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नेताजी तनिक संभल के, पब्लिक सब देख और समझ रही है!

“नेताजी की साइकिल आगे, पीछे दस गाड़ियों की बारात!”

नेताओं की सवारी और जन परिवहन

देश में इन दिनों एक नया राजनीतिक मौसम चल रहा है। पहले नेता जी के काफिले देखकर जनता को लगता था कि शायद कोई राजा-महाराजा निकल रहे हैं। आगे पायलट गाड़ी, पीछे एस्कॉर्ट, उसके पीछे मीडिया टीम, फिर समर्थकों की एसयूवी, और सबसे आखिर में वह बेचारा आम आदमी, जो ट्रैफिक में फंसा सोचता था — “लगता है देश फिर किसी बहुत बड़े संकट से गुजर रहा है।” लेकिन अब दृश्य थोड़ा बदल गया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi के डीजल-पेट्रोल बचत वाले आह्वान के बाद कई मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक अचानक से “जनसेवक मोड” में आ गए हैं। कोई ऑटो में बैठकर विधानसभा जा रहा है, कोई इलेक्ट्रिक स्कूटर पर हेलमेट संभालते हुए दिखाई दे रहा है, तो कोई साइकिल पर ऐसे पैडल मार रहा है जैसे अगले ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने निकल पड़ा हो।

जनता ने भी शुरुआत में तालियां बजाईं। सोशल मीडिया पर पोस्ट डाले गए — “वाह! कितना सादगीपूर्ण जीवन!” लेकिन फिर वही हुआ जो इस डिजिटल युग में अक्सर हो जाता है। जनता ने वीडियो को ज़ूम करके देख लिया। नेताजी अकेले साइकिल पर नहीं थे। पीछे पांच फॉर्च्यूनर, दो स्कॉर्पियो, एक एंबुलेंस, चार पुलिस की गाड़ियां और तीन कैमरा वाले बाइकर्स पूरी श्रद्धा से चल रहे थे। ऊपर से समर्थक वीडियो बनाकर लिख रहे थे — “देखिए, हमारे नेता जी कितने ज़मीन से जुड़े हैं।” अब जनता सोच रही है कि भाई, अगर इतनी ही गाड़ियां पीछे चलानी थीं तो नेता जी सीधे उन्हीं में बैठ जाते, कम से कम ट्रैफिक तो कम जाम होता!

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आज की जनता 90 के दशक वाली भोली जनता नहीं रही, जिसे सिर्फ भाषण और हाथ हिलाने से प्रभावित किया जा सके। अब हर मोबाइल कैमरा एक छोटा पत्रकार है। नेता जी जैसे ही ऑटो में बैठते हैं, जनता ऑटो के पीछे खड़ी इनोवा की लाइन भी गिन लेती है। जब कोई नेता जी दो किलोमीटर साइकिल चलाकर “पर्यावरण बचाओ” का संदेश देते हैं और उसके बाद एसी कमरे में जाकर पांच घंटे जनरेटर की बिजली उड़ाते हैं, तब जनता के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वह मुस्कान खुशी की नहीं, समझदारी की होती है। जनता समझ रही है कि यहां सादगी कम और शूटिंग ज्यादा चल रही है।

“ऑटो में नेताजी, लेकिन एसी वाली सोच साथ में!”

कुछ नेताओं की हालत तो ऐसी हो गई है कि वे ऑटो में बैठते जरूर हैं, लेकिन चेहरे पर ऐसा भाव रहता है जैसे किसी ने उन्हें देश निकाला दे दिया हो। ऑटो वाला बेचारा डर के मारे धीरे चला रहा है कि कहीं कोई गड्ढा आ गया और नेता जी का “जनसेवा भाव” हिल गया तो अगली बार परमिट ही रद्द न हो जाए। ऊपर से समर्थक पीछे से लाइव वीडियो चला रहे हैं — “देखिए, जनता के नेता जनता के बीच!” लेकिन जनता पूछ रही है — “भाई साहब, यह वीडियो कौन शूट कर रहा है? वह पीछे जो कैमरा लेकर क्रेटा में बैठा है, वह क्या ऑटो यूनियन का सदस्य है?”

नेताओं की सवारी और जन परिवहन..

असल में आज राजनीति में सादगी भी पूरी तैयारी के साथ आती है। पहले मीडिया बुलाया जाता है, फिर कैमरा एंगल तय होता है, उसके बाद तय किया जाता है कि नेताजी को कितना पसीना दिखना चाहिए। कोई नेता पैदल चलते हुए दिखता है, लेकिन उसके आगे-पीछे बीस लोग छाता लेकर दौड़ रहे होते हैं। जनता सोचती है — “इतने लोग अगर दो बसों में बैठ जाएं तो शायद सच में पेट्रोल बच जाए।”

यह व्यंग्य सिर्फ नेताओं पर नहीं है, जनता पर भी थोड़ा लागू होता है। क्योंकि कई बार हम भी दिखावे पर जल्दी भावुक हो जाते हैं। कोई नेता दो मिनट साइकिल चला दे तो हम उसे “धरती पुत्र” घोषित कर देते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि उसके पूरे काफिले ने उतना धुआं छोड़ दिया जितना एक छोटा गांव महीने भर में नहीं छोड़ता। देश को सच में बदलाव चाहिए तो केवल कैमरे के सामने नहीं, व्यवहार में बदलाव लाना होगा।

और यह बदलाव सिर्फ नेताओं से नहीं आएगा। जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हर घर में अगर एक-एक व्यक्ति छोटी दूरी के लिए बाइक या कार की जगह बस, मेट्रो, साइकिल या साझा वाहन का उपयोग शुरू कर दे, तो यह देश सच में करोड़ों लीटर ईंधन बचा सकता है। लेकिन हमारी भी हालत कुछ कम दिलचस्प नहीं है। मोहल्ले की दुकान सौ कदम दूर होगी, फिर भी हम बाइक निकालते हैं, जैसे बिना पेट्रोल जलाए राष्ट्रभक्ति अधूरी रह जाएगी।

“नेताजी का पैदल मार्च और पीछे डीजल की आरती!”

अब तो कुछ नेताओं ने पैदल चलने का नया ट्रेंड शुरू कर दिया है। नेता जी पैदल निकलते हैं, लेकिन पीछे चलने वाले सुरक्षाकर्मियों और समर्थकों की गाड़ियों की लाइन देखकर लगता है कि कोई मिनी बारात जा रही है। जनता मन ही मन कहती है — “नेता जी तो फिटनेस कर रहे हैं, लेकिन पीछे देश का डीजल जल रहा है।”

राजनीति में प्रतीकवाद जरूरी होता है, इसमें कोई बुराई नहीं। अगर कोई मुख्यमंत्री या सांसद सच में सरकारी फिजूलखर्ची कम करने की कोशिश कर रहा है, तो उसकी सराहना होनी चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब सादगी भी एक “कंटेंट प्रोजेक्ट” बन जाती है। नेता जी का हेलमेट नया, जैकेट नई, कैमरा 4K क्वालिटी वाला और कैप्शन तैयार — “देशहित में बड़ा कदम।” जनता अब इन सबको देखकर मुस्कुराती है और कहती है — “ठीक है नेताजी, रील अच्छी थी।”

आज देश को दिखावटी सादगी नहीं, असली अनुशासन चाहिए। अगर नेता सच में उदाहरण बनना चाहते हैं, तो अपने काफिले सीमित करें, अनावश्यक गाड़ियों को हटाएं, छोटी दूरी पर सार्वजनिक परिवहन अपनाएं और सरकारी संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता दिखाएं। जनता तब जरूर सम्मान करेगी। क्योंकि भारतीय जनता भावुक जरूर है, लेकिन मूर्ख नहीं।

और जनता को भी यह समझना होगा कि सार्वजनिक परिवहन सिर्फ गरीबों का साधन नहीं, बल्कि समझदार समाज की पहचान है। विदेशों में बड़े-बड़े मंत्री ट्रेन और मेट्रो से चलते दिखाई देते हैं। वहां कोई इसे शर्म नहीं समझता। हमारे यहां लोग बस में बैठने से ऐसे डरते हैं जैसे टिकट नहीं, इज्जत कट जाएगी। जबकि सच यह है कि जितनी अधिक बसें और मेट्रो भरेंगी, उतनी ही सड़कें खाली होंगी, प्रदूषण कम होगा और पेट्रोल-डीजल पर देश की निर्भरता भी घटेगी।

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“पब्लिक अब सिर्फ वोटर नहीं, फुल एचडी कैमरा है!”

राजनीति का दौर बदल चुका है। अब जनता सिर्फ पांच साल में एक बार वोट डालने वाली भीड़ नहीं है। अब जनता हर समय देख रही है, रिकॉर्ड कर रही है और समझ रही है। नेता जी अगर साइकिल चला रहे हैं तो जनता यह भी देख रही है कि वह साइकिल पांच मिनट बाद किस ट्रक में रखी गई। अगर नेताजी ऑटो में बैठे हैं तो जनता यह भी देख रही है कि पीछे चल रही बीएमडब्ल्यू किसकी है।

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इसलिए नेताओं को भी अब थोड़ा संभलकर चलना होगा। जनता अब भाषण से ज्यादा व्यवहार पर भरोसा करती है। अगर सादगी दिखानी है तो उसे जीना भी पड़ेगा। वरना सोशल मीडिया की जनता मीम बनाकर ऐसा आईना दिखाती है कि पूरा “जनसंपर्क अभियान” हास्य कार्यक्रम बन जाता है।

देशहित की बात केवल मंच से नहीं, सड़क पर भी दिखनी चाहिए। पेट्रोल और डीजल बचाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है। नेता अगर सच में उदाहरण बनें और जनता भी थोड़ी सुविधा छोड़कर सार्वजनिक परिवहन अपनाए, तो यह देश आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों स्तरों पर मजबूत हो सकता है।

Public transport for a greener future

बाकी नेताजी, एक छोटी सी सलाह है — अगली बार साइकिल चलाइए तो पीछे गाड़ियों की संख्या थोड़ी कम रखिए। क्योंकि जनता अब सिर्फ देख नहीं रही… समझ भी रही है!

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