विनय श्रीवास्तव से राकेश शर्मा जी की बातचीत में साहित्य, संघर्ष और शब्दों की अनवरत साधना

कुछ मुलाकातें केवल मुलाकातें नहीं होतीं, वे अपने पीछे एक पूरा समय, एक पूरा अनुभव और अनेक अनकही कहानियां छोड़ जाती हैं। श्री राकेश शर्मा जी से बातचीत भी कुछ ऐसी ही अनुभूति रही। सामने एक ऐसे साहित्य-साधक थे, जिनके व्यक्तित्व में गांव की मिट्टी की सोंधी गंध, श्रीरामचरितमानस के संस्कार, संघर्ष से निकली दृढ़ता और साहित्य के प्रति गहरी निष्ठा एक साथ दिखाई देती है। एक ओर जीवन का लंबा शासकीय अनुभव और दूसरी ओर शब्दों के संसार में निरंतर सक्रियता—इन दोनों के बीच उन्होंने अपने भीतर के लेखक और साहित्य-सेवक को कभी मरने नहीं दिया।
इंदौर से वर्ष 1927 से निरंतर प्रकाशित होने वाली ‘वीणा’ (veena) आज हिंदी साहित्य की एक ऐतिहासिक पहचान बन चुकी है। इस पत्रिका के साथ देश के अनेक महान साहित्यकारों और मनीषियों की स्मृतियां जुड़ी हैं। ‘वीणा’ किसी एक दौर की पत्रिका नहीं, बल्कि बदलते भारत, बदलती हिंदी और बदलती साहित्यिक चेतना की साक्षी रही है। आज जब यह अपनी शताब्दी की ओर बढ़ रही है, तब इसके वर्तमान संपादक राकेश शर्मा से बातचीत करना वस्तुतः एक व्यक्ति से संवाद करना भर नहीं, बल्कि एक लंबी साहित्यिक परंपरा की धड़कनों को सुनने जैसा है। ‘वीणा’ की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अब तक चौदह संपादक इस परंपरा को आगे बढ़ा चुके हैं और राकेश शर्मा वर्तमान संपादक के रूप में नवंबर 2016 से यह दायित्व निभा रहे हैं।
राकेश जी की अपनी जीवन-यात्रा भी कम रोचक और प्रेरक नहीं है। उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के गांव न्यामतपुर से शुरू हुई उनकी यात्रा अभावों, संघर्षों और सपनों से गुजरते हुए उच्च शिक्षा, अध्यापन, भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में राजभाषा सेवा और फिर ‘वीणा’ के संपादन तक पहुंची। गांव की चौपालों में सुनी रामचरितमानस की चौपाइयों और रामलीला के मंच से लेकर हिंदी साहित्य की इस प्रतिष्ठित संपादक-पीठ तक का सफर अपने आप में एक ऐसी कहानी है, जिसमें संघर्ष भी है, संयोग भी और सबसे बढ़कर निरंतर कर्म की साधना भी।
राकेश शर्मा से यह बातचीत इसलिए भी खास है कि वे साहित्य को केवल लिखने-पढ़ने की गतिविधि नहीं मानते, बल्कि उसे जीवन, समाज और संस्कारों से जोड़कर देखते हैं। साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां, बदलता पाठक, नई पीढ़ी, डिजिटल समय, संपादन की जिम्मेदारी और ‘वीणा’ जैसी शताब्दी पुरानी पत्रिका को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने की चिंता—इन सभी विषयों पर उनसे हुई बातचीत कई स्तरों पर हमें सोचने के लिए प्रेरित करती है।
इस आत्मीय बातचीत को प्रस्तुत कर रहे हैं प्रसिद्ध लेखक, ‘मन–मोदी’ पुस्तक के लेखक और स्वतंत्र पत्रकार विनय श्रीवास्तव। वर्ष 2026 में नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में ‘मन–मोदी’ की उपस्थिति के बाद साहित्य और पत्रकारिता के अपने अनुभवों के साथ विनय श्रीवास्तव ने राकेश शर्मा से उनके जीवन, साहित्य-साधना और ‘वीणा’ की शताब्दी यात्रा को लेकर विस्तार से संवाद किया। यह बातचीत एक संपादक से सवाल-जवाब भर नहीं, बल्कि एक साहित्यिक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच विचारों और अनुभवों का आत्मीय सेतु है।
‘वीणा’ के संपादक श्री राकेश शर्मा जी से विशेष बातचीत
प्रश्न- बचपन के राकेश शर्मा को याद करें तो वे कैसे थे? आपका बचपन किस तरह के माहौल में बीता? उस समय आपकी सबसे बड़ी रुचि क्या थी और जीवन में कुछ बनने का आपका सपना क्या था? क्या उस समय कभी सोचा था कि आगे चलकर आपका जीवन साहित्य, पत्रकारिता और लेखन से इतनी गहराई से जुड़ जाएगा?
उत्तर : विनय जी, मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के जिला इटावा (अब औरैया) के ग्राम न्यामतपुर में हुआ है। मेरा परिवार काश्तकारी पर निर्भर था। थोड़ी सी जमीन पर फसल उगाकर भरण-पोषण का उद्यम होता था। घर में पशु भी पाले हुए थे। कहने का अर्थ है उस समय मनुष्य, पशु-पक्षी, प्रकृति के अन्य उपादान आदि सब मानव चेतना के सहचर थे। आज जैसा परिदृश्य नहीं था। देश की आजादी के बाद के दशकों में गरीबी का आलम बहुत गहरा था। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था भी गांव के प्राथमिक स्कूल में ही होती थी, तब कॉन्वेंट और आज जैसी महंगी व्यवस्थाएं नहीं थीं। मैं भी इसी व्यवस्था का हिस्सा बना। गाँव में न तो बिजली थी, न सड़क थी, न अस्पताल थे और न ही अन्य कोई साधन। कुछ घरों में रेडियो थे, शाम को इसी रेडियो से गाँव भर के लोग चौपाल में जमा होकर समाचार सुनते थे। ये ही केवल आधार लेखकों के लिए भी था और साहित्य के अन्य प्रसारण के लिए भी केवल रेडियो ही था। आज के बच्चों को ये गाँव हॉरर कहानियों की तरह लगेंगे, मगर हमारे गाँव उस समय हमारी पाठशाला, संस्कार ग्रहण करने की पुनीत जगह थे। हमारे स्वास्थ्य के केन्द्र और सबकुछ केवल गाँव ही थे। बीमार होने पर छोटे-छोटे नुस्खों से गाँव के लोग ही इलाज कर लेते थे। ऐसे में करियर केन्द्रित जीवन की व्यवस्था बनाने का कोई सवाल ही नहीं था। जीवन में चुनाव करने के अवसर थे प्रायः बना-बना स्वीकार ही करना होता था।
उत्तर प्रदेश के तब के अधिकांश गाँवों में सांझ को श्रीरामचरितमानस का सस्वर पाठ होता था। बरसात के दिनों ‘आल्हा’ गाई जाती थी। तीज-त्योहारों पर लोक-गीतों का गायन होता था। बरसात के ढलने पर रामलीलाओं का मंचन होता था। इन रामलीलाओं में लक्ष्मण और परशुराम का संवाद बहुत प्रिय प्रसंग होता था। इन संवादों को सुनकर ही श्रीरामचरितमानस के प्रति मेरा भी लगाव गहरा हुआ और धीरे-धीरे मैं, रामलीलाओं में परशुराम का अभिनय करने लगा। आप कह सकते हैं कि श्रीरामचरितमानस ही मेरे लिए साहित्य की प्रथम पाठशाला सिद्ध हुआ। इसी से प्रेरणा लेकर मैं साहित्य की ओर गया। घर में कोई साहित्यिक वातावरण नहीं था। मेरी माँ निरक्षर थीं। पिताजी नाममात्र के लिए विद्यालय गए थे और पूरे गाँव में शिक्षा का कोई वातावरण नहीं था परन्तु एक सपना था कि पढ़ना है। इस सपने को पूरा करने के लिए हर बाधा को लांघकर अध्ययन जारी रहा। इसे मैं भगवान की कृपा ही मानता हूँ कि सभी बाधाएं धीरे-धीरे दूर हुईं। शिक्षा प्राप्त की और साहित्य का सहारा भी प्राप्त हुआ। पहली नौकरी अध्यापक की प्राप्त हुई और विद्या नगरी पिलानी राजस्थान में रहा।
बड़े होकर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनने का सपना देखा जो कभी पूरा नहीं हुआ। बिड़ला हायर सेकेंडरी स्कूल पिलानी राजस्थान में हिन्दी का सीनियर अध्यापक बना, सहायक वार्डन भी बना, लेकिन प्रोफेसर नहीं बन पाया। चूंकि यह पहला सपना था जिसके पूरे न होने का दर्द शेष रहा। बाद में भारत सरकार के श्रम और रोजगार मंत्रालय में राजभाषा अधिकारी के रूप में नियुक्ति मिली और इंदौर में पोस्टिंग मिली। यहीं पर नौकरी करते हुए ‘वीणा’ में संपादक बना, जो आज भी हूँ। सौभाग्य यह है कि मैं उस समय ‘वीणा’ का संपादक बना जब यह अपने प्रकाशन की शताब्दी पूर्ण कर रही है। ‘वीणा’ में मुझसे पूर्व 13 अन्य संपादक भी रहे हैं जिनमें डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन, प्रसिद्ध आलोचक शांतिप्रिय द्विवेदी, डॉ. श्यामसुंदर व्यास जैसे वंदनीय साहित्यकार शामिल हैं। इन लोगों ने हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य के उन्नयन के लिए ‘वीणा’ को अपना अमूल्य योगदान दिया है। यह परंपरा मेरे लिए अनुकरणीय और वंदनीय बनीं। इसका निर्वाह मैं आज भी करता हूँ। ये सब दैवीय कृपा से संभव हो सका है। आज ‘वीणा’ ही एकमात्र पत्रिका है जो अपने प्रकाशन की शताब्दी पूर्ण कर निरंतर प्रकाशित हो रही है। इससे निरंतर जुड़े रहने का सौभाग्य मिला है। इसे मैं, ईश्वरीय कृपा मानता हूँ। यह हिन्दी साहित्य को भी सौभाग्य है कि उसकी यह पत्रिका प्रकाशन की शताब्दी पूरी कर सकी।

प्रश्न- आपके जीवन में शिक्षा ने केवल डिग्री नहीं, बल्कि सोच को कितना बदला? कानपुर विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ऐसी कौन-सी घटनाएं, शिक्षक या पुस्तकें रहीं जिन्होंने आपके भीतर साहित्य और समाज को देखने की एक अलग दृष्टि पैदा की?
उत्तर : विनय जी, यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षा ही जीवन को देखने की दृष्टि देती है। मेरी दृष्टि में पुस्तकों से जो शिक्षा मिलती है, उससे अधिक प्रभावी प्रशिक्षण जीवन हमें देता है, वह बहुत स्थायी होता है। पुस्तकों का ज्ञान सैद्धांतिक है और जीवन व्यावहारिक। प्रैक्टिकल से ही जीवन चलता है केवल सिद्धांत से नहीं। जीवन का फलक बहुत व्यापक है, इसमें अनेक विरोधी तत्व शामिल होते हैं, इन सबके साथ हमें जीवन जीना होता है। सर्जना के लिए ये व्यावहारिक ज्ञान, अनुभव ही काम आते हैं। आपने देखा होगा कि ऐसे अनेक रचनाकार हैं जिन्होंने विद्यालयों का मुँह नहीं देखा मगर वे अपनी सर्जना में जीवन सत्य को प्रकट कर गए। कबीर ने तो साफ-साफ कहा – “मसि कागद छूओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ”। इससे स्पष्ट है कि वे पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन जीवन और जगत की अनेक विसंगतियों पर उन्होंने लिखा। मानव के वास्तविक उत्थान के लिए रास्ता दिखाया। कबीर सर्वांग व्यक्ति थे। मगर सूरदास तो दिव्यांग थे। उनके लिखने-पढ़ने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। मगर कविता में जिस सौंदर्य की चर्चा उन्होंने की है, वह उनकी शारीरिक अपंगता को देखते हुए, असंभव सी प्रतीत होती है। इससे स्पष्ट है कि सर्जना के लिए डिग्रियां आवश्यक नहीं हैं। “ढाई आखर प्रेम को, पढ़े सो पंडित होय”। जीवन में जो व्यक्ति प्रेम से परिपूरित है और सजग है वह जीवन को साफ-साफ देख सकता है। इन रचनाकारों ने जीवन को देखने की यही दृष्टि पैदा की थी इसीलिए वे लोक-रंजन की बात भी कह सके और लोक की विसंगतियों को भी वाणी दे सके।
मेरे जीवन की स्थितियों ने मुझे भी जीवन को व्यावहारिक रूप में जीने के लिए बाध्य किया है। इसलिए मैं जो भी सीख सका, वह जीवन की अनुभूतियों से ही हैं, इन्हीं का उपयोग मेरी सर्जना में हुआ है। फिर वे चाहे कविता हो या कि निबंध। सभी में जीवनानुभव ही प्रकट हुआ है। मेरा यह मानना है कि लेखक का अनुभव इस तरह सर्जना में आना चाहिए कि पढ़ते हुए पाठक को यह लगे कि उसकी ही बात है। इसी तरह पठनीयता बढ़ती है और साहित्य अपनी मान्यताओं में मानवीय समाज में स्थापित कर पाता है। सारांश रूप में यह कह सकता हूँ कि मेरा जीवन ही वह पुस्तक है जिसे मैंने बहुत बारीकी से पढ़ा है। इसी के पाठों को गुना है। आज जीवन जैसा भी है, वह जीवन की अब तक यात्रा का अनुभव ही है।
प्रश्न- एक व्यक्ति के साहित्यकार बनने में परिवार की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है? आपके परिवार ने आपकी साहित्यिक रुचियों और व्यस्तताओं को किस तरह देखा? क्या कभी ऐसा समय आया जब परिवार और साहित्यिक जीवन के बीच संतुलन बनाना आपके लिए चुनौती बना?
उत्तर : केवल साहित्य ही नहीं बल्कि जीवन के किसी भी आयाम को पूरा करने में परिवार की भूमिका बहुत अहम होती है। इस जगत को ईश्वर ने इस तरह बनाया है कि यह आवश्यक नहीं है कि माता-पिता के परंपरागत कर्म को आने वाली पीढ़ी जस का तस स्वीकार करे। आपको अनेक उदाहरण मिलेंगे, जो बताते हैं कि पैतृक परंपरा में किसी व्यक्ति के वंशज राजनेता नहीं थे, मगर नई पीढ़ी ने नेता पैदा किए। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ही उदाहरण ले लीजिए। अनेक ऐसे उदाहरण भी मिलेंगे जो अपनी विषम पारिवारिक स्थितियों से लड़कर सफल हुए हैं। मेरे परिवार ने मुझे साहित्यकार बनाने का कोई उद्यम नहीं किया है। जैसा कि मैंने पहले ही बताया है कि शिक्षा का अभाव है, गरीबी है, संत्रास है। इसके बाद भी ईश्वर की मंशा रही होगी कि मैं अनजाने से इस रास्ते पर चलूं। इतना तो कह ही सकता हूँ कि जैसा भी मेरा व्यक्तित्व है उसमें बाबा तुलसीदास की सर्जना की ही कृपा है। श्रीरामचरितमानस मेरे जीवन के निर्माण में सहायक है। आप कह सकते हैं कि यही मेरा साहित्यिक परिवार है, जिसने मुझे साहित्यकार भी बनाया और जीवन से लड़ने की शक्ति भी दी। मुझे बहुत बार आश्चर्य होता है कि आखिर एक कवि युगों तक मनुष्यता को किस तरह प्रभावित कर सकता है। यह श्रीरामचरितमानस के अनुभव से कहा जा सकता है। केवल मैं ही नहीं बल्कि इस संसार में अनगिनत लोग होंगे जिनके जीवन चरित्र को इस अकेली पुस्तक ने परिवर्तित, परिवर्धित और परिष्कृत किया है।
इन अर्थों में मैं, अपने स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ कि मेरे परिवार ने भले ही इस क्षेत्र में जाने के लिए कोई उद्यम न किया हो मगर रास्ते में कोई अड़चनें भी पैदा नहीं कीं। बल्कि समय-समय पर जब-जब अलंकृत पुरस्कृत हुए तब-तब परिवारजनों ने मेरा उत्साह ही बढ़ाया है। कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद जो समय मुझे परिवार को देना था उसमें कटौती करके मैं साहित्य की साधना में लगा रहा। यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूं कि परिवार के लोगों का समय मैंने लिया हो मगर सच यह भी है कि वह समय अध्ययन, मनन और लेखन को ही अर्पित रहा। मैं, स्वयं भी उस समय का उपयोग वैयक्तिक आनंद के लिए उपयोग नहीं कर सका। अनुशासन की चहारदीवारी में मैं कैद रहा हूँ जो आज भी हूँ। अनुशासन में रहे बिना जीवन में कोई स्थायी उपलब्धि प्राप्त नहीं होती।
प्रश्न- आपने सरकारी सेवा से लेकर साहित्य और पत्रकारिता तक का लंबा सफर तय किया है। यदि आपको अपने जीवन के इन अलग-अलग पड़ावों में से किसी एक अनुभव को चुनकर आज के युवाओं को देना हो, तो वह क्या होगा? और सरकारी नौकरी ने आपके भीतर के लेखक को क्या सिखाया?
उत्तर : विनय जी, आपका यह सवाल मेरी दुखती हुई नस पर हाथ रखने जैसा है। मैंने, लगभग 32 वर्ष श्रम और रोजगार मंत्रालय भारत सरकार में नौकरी की है। नौकरी का कार्य साहित्यिक नहीं था। वह एक बंधी हुई लीक को पीटने जैसा था, नीरस और अनुपजाऊ। उपज के नाम पर पैसे थे, जिनसे मेरा और मेरे परिवार का जीवन चला। अनुभव बताता है कि केवल लेखन के सहारे जीवन जिया नहीं जा सकता। इसके लिए आज धन उपार्जन की गहरी आवश्यकता है। हमारा समकाल मनुष्य को बिना पैसे के जीवन जीने की इजाजत नहीं देता। सच ये है कि पैसे कमाने के फेर में सर्जनात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। हिन्दी में अधिकांश रचनाकार पहले नौकरी करते हैं और फिर लेखनकर्म। इस तरह से बहुत नीरस मानस से सर्जना कर्म हो रहा है। होना तो यह चाहिए था कि सर्जक को सर्जना के लिए समाज और सरकार व्यवस्था देती। ताकि बहुत अच्छी रचनाएं हमें प्राप्त होतीं। मगर ऐसा नहीं हो सका। इसलिए हर लेखक पहले अपनी नौकरी में व्यस्त है। समय मिलने पर वह सर्जना करता है।
मुझे मेरी नौकरी ने यह सिखाया है कि सर्जना कर्म नितांत समर्पण मांगता है लेकिन लेखन का कोई सम्बन्ध नौकरियों से नहीं होता। मैंने भी सर्जना और नौकरी के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश की है। इसके लिए मुझे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। संतोष यहीं है कि सर्जना के बीज बचे रहे जो अब अंकुरित हो रहे हैं और अब तक विभिन्न विषयों पर बीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पत्रकारिता स्वतंत्र रूप से की है, वह भी साहित्य, संस्कृति और सभ्यता तथा भाषा के विभिन्न कोणों से। सरकार में रहते हुए राजनीतिक पत्रकारिता की स्वतंत्रता नहीं थी। इसलिए ये विषय हमारे लिए केंद्रीय रहे। ‘वीणा’ में जब संपादक बना तब मैं भारत सरकार की नौकरी में था। नियमों के अनुसार कोई भी व्यक्ति दो जगह से पगार नहीं ले सकता। ‘वीणा’ संस्थान में अवैतनिक संपादक रहा। केवल साहित्य में काम करने का अवसर तलाश रहा था, वह तलाश ‘वीणा’ में पूरी हुई। आज का नवयुवक संघर्ष से घबराता है, लेकिन जीवन का विकास संघर्ष के बिना संभव ही नहीं। हमारे पास जिन सफल महापुरुषों की गाथाएं हैं वे सब हमें संघर्ष की ही शिक्षा देती हैं। आज यदि आत्म-हत्याओं का ग्राफ बढ़ रहा है तो इसका मूल कारण जीवन के संघर्षों से मनुष्य का घबराना ही है। असफलताएं भी जीवन को शिक्षा देती हैं लेकिन इन शिक्षाओं को खुले मन से और विवेकपूर्ण ढंग से स्वीकार करना चाहिए। सफलता अंत में इसी रास्ते से मिलती है। किसी भी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। जीवन को असमतल धरातलों से गुजारना ही पड़ता है।



प्रश्न- आपकी पसंद की किताब, लेखक और साहित्यिक विधा कौन-सी है और ऐसी कौन-सी किताब या रचना है जिसे आप बार-बार पढ़ सकते हैं? इसके साथ यह भी बताइए कि साहित्य में आपकी पसंद और नापसंद क्या है। क्या कोई ऐसी साहित्यिक प्रवृत्ति है जिससे आप सहमत नहीं हैं?
उत्तर : आधुनिक साहित्य में मैंने डॉ. रामविलास शर्मा को आद्योपांत पढ़ा है, अनुशीलन भी किया है। श्रीनरेश मेहता के सर्जना कर्म पर भारत सरकार का सीनियर फेलोशिप मिला। इस दौरान मैंने श्रीनरेश मेहता को आद्यंत पढ़ा है। रजनीश मेरे वैचारिक विमर्श के गुरु हैं और कविता में तुलसीदास। ये भिन्न-भिन्न विचारों के लोग मेरी जीवन यात्रा के सहचर रहे हैं और आज भी हैं। रामविलास शर्मा ने यह दृष्टि दी है कि श्रमपूर्वक कार्य कैसे किया जाता है? श्रीनरेश मेहता ने बताया कि केवल समकाल की बात करने से सफलता संभव नहीं है। आपको अपने अतीत का स्मरण करना ही होगा। कोई भी वर्तमान अनायास नहीं होता। उसकी धमनियों में अतीत का रक्त प्रवाहित होता है। आचार्य रजनीश जीवन को तर्क की कसौटी पर कसते हैं, उनके साथ चलने से अंधानुकरण की प्रवृत्ति समाप्त होती है और एक नया उजास जीवन को मिलता है। पुस्तक पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, ‘गांधी, आंबेडकर लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएं’ मेरी पसंदीदा पुस्तकें हैं। आवश्यकतानुसार इनका अध्ययन करता रहता हूँ। महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ मेरी बहुत पसंदीदा किताब है, जिसे मैं पढ़कर मुग्ध भी होता हूँ और ऊर्जा भी ग्रहण करता हूँ।
प्रश्न- लगभग एक सदी की साहित्यिक परंपरा से जुड़े ‘वीणा’ जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन समूह के साथ काम करना अपने आपमें एक विरासत को आगे बढ़ाना है। महादेवी वर्मा जैसे महान साहित्यकारों की रचनाओं से जुड़ी इस परंपरा को देखते हुए आज के संपादक के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या है? परंपरा को बचाना या साहित्य को समय के साथ बदलना?
उत्तर : विनय जी, हर लेखक का अपना समकाल होता है, उसे अपने समकाल में रहते हुए ही सर्जना करनी होती है। महादेवी वर्मा का समकाल अलग था। इसलिए उनकी सर्जना पर उनके समकाल का प्रभाव है। आज के लेखक के समक्ष जीवन की वे चुनौतियां नहीं हैं जो अतीत के रचनाकार के सामने रही हैं, यह स्वाभाविक भी है और समय के परिवर्तन का प्रमाण भी। मेरा यह मानना है कि लेखक को अपने समकाल के साथ रहना ही चाहिए। लेकिन अपनी स्थापित परंपरा का विस्मरण भी नहीं करना चाहिए। यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मोटे तौर पर परंपरा का अर्थ, रीत-रिवाज या लीक पीटने अथवा अनुगमन करने के संदर्भ में किया जाता है। परन्तु यह स्पष्ट है कि परंपरा का अर्थ रीतियों और कुरीतियों की तरह नहीं होता। हमने यह माना है “शिष्यात् पुत्रात् पराजयेत्” इसका अर्थ है कि गुरु प्रार्थना कर रहा है हे ईश्वर! मुझे अपने शिष्यों से पराजय मिले। पिता प्रार्थना कर रहा है कि हे ईश्वर! मैं अपने पुत्र से ही पराजित हो जाऊँ। इसका गहरा अर्थ हुआ कि गुरु और पिता अपने शिष्य और पुत्र को अपने से अधिक श्रेष्ठ स्थिति में देखना चाहते हैं, लाना चाहते हैं। साहिर लुधियानवी ने ठीक ही लिखा है कि “कल और आएंगे नगमों से खिलती कलियां चुनने वाले/मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले।” यह बोध हमें हमारी परंपरा से मिलता है। इसलिए परंपरा का निर्वाह लेखक को करना ही चाहिए। परंपरा की बात करने का मतलब घिसी-पिटी व्यवस्था का पोषण करना नहीं है और न इतिहास की शव-साधना करना है। बल्कि अपने शक्ति प्रतिष्ठानों का पुण्य-स्मरण करना है जो आपके जीवन को राह दिखाते आ रहे हैं।
प्रश्न- आज साहित्य और पत्रकारिता दोनों ही सोशल मीडिया तथा डिजिटल माध्यमों के दौर से गुजर रहे हैं। आपको क्या लगता है कि डिजिटल युग ने साहित्य को आम पाठक तक पहुँचाया है या गंभीर साहित्य को ‘त्वरित सामग्री’ में बदलने का खतरा भी पैदा किया है?
उत्तर : साहित्य गंभीर या अगंभीर नहीं होता। वास्तविकताओं यह है कि हम साहित्य को किस गहराई से पकड़ते हैं। हर रचनाकार अपने लेखन में समाज के कल्याण और जीवन के हितार्थ लिखता है, मगर इसके संदेश को ग्रहण करना पाठक पर निर्भर होता है। ये सच है कि आज मीडिया के विस्फोट ने साहित्य के पाठकों की संख्या कम की है। आज सवाल यह है कि अमुक पत्रिका समाचार पत्र अथवा पुस्तकें पढ़ने वालों की संख्या कम से कम होती जा रही है। हमारा मन मोबाइल पर दृश्य देखने में अधिक व्यस्त है और जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं उसकी यात्रा चित्रों के माध्यम से अधिक हो रही है और जब चित्त में चित्र प्रभावी हो जाता है तब शब्द के लिए जगह कम बचती है। साहित्य की संपूर्ण यात्रा शब्दों की यात्रा है और यह समय शब्द के बजाय चित्र में प्रवेश कर गया है। इसलिए साहित्य के गंभीर पाठक निरंतर कम हो रहे हैं। यह किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते। साहित्य के पठन उसकी सर्जना के समतुल्य ही होता है। लेखक ने जिसे मानसिक धरातल पर सर्जना की है उस स्तर पर पहुंचे बगैर रचना के मूल को नहीं समझा जा सकता। आज का वातावरण प्रलोभनों से भरा है। इन सबकी अनदेखी किए बगैर कोई भी सर्जना के सही पैठ नहीं बना सकता।
सोशल मीडिया ने साहित्य के गंभीर स्वरूप को हानि पहुंचाई है, अब हर व्यक्ति के पास स्पेस है और कहने की जल्दबाजी है। इसलिए हर कोई बोलने पर आमादा है। अध्ययन सिरे से गायब है, इसलिए बातों का वातावरण है, मगर शोध के लिए जगह कम से कमतर होती जा रही है। इधर हमारे यहाँ एक और अपशकुन हो रहा है। हम लोगों के पुस्तकालय वीरान होने लगे हैं। पुस्तकालयों का सूना होना अपशकुनों की भयावह सूचना देता है।
प्रश्न- आपने समाज और साहित्य को कई दशकों तक बहुत करीब से देखा है। आज के समाज में आपको सबसे बड़ा सकारात्मक बदलाव क्या दिखाई देता है और ऐसी कौन-सी सामाजिक चिंता है जो आपको भीतर से बेचैन करती है? यदि लेखक समाज का आईना है, तो आज के आईने में आपको क्या दिखाई देता है?
उत्तर : यह ठीक है कि साहित्य ही समाज का आईना बना है। आईना, इन अर्थों में कि वह समाज की वास्तविकता को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। एक समय वह था कि जब यह कहा गया था कि जो आँख से दिखाई पड़ता है, वही सच है मगर यही बात आज के समय में सही नहीं है। आज जो चित्र हम टीवी के पर्दे पर देखते हैं उन सबको सच मान लेने के खतरे हैं। इसका अर्थ है कि सत्य कुछ और होता है मगर दिखाया कुछ और ही जाता है। इस तरह साहित्य और समाज के बीच अविश्वास की खाई बढ़ी है। जो साहित्य पत्रकारिता के कंधों पर चढ़कर समाज तक गया आज उसी पत्रकारिता ने साहित्य से दूरियां बना ली हैं। आज कितने समाचार पत्र हैं जो साहित्य के परिशिष्ट प्रकाशित करते हैं, शायद एक भी समाचार पत्र गंभीर साहित्य के पृष्ठ प्रकाशित नहीं कर रहा है। ऊपर से तुर्रा यह है कि पाठकों की संख्या कम हो रही है, इसलिए साहित्य के प्रकाशन की आवश्यकता नहीं है, यह भी सच है कि लोगों के पास पहले की तुलना में अधिक धन आ गया है। परिणामतः किताबों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ठीक इसी समय पाठकों की संख्या निरंतर कम हो रही है। देश के आजाद होते समय 40 करोड़ भारतीय यहाँ रहते थे। आज यह संख्या 150 करोड़ के पास पहुँच गई है और इसमें साहित्य के पाठकों का अनुपात निरंतर कम होता जा रहा हैं। आप ध्यान से देखिए कि राजनेताओं को दर्शकों की, समर्थकों की कमी नहीं है। प्रवचनकारों के सामने श्रोताओं का अभाव नहीं है, फिल्म के दर्शकों की कमी नहीं है, अगर किसी के पास लोगों की कमी है तो वह साहित्य है। साहित्य का संपूर्ण कार्य व्यापार मनुष्य की संवेदना से चलता है। संवेदना के स्तर का कम होना सबसे बुरी खबर है। जैसे-जैसे यह स्तर कमजोर पड़ता जाएगा वैसे ही वैसे समाज में पशुता, अराजकता का भाव प्रबल होता जाएगा। साहित्य इन सबके समर्थन में खड़ा है। यही उसका मूल स्वभाव है। इसकी रक्षा होनी चाहिए।
प्रश्न- तत्कालीन राजनीति और आज की राजनीति में आपको सबसे बड़ा फर्क क्या दिखाई देता है? क्या आपको लगता है कि आज साहित्यकार और पत्रकार राजनीतिक-सामाजिक सवालों पर पहले की तरह स्वतंत्र होकर अपनी बात कह पा रहे हैं? और क्या साहित्य को सत्ता से सवाल पूछना चाहिए?
उत्तर : साहित्य ही है जो सत्ता से सवाल पूछता आ रहा है और जब तक साहित्य का अस्तित्व शेष है तब तक वह सवाल खड़े करेगा। साहित्य के द्वारा पूछे गए सवाल मानवीय संवेदना की भूमि पर खड़े होते हैं। वह पत्रकारों की तरह से सवाल नहीं करता। मगर जो सवाल वह खड़े करता है उनके उत्तर भी देता है। इसलिए साहित्य आज भी सवाल और जवाब एक साथ लेकर मैदान में है। यह आशा भी करनी चाहिए कि समाज में साहित्य की उपस्थिति इस रूप में सदा बनी रहे। साहित्य अगर सवाल नहीं करेगा तब फिर प्रश्नों के उत्तर आने ही बंद हो जाएंगे। साहित्य का उद्देश्य सवाल दागकर पलायन करना नहीं है। बल्कि उन सवालों के उत्तर तलाशना भी साहित्य का ही काम है। साहित्य का संपूर्ण कार्य-व्यापार भाषा के सहारे ही चलता है। इसलिए उनकी चिंताओं में भाषा का अमर बना रहना आवश्यक है। राजनीति समाज के अनुसार अपना स्वरूप बदलती रहती है। यह बदलाव उसके प्राणों के लिए जरूरी है, मगर साहित्य स्वयं के स्वरूप को परिवर्तन करने के लिए बाध्य नहीं है। हां, परिवर्तन उसमें भी होता है, वह समय की गहरी मांग से प्रभावित होकर। हमारे अमर ग्रंथ ‘गीता’ और श्रीरामचरितमानस की सर्जना का आधार प्रश्न-उत्तर ही है। सवाल अर्जुन करता है, इसके उत्तर में गीता आई। पार्वती जी प्रश्न के उत्तर में रामकथा आयी। यह प्रसंग बताते हैं कि सवालों के जवाब तलाशना ही बौद्धिक वर्ग का कर्तव्य है। ईश्वर से प्रार्थना कीजिए कि यह क्रम शाश्वत बना रहे। मैं, सर्जना को ही साहित्य का मूल बिंदु मानता हूँ शेष सब साहित्य के कार्य व्यापार हैं।
प्रश्न- आपने लेखन, संपादन, पत्रकारिता, व्याख्यान और साहित्यिक आयोजनों—कई भूमिकाएं निभाई हैं। इनमें से कौन-सी भूमिका आपको सबसे अधिक संतुष्टि देती है और कौन-सी सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रही? यदि आपको अपने पूरे साहित्यिक जीवन का केवल एक काम आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ना हो, तो वह क्या होगा?
उत्तर : आपके द्वारा गिनाए गए इन बिंदुओं में सर्जना का समावेश नहीं है। साहित्यिक जीवन का हर आयाम महत्वपूर्ण है लेकिन सर्जना से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। मुझे सर्जना में ही सर्वाधिक आनंद प्राप्त हुआ है। आज भी मैं इसी के माध्यम से साहित्य की सेवा में रहना चाहता हूँ।
प्रश्न- आज का युवा साहित्य से दूर होने की बात कही जाती है, लेकिन दूसरी ओर नई पीढ़ी कविता, ब्लॉग, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर लिख भी रही है। आप नई पीढ़ी के लेखकों में कौन-सी संभावनाएं देखते हैं और उन्हें साहित्य में टिकाऊ पहचान बनाने के लिए किन तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर : यह द्वंद्व हमारे यहां बहुत गहरा है कि अगली पीढ़ी साहित्य रचेगी या नहीं रचेगी। पढ़ेगी या पलायन कर जाएगी, लेकिन मेरा यह मानना है कि जब तक धरती पर मनुष्य रहेगा। साहित्य जीवित रहेगा। साहित्य केवल संवेदना के सहारे ही नहीं चलता, वह जीवन में संवेदना का ही कारोबार करता है। इसलिए नई पीढ़ी जो अभी भाषा के संस्कारों से काट दी गई है, वह समय के एक मोड़ पर पुनः इससे जुड़ेगी और साहित्य का व्यापार आगे बढ़ेगा। जीवन मौन होकर नहीं काटा जाता, उसके लिए अभिव्यक्ति चाहिए। आत्मा की गहराइयों से निकली हुई बात ही साहित्य कहलाती है और इसलिए साहित्य में केवल मनुष्य के ही वक्तव्य नहीं लिखे जाते बल्कि इस धरा पर जितने भी जड़ और चेतन हैं, उन सबके वक्तव्य साहित्य में लिखे जाते हैं। यहाँ फूल की कोमलता भी लिखी जाती है और कांटे का तीखापन भी रिकॉर्ड किया जाता है। इसलिए साहित्य का कार्य-व्यापार उतार-चढ़ावों के बीच यूं ही चलता रहेगा। आने वाली पीढ़ी अपना मार्ग स्वयं चुनेगी। यह पीढ़ी अधिक समय और सूचना संपन्न है। यह पीढ़ी किसी भी बात का अनुकरण आंख बंदकर नहीं चलती।
प्रश्न- अंत में एक व्यक्तिगत और आत्मीय सवाल—राकेश शर्माजी के जीवन में ऐसा कौन-सा सपना है जो अभी पूरा होना बाकी है? यदि आपको अपने जीवन की पूरी यात्रा को पीछे मुड़कर देखने का अवसर मिले, तो बचपन के उस राकेश शर्मा और आज के राकेश शर्मा के बीच आप क्या संवाद करना चाहेंगे? और आने वाली पीढ़ी के लिए आपका सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या होगा?
उत्तर : जीवन के प्रारंभिक दिनों में सपने देखे जाते हैं। लेकिन ईश्वर की कृपा से जब सपने पूर्ण होते हैं तब जीवन की पूर्णता का एहसास भी होता है। मैं, अपने छात्र जीवन में एक प्रोफेसर बनने का सपना देखता था, वह तो पूर्ण नहीं हुआ, हां मैं, सीनियर लेक्चरर के रूप में पिलानी राजस्थान में पोस्टेड रहा हूँ। सरकार में 32 वर्ष गज़ेटेड ऑफिसर (राजपत्रित अधिकारी) के रूप में सेवारत रहा। और ‘वीणा’ जैसी ऐतिहासिक साहित्यिक पत्रिका में लगभग 15 वर्षों से संपादक के रूप में काम करता आ रहा हूँ। सर्जना की 20 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। श्री नरेश मेहता की सर्जना से संबंधित दो आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। राष्ट्रीय स्तर के लगभग 20 पुरस्कार प्राप्त हुए। इन सबकी उपलब्धि यह बताती है कि प्रकृति ने मेरा चुनाव किया है और अपने निर्देशों से मुझसे काम करवाया। अब कोई सपना ऐसा शेष नहीं है जिसके अभाव से जीवन में कोई कराह शेष हो। हां, यह मनोकामना शेष है कि जीवन का शेष बचा हुआ समय सर्जना के शोध पक्षों पर खर्च हो और वहां कोई अमर कृति भगवान मुझसे पूर्ण करवाएं।
शब्दों के साधक, संघर्ष, शुचिता और साहित्य की अनवरत साधना: श्री गिरीश पंकज जी से विशेष बातचीत

प्रश्न- जीवन में कुछ लोग हमें किताबों से अधिक सिखाते हैं। आपके जीवन में ऐसा कौन-सा व्यक्ति रहा, जिसने आपके व्यक्तित्व और सोच को सबसे अधिक प्रभावित किया? वह कौन-सी सीख है जिसे आपने उनसे पाया और आज भी अपने जीवन में निभा रहे हैं?
उत्तर : डॉ. रामविलास शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व ने मुझे सहारा दिया है। वे मार्क्सवादी परंपरा से आते हैं। भारतीयता उनकी सर्जना का मूल है। वे निराला की साहित्यिक परंपरा के अकेले संवाहक हैं। लेखन के प्रति ईमानदार होना, उन्होंने सिखाया। प्रलोभन के बिना ही सर्जना में बने रहना उन्होंने सिखाया है। कोई लेखक भावी पीढ़ियों का कैसे मार्गदर्शन करता है यह उनसे सीखा। उनका बहुत गहरा और अमिट प्रभाव मुझ पर पड़ा है। यह बात अलग है कि मैं, मार्क्सवादी नहीं हूँ। मैं, गांधीजी की सन्निकट अपने को पाता हूँ।
प्रश्न- साहित्य केवल शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से भी बनता है। आपने अपने लंबे साहित्यिक और सामाजिक जीवन में अनेक लोगों, परिस्थितियों और संघर्षों को करीब से देखा है। क्या कभी किसी सामान्य व्यक्ति की छोटी-सी घटना या पीड़ा ने आपको भीतर तक प्रभावित किया और बाद में वह आपके लेखन या सोच का हिस्सा बन गई?
उत्तर : घटनाएं छोटी और बड़ी कही जा सकती हैं। इनका कितना प्रभाव व्यक्तित्व पर पड़ता है उसका मूल्यांकन सही अर्थों में होना चाहिए। जिस दशक में मेरा जन्म हुआ। वह दशक देश की गरीबी के प्रभाव का था। आजादी मिली ही थी। देश अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में था। सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रयत्न हो रहा था। भाषा और साहित्य का इस जागरण के आधारभूत स्तंभ थे। उसी समय मैंने, साहित्यिक संस्कार ग्रहण किए। यही संस्कार आज हमारे काम आ रहे हैं। संस्कार ही जीवन की ढाल बन जाते हैं। व्यक्तियों में तुलसीदास ही हैं और लेखकों में डॉ. रामविलास शर्मा जो मेरे भीतर से आवाज लगाते रहते हैं। इन्हीं का प्रभाव सर्वाधिक मेरे मन पर पड़ा है।
प्रश्न- यदि आज आपके सामने बचपन के वही राकेश शर्मा खड़े हों, जिनकी आँखों में कुछ बनने का सपना था, तो आप उन्हें क्या कहेंगे? क्या आप उनसे कहेंगे कि उन्होंने अपने सपने को सही दिशा दी? और यदि आपको अपने जीवन की यात्रा से एक सीख, एक संदेश और एक सपना आने वाली पीढ़ी को सौंपना हो, तो वे तीन चीजें क्या होंगी?
उत्तर : यदि आप साहित्य में सर्जना का रास्ता चुनते हैं तो यह मानकर चलिए कि जीवन के हर पल का हिसाब-किताब आपको रखना है। अर्थ यह है कि पूरी सजगता चाहिए। दूसरी बात यह है कि साहित्य में कोई शॉर्टकट नहीं होता। सजगता के साथ जीवन जीना, एक सर्जक के लिए आवश्यक है। साहित्य का इतिहास हर किसी को स्थान नहीं देता। जीवन के अन्य फलक साहित्य से अलग होते हैं। साहित्य का रास्ता सबसे अलग हैं। इसके साहित्य का मूल्यांकन हर समकाल में होता रहता है। इसलिए अनावश्यक प्रविष्टियां निरंतर खारिज होती रहती हैं। यही साहित्य की विशेषता है और यही उसका अनूठापन भी है। हमारे समकाल की पीढ़ी अनेक रूपों में पिछली पीढ़ियों से भिन्न हैं। प्रायः इसका चुनाव मोटे पैकेज वाली नौकरियों से है। साहित्य में मोटे और निरंतर पैसे की प्राप्ति के रास्ते प्रायः नहीं हैं। जो लोग मार्केटिंग के द्वारा स्वयं को स्थापित कर कुछ पैसा आदि कमाने का उद्यम करते दिखाई पड़ते हैं, असल में वे अंततः साहित्य की मान्यताओं को हानि पहुँचा रहे हैं। हानि इस रूप में कि साहित्य का स्वभाव मार्केटिंग नहीं है, वह बिना बाजार के कंधों पर सवार हुए सामाजिक क्रांति का अपना काम करता आया है और भविष्य में भी करता रहेगा। जिन युवाओं के मन में सामाजिक परिवर्तन लाने और कुरूपताओं से लड़ने का साहस हैं, उन्हें साहित्य के रास्ते पर जरूर चलना चाहिए।
जीवन में सपने देखना और उन सपनों का पूरा होना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। सपना देखना सामान्य बात है, हर आँख सपना देखती है मगर हर देखा हुआ सपना, साकार हो यह जरूरी नहीं है। सपने का साकार होना श्रम, पुरुषार्थ, पुरखों की कृपा, ईश्वर की अनुकंपा तथा अन्य कारकों पर निर्भर होता हैं। जीवन के ताने-बाने इस तरह से बुने गए हैं कि हर व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में कहीं न कहीं सपनों के पूरा न होने की पीड़ा से पीड़ित होता है। मैंने जीवन को ईश्वर का प्रसाद माना है और जो जीवन में घटित हुआ है उसे भी ईश्वरीय आदेश माना है। इसलिए अब न कोई शिकायत है न आकांक्षा है, न किसी सपने के पूरे होने की तड़प है। पुरखे कहते आए हैं कि यह जीवन ईश्वर ने दिया है और यह उसी को अर्पित है। आपका बहुत धन्यवाद, आभार।

शब्दों की लौ को आगे ले जाने का संकल्प
राकेश शर्मा जी से बातचीत समाप्त होने के बाद भी उनके शब्द देर तक मन में गूंजते रहे। उनकी जीवन-यात्रा को सुनते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि साहित्य केवल किताबों के पन्नों पर लिखे अक्षरों का संसार नहीं है। उसके पीछे एक पूरा जीवन होता है—संघर्षों का, संस्कारों का, असफलताओं का, धैर्य का और लगातार चलते रहने की जिद का। न्यामतपुर की मिट्टी से निकला एक बालक जब ‘वीणा’ जैसी शताब्दी की साहित्यिक विरासत का संपादक बनता है, तो उसके पीछे केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि वर्षों की साधना और शब्दों के प्रति अटूट विश्वास भी होता है।
राकेश जी से संवाद ने यह विश्वास और मजबूत किया कि साहित्य में स्थायित्व किसी तात्कालिक लोकप्रियता से नहीं, बल्कि निरंतरता और निष्ठा से आता है। ‘वीणा’ की यात्रा इसका जीवंत प्रमाण है। बदलते समय, बदलती तकनीक और बदलते पाठकीय स्वाद के बीच भी इस पत्रिका ने अपनी मूल साहित्यिक गरिमा को बनाए रखा है। यही कारण है कि आज इसकी शताब्दी केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की उस परंपरा का सम्मान है, जिसने अनेक पीढ़ियों को शब्दों, विचारों और संवेदनाओं से जोड़ा है।
राकेश शर्मा जी का व्यक्तित्व इस पूरी यात्रा में एक ऐसे साधक का दिखाई देता है, जिसने उपलब्धियों से अधिक अपने दायित्व को महत्व दिया। उन्होंने जिस विश्वास और श्रम के साथ ‘वीणा’ की संपादकीय परंपरा को आगे बढ़ाया, वह आने वाले समय के लिए भी प्रेरणा है। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि परिस्थितियां चाहे जितनी कठिन हों, यदि मनुष्य अपने कर्म और अपने मूल्यों से समझौता न करे, तो समय स्वयं उसकी यात्रा का साक्षी बन जाता है।
इस बातचीत के माध्यम से मेरे लिए भी यह एक विशेष अनुभव रहा। एक लेखक और स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अनेक व्यक्तित्वों से संवाद करने का अवसर मिलता रहा है, लेकिन कुछ बातचीतें भीतर तक उतर जाती हैं। राकेश जी के साथ हुई यह बातचीत उन्हीं में से एक है। इसमें मैंने केवल एक वरिष्ठ संपादक से उनके अनुभव नहीं पूछे, बल्कि एक ऐसे साहित्य-साधक के जीवन को करीब से समझने का प्रयास किया, जिसने अपनी पूरी यात्रा में शब्द को साधना और साहित्य को सेवा माना।
आज जब ‘वीणा’ अपनी शताब्दी की दहलीज पर खड़ी है, तब राकेश शर्मा जी जैसे साधक उसके वर्तमान और भविष्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी दिखाई देते हैं। उनकी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि साहित्य की वास्तविक शक्ति उसकी चमक में नहीं, उसकी निरंतर जलती हुई लौ में होती है। पीढ़ियां बदलती हैं, समय बदलता है, माध्यम बदलते हैं, लेकिन यदि शब्दों के प्रति आस्था जीवित रहे तो साहित्य की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।
शायद यही ‘वीणा’ की सबसे बड़ी शक्ति है और यही राकेश शर्मा की सबसे बड़ी साधना भी—शब्दों की उस लौ को जलाए रखना, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का दायित्व समय ने उन्हें सौंपा है।
अगले अंक में पढ़िए किसी अन्य शख्सियत से ख़ास बातचीत, बने रहिये vinayvimarsh.org के साथ
✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार


विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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