BREAKING UPDATES
► डिजिटल बिहार के दावे, फिर भी रिश्वत और बिचौलियों के हवाले जनता! आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?► भारत को अस्थिर करने का सपना देखने वालों सावधान! यह भारत है, कोई प्रयोगशाला नहीं, जहाँ साजिशों से सत्ता पलट दी जाए► श्रीराम के आदर्शों से जगमगाएं जीवन, इस दशहरे अपने भीतर के रावण का करें अंत!► त्योहारों पर आंदोलन की आड़ में सियासत का तांडव! गरीब की रोटी और व्यापारियों की रोजी-रोटी पर चोट करने वालों को जनता कब तक सहे?► जेन जी की LOL भाषा और हमारी उलझन!► दिल्ली को बंधक बनाने की राजनीति बंद करो! जनता के अधिकारों से खिलवाड़ आखिर कब तक?► एक सदी की ‘वीणा’, एक साधक का जीवन और एक आत्मीय संवाद► मशालों की रोशनी में गूंजा शहीद भगत सिंह का संदेश, प्रताप नगर में युवाओं ने कहा—‘इंकलाब जिंदाबाद’► पितृपक्ष: जब स्मृतियों में लौट आते हैं माता-पिता, संस्कार और उनका अनंत आशीर्वाद► भाषाएँ अनेक, साहित्य एक! भुवनेश्वर में 26-27 सितंबर को श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव► डिजिटल बिहार के दावे, फिर भी रिश्वत और बिचौलियों के हवाले जनता! आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?► भारत को अस्थिर करने का सपना देखने वालों सावधान! यह भारत है, कोई प्रयोगशाला नहीं, जहाँ साजिशों से सत्ता पलट दी जाए► श्रीराम के आदर्शों से जगमगाएं जीवन, इस दशहरे अपने भीतर के रावण का करें अंत!► त्योहारों पर आंदोलन की आड़ में सियासत का तांडव! गरीब की रोटी और व्यापारियों की रोजी-रोटी पर चोट करने वालों को जनता कब तक सहे?► जेन जी की LOL भाषा और हमारी उलझन!► दिल्ली को बंधक बनाने की राजनीति बंद करो! जनता के अधिकारों से खिलवाड़ आखिर कब तक?► एक सदी की ‘वीणा’, एक साधक का जीवन और एक आत्मीय संवाद► मशालों की रोशनी में गूंजा शहीद भगत सिंह का संदेश, प्रताप नगर में युवाओं ने कहा—‘इंकलाब जिंदाबाद’► पितृपक्ष: जब स्मृतियों में लौट आते हैं माता-पिता, संस्कार और उनका अनंत आशीर्वाद► भाषाएँ अनेक, साहित्य एक! भुवनेश्वर में 26-27 सितंबर को श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव► डिजिटल बिहार के दावे, फिर भी रिश्वत और बिचौलियों के हवाले जनता! आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?► भारत को अस्थिर करने का सपना देखने वालों सावधान! यह भारत है, कोई प्रयोगशाला नहीं, जहाँ साजिशों से सत्ता पलट दी जाए► श्रीराम के आदर्शों से जगमगाएं जीवन, इस दशहरे अपने भीतर के रावण का करें अंत!► त्योहारों पर आंदोलन की आड़ में सियासत का तांडव! गरीब की रोटी और व्यापारियों की रोजी-रोटी पर चोट करने वालों को जनता कब तक सहे?► जेन जी की LOL भाषा और हमारी उलझन!► दिल्ली को बंधक बनाने की राजनीति बंद करो! जनता के अधिकारों से खिलवाड़ आखिर कब तक?► एक सदी की ‘वीणा’, एक साधक का जीवन और एक आत्मीय संवाद► मशालों की रोशनी में गूंजा शहीद भगत सिंह का संदेश, प्रताप नगर में युवाओं ने कहा—‘इंकलाब जिंदाबाद’► पितृपक्ष: जब स्मृतियों में लौट आते हैं माता-पिता, संस्कार और उनका अनंत आशीर्वाद► भाषाएँ अनेक, साहित्य एक! भुवनेश्वर में 26-27 सितंबर को श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव

डिजिटल बिहार के दावे, फिर भी रिश्वत और बिचौलियों के हवाले जनता! आखिर कब बदलेगी व्यवस्था?

दिल्ली से विनय श्रीवास्तव और पटना से दीपक कुशवाहा

सरकारी दफ्तरों में जनता की जेब क्यों ढीली होती है? अपनी ही जमीन के कागजात दुरुस्त कराने के लिए आम आदमी को सिफारिशों और बिचौलियों का सहारा क्यों लेना पड़ता है? डिजिटल क्रांति और सुशासन के बड़े-बड़े दावों के बीच यदि एक गरीब नागरिक अपने जायज काम के लिए भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, तो सवाल केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर नहीं, बल्कि उन दावों की जमीनी हकीकत पर भी उठता है। जब सरकारी सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं, तो फिर आम जनता को कथित बिचौलियों की दहलीज पर क्यों जाना पड़े? क्या तकनीक का लाभ नागरिकों को राहत देने के लिए है या सरकारी व्यवस्था की खामियों के बीच उन्हें और अधिक असहाय छोड़ देने के लिए?

WhatsApp पर जुड़ें
राजनीति, समाज, अध्यात्म और प्रेरणा — रोज़ नई दृष्टि
✅ अभी Follow करें

बिहार में सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण के बावजूद जमीन के दाखिल-खारिज, नामांतरण और राजस्व संबंधी कार्यों में आम लोगों की परेशानियां चिंता का विषय हैं। जनता की शिकायत है कि कई बार छोटे-छोटे कामों के लिए भी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यदि कहीं रिश्वत की मांग होती है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी हो जाती है—एक तरफ अपने काम को पूरा कराने की जरूरत और दूसरी तरफ अनुचित भुगतान का दबाव। ऐसी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

पश्चिम चंपारण जिले के भितहा अंचल कार्यालय से संबंधित दाखिल-खारिज अस्वीकृति की एक सूचना इस व्यवस्था की जटिलताओं को समझने का अवसर देती है। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, नामांतरण मुकदमा संख्या 277 R27/2024-2025 को अस्वीकृत किया गया। आदेश में दर्ज कारण के मुताबिक, सुनवाई के दौरान पाया गया कि मूल जमाबंदीदार जीवित हैं और उन्होंने भूमि बिक्री के लिए सहमति देने से इनकार करते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी। इसी आधार पर आवेदन अस्वीकृत किया गया। आदेश में असंतुष्ट आवेदक को भूमि सुधार उप समाहर्ता, बगहा के न्यायालय में अपील करने का विकल्प भी दिया गया है।

इस मामले में राजस्व कर्मचारी की टिप्पणी में प्रस्तावित भूमि क्रेता के कब्जे में होने का उल्लेख है, जबकि अंतिम आदेश में मूल जमाबंदीदार की आपत्ति और सहमति नहीं दिए जाने को अस्वीकृति का आधार बताया गया। यह अंतर बताता है कि भूमि संबंधी मामलों में दस्तावेजों, वास्तविक स्थिति और कानूनी प्रक्रिया की स्पष्टता कितनी महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस दस्तावेज से अपने आप रिश्वतखोरी या किसी बिचौलिए की संलिप्तता साबित नहीं होती। फिर भी यह सवाल जरूर उठता है कि आम नागरिक को ऐसी प्रक्रियाओं की सही जानकारी समय पर और आसानी से क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

ग्रामीण बिहार में रहने वाले गरीब, बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे नागरिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेजों की पूर्ति, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया समझना आसान नहीं होता। जब आवेदन लंबित रहता है या अस्वीकृत हो जाता है, तो कई लोगों को आगे का रास्ता समझ नहीं आता। ऐसी परिस्थितियों में अनधिकृत बिचौलियों के सक्रिय होने की आशंका बढ़ जाती है। यदि कोई व्यक्ति काम जल्दी कराने के नाम पर पैसे मांगता है, तो मजबूरी में नागरिक अनुचित भुगतान करने के लिए विवश हो सकता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल ऑनलाइन पोर्टल बनाने से नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने से होगा।

बिहार सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। प्रत्येक आवेदन की स्थिति, उसके लंबित रहने का कारण, संबंधित अधिकारी और निस्तारण की निर्धारित समय-सीमा ऑनलाइन उपलब्ध होनी चाहिए। अंचल कार्यालयों में सरकारी शुल्क की सूची सार्वजनिक की जाए और प्रत्येक भुगतान की रसीद अनिवार्य हो। रिश्वत मांगने की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए तथा साक्ष्य मिलने पर निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई की जाए। पंचायत और अंचल स्तर पर सहायता केंद्रों के माध्यम से नागरिकों को आवेदन, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया की जानकारी भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

WhatsApp पर जुड़ें
राजनीति, समाज, अध्यात्म और प्रेरणा — रोज़ नई दृष्टि
✅ अभी Follow करें

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी काम कराने के लिए जनता को किसी अनधिकृत बिचौलिए पर निर्भर न रहना पड़े। अधिकारी और कर्मचारी नागरिकों के प्रति जवाबदेह हों तथा हर आवेदन का निस्तारण नियमों के अनुसार हो। यदि किसी मामले में कानूनी विवाद है, तो आवेदक को स्पष्ट कारण और आगे की वैधानिक प्रक्रिया की जानकारी दी जाए। इससे न केवल अनावश्यक परेशानी कम होगी, बल्कि प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

डिजिटल क्रांति की असली सफलता वेबसाइटों, पोर्टलों और ऑनलाइन सुविधाओं की संख्या से नहीं, बल्कि आम नागरिक को मिलने वाली राहत से मापी जानी चाहिए। बिहार सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जनता का वैध काम बिना अनुचित भुगतान, अनावश्यक दौड़भाग और बिचौलियों की मजबूरी के पूरा हो सके।

अब सवाल सीधा है—क्या बिहार में सुशासन का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा? क्या आम नागरिक को अपने अधिकारों के लिए दफ्तरों के चक्कर और कथित बिचौलियों पर निर्भरता से मुक्ति मिलेगी? जनता को आश्वासनों से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां पारदर्शिता नियम हो, जवाबदेही जिम्मेदारी हो और सरकारी सेवा वास्तव में जनसेवा बने।

शीर्षक को अधिक धारदार बनाइएदस्तावेज वाले हिस्से को संक्षिप्त कीजिए

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रका
र

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top