मई और जून की तपती दोपहरें, आसमान से बरसती आग, सड़कों पर सन्नाटा और लोगों का घरों में कैद हो जाना — भारत में “नौतपा” का समय हमेशा से भीषण गर्मी का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह गर्मी केवल परंपरागत “नौतपा” तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा ग्रीष्मकाल ही असहनीय और खतरनाक होता जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर नौतपा क्या है? इन नौ दिनों में तापमान अचानक इतना अधिक क्यों बढ़ जाता है? और क्या आज की बढ़ती गर्मी केवल प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है या इसके पीछे मानव गतिविधियों से पैदा हुआ जलवायु संकट भी जिम्मेदार है?

भारतीय परंपरा में नौतपा को विशेष महत्व दिया गया है। “नव” यानी नौ और “तप” यानी तपिश — अर्थात नौ दिनों तक पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी। पंचांग के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब शुरू होने वाले शुरुआती नौ दिनों को नौतपा कहा जाता है। यह समय आमतौर पर मई के अंतिम सप्ताह से जून की शुरुआत तक रहता है। मान्यता है कि यही वे दिन होते हैं जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे अधिक तीव्र प्रभाव डालती हैं और तापमान अपने चरम पर पहुंच जाता है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में पारा 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इससे भी अधिक तापमान दर्ज किया जाता है।
नौतपा में क्यों बढ़ जाती है गर्मी की तीव्रता?
नौतपा के दौरान बढ़ती गर्मी के पीछे केवल धार्मिक या ज्योतिषीय कारण नहीं, बल्कि मौसम विज्ञान और भौगोलिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस समय सूर्य लगभग सीधी स्थिति में चमकता है, जिससे उसकी किरणें पृथ्वी की सतह पर अधिक ऊर्जा छोड़ती हैं। दिन लंबे होते हैं और रातें छोटी, इसलिए धरती को ठंडा होने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। यही कारण है कि दिन के साथ-साथ रात का तापमान भी बढ़ा हुआ महसूस होता है।
इसके अलावा राजस्थान के थार रेगिस्तान से आने वाली गर्म और सूखी हवाएं, जिन्हें “लू” कहा जाता है, उत्तर भारत के बड़े हिस्से को झुलसा देती हैं। इन हवाओं में नमी बेहद कम होती है, इसलिए शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है और गर्मी ज्यादा खतरनाक लगती है। सूखी मिट्टी और बारिश की कमी भी इस समस्या को बढ़ाती है। जब जमीन में नमी नहीं होती, तब वह सूर्य की गर्मी को तेजी से सोखती और वापस वातावरण में छोड़ती है, जिससे हीटवेव की स्थिति पैदा होती है।
शहरों में यह प्रभाव और भी ज्यादा दिखाई देता है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और लगातार बढ़ता शहरीकरण गर्मी को अवशोषित करके रात तक छोड़ते रहते हैं। इसे “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव कहा जाता है। यही वजह है कि महानगरों में नौतपा के दौरान गर्मी गांवों की तुलना में कहीं अधिक असहनीय महसूस होती है।
क्या सिर्फ नौतपा जिम्मेदार है या बदल रही है पृथ्वी की जलवायु?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गर्मी केवल नौतपा के कारण बढ़ रही है, या इसके पीछे मानव निर्मित कारण भी हैं? वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्तमान समय में बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग है। फैक्ट्रियों, वाहनों और जीवाश्म ईंधनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में एक ऐसी परत बना रही हैं जो सूर्य की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देती। परिणामस्वरूप पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है।
वनों की कटाई और हरियाली की कमी ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है। पेड़-पौधे वातावरण को ठंडा रखने में मदद करते हैं, लेकिन तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। दूसरी ओर एसी, वाहन और उद्योग न केवल प्रदूषण बढ़ा रहे हैं, बल्कि सीधे तौर पर अतिरिक्त गर्मी भी पैदा कर रहे हैं।

कुछ विशेषज्ञ एल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु घटनाओं को भी जिम्मेदार मानते हैं। प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि का असर भारत के मौसम पर पड़ता है, जिससे हीटवेव और अधिक तीव्र हो जाती है। यही कारण है कि अब गर्मी केवल मई-जून तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अप्रैल से ही लोगों को झुलसाने लगती है।
स्वास्थ्य पर असर और भविष्य की चेतावनी
भीषण गर्मी केवल असुविधा का विषय नहीं रही, बल्कि यह अब एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। अत्यधिक तापमान के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, उल्टी, थकान और बेहोशी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और हृदय, ब्लड प्रेशर या डायबिटीज से पीड़ित लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
डॉक्टर सलाह देते हैं कि नौतपा के दौरान शरीर में पानी की कमी न होने दें, अधिक से अधिक तरल पदार्थ लें, तेज धूप में बाहर निकलने से बचें और हल्का भोजन करें। लेकिन केवल व्यक्तिगत सावधानियां ही पर्याप्त नहीं हैं। यदि पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में नौतपा जैसी परिस्थितियां और भी भयावह हो सकती हैं।
आज नौतपा केवल पंचांग में दर्ज नौ दिनों का नाम नहीं रह गया है। यह प्रकृति की उस चेतावनी का प्रतीक बन चुका है, जो हमें बता रही है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं रोकी गई, तो भविष्य की गर्मियां इंसानी जीवन के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं। ऐसे में जरूरत केवल गर्मी से बचने की नहीं, बल्कि पृथ्वी को बचाने की भी है।
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विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
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