व्यस्त समय में से जो अनमोल पल हमें दिए, उसके लिए हृदय से आभार। आपसे हुई यह बातचीत एक औपचारिक इंटरव्यू से कहीं बढ़कर, दिल से दिल की मुलाकात जैसी लगी। आपकी सादगी, विनम्रता और अल्फाज़ों की गहराई सचमुच मन को छू गई। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि आपकी कलम यूँ ही महकती रहे, आपके गीत लोगों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहें और आपकी शायरी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहे।

विजय अकेला :

“बहुत-बहुत धन्यवाद विनय जी।
मुझे भी आपसे बात करके बेहद खुशी हुई।

आपने सवाल नहीं पूछे… दिल से दिल की बात की।
आजकल ऐसी बातचीत बहुत कम होती है।
पता ही नहीं चला कि ये खूबसूरत लम्हे कब गुजर गए। vinayvimarsh.org के लिए मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ।”

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4 thoughts on “पटना की गलियों से मायानगरी तक: “एक पल का जीना, फिर तो है जाना…” लिखने वाले बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और शायर विजय अकेला की अनकही दास्तान”

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