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“जीवन-मृत्यु के बीच ठहरा एक जीवन: हरिश राणा और इच्छामृत्यु का आध्यात्मिक सत्य”

भारत के न्यायिक इतिहास में एक ऐसा क्षण आया है, जिसने केवल कानून की सीमाओं को ही नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के शाश्वत रहस्य पर भी गहरी बहस छेड़ दी है। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरिश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति देकर एक ऐसा निर्णय दिया, जो संवेदनाओं, करुणा और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि उस आत्मा की मुक्ति की ओर बढ़ाया गया कदम है, जो पिछले 13 वर्षों से शरीर के बंधन में बंधी हुई थी।

हरिश राणा, जो कभी एक उज्ज्वल भविष्य के सपने देखने वाले युवक थे, 2013 में एक हादसे के बाद कोमा में चले गए। पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े इस बीटेक छात्र की जिंदगी एक पल में बदल गई, जब वे चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर सिर की चोट का शिकार हो गए। इसके बाद से वे पर्मानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में रहे—एक ऐसी अवस्था, जहां शरीर जीवित दिखता है, लेकिन चेतना कहीं गहरे मौन में विलीन हो चुकी होती है।

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भारतीय दर्शन में कहा गया है—“न जायते म्रियते वा कदाचित्…”, अर्थात आत्मा न कभी जन्म लेती है, न ही कभी मरती है। शरीर केवल एक माध्यम है, एक वस्त्र है, जिसे आत्मा समय आने पर त्याग देती है। हरिश राणा का जीवन भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है, जहां शरीर वर्षों से अस्तित्व में है, लेकिन आत्मा मानो अपने अंतिम विश्राम की प्रतीक्षा में है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: संवैधानिक अधिकार और करुणा का संगम

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले में जो निर्णय दिया, वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21—‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’—की व्यापक व्याख्या पर आधारित है। 2018 के ऐतिहासिक ‘कॉमन कॉज’ मामले को आधार बनाते हुए कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। हरिश राणा के मामले में मेडिकल बोर्ड्स ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि उनकी स्थिति अपरिवर्तनीय है और उनके न्यूरोलॉजिकल फंक्शन के बहाल होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में उनके पिता अशोक राणा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। 13 वर्षों से बेटे को इस अवस्था में देखना केवल एक भावनात्मक पीड़ा ही नहीं, बल्कि एक असहनीय मानसिक और आर्थिक संघर्ष भी था।

कोर्ट ने इस मामले में 30 दिनों की ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि को भी माफ कर दिया, क्योंकि परिवार और मेडिकल बोर्ड दोनों सहमत थे कि अब जीवन-रक्षक प्रणालियों को हटाना ही उचित है। अदालत ने AIIMS Delhi को निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया गरिमापूर्ण, संवेदनशील और पीड़ारहित तरीके से की जाए।

यह निर्णय हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या जीवन केवल सांसों का नाम है, या फिर उसमें चेतना और आत्मिक अनुभव भी आवश्यक है? भारतीय अध्यात्म कहता है कि जब शरीर आत्मा के लिए साधन न रह जाए, तब उसका त्याग ही मुक्ति का मार्ग बनता है।

AIIMS की प्रक्रिया और परिवार की अंतिम विदाई: कर्म, क्षमा और मुक्ति का क्षण

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरिश राणा को AIIMS Delhi के पेलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया गया, जहां एक विशेष टीम उनके जीवन के अंतिम चरण को संभाल रही है। इस टीम का नेतृत्व अनुभवी डॉक्टरों द्वारा किया जा रहा है, जो यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि लाइफ-सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे और बिना किसी पीड़ा के हटाया जाए।

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यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक आत्मा की विदाई का संस्कार है। भारतीय परंपरा में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नए प्रारंभ के रूप में देखा जाता है। ‘अंत्येष्टि’ का अर्थ ही है—अंतिम यज्ञ, जिसमें शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाता है और आत्मा अपनी अगली यात्रा के लिए प्रस्थान करती है।

हरिश राणा के परिवार ने भी इस कठिन समय में आध्यात्मिक मार्ग का सहारा लिया। एक भावुक क्षण में उनके पिता ने अपने बेटे से कहा—“सबको क्षमा कर दो और शांति से जाओ।” यह वाक्य केवल एक पिता की पीड़ा नहीं, बल्कि उस गहरे आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है, जहां क्षमा और त्याग ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग बनते हैं।

कर्म सिद्धांत के अनुसार, प्रत्येक आत्मा अपने पूर्व जन्मों और वर्तमान जीवन के कर्मों के अनुसार ही सुख-दुख और जीवन-मृत्यु का अनुभव करती है। हरिश राणा की यह स्थिति भी उसी कर्मचक्र का एक हिस्सा हो सकती है। लेकिन जब पीड़ा असहनीय हो जाए और जीवन केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाए, तब इच्छामृत्यु एक करुणामयी विकल्प के रूप में सामने आती है।

इस फैसले ने एक बार फिर समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जीवन की गुणवत्ता क्या है और मृत्यु की गरिमा क्या होनी चाहिए। यह मामला Aruna Shanbaug case की याद दिलाता है, जिसने भारत में इच्छामृत्यु पर पहली बार व्यापक चर्चा को जन्म दिया था।

इस पूरी घटना के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही उभरता है—क्या मृत्यु हमारे हाथ में है, या यह केवल ईश्वर की इच्छा है? भारतीय दर्शन कहता है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही ईश्वर के अधीन हैं, लेकिन मनुष्य को यह अधिकार है कि वह अपने जीवन को गरिमा और शांति के साथ जीए—और यदि आवश्यक हो, तो उसी गरिमा के साथ विदा भी ले।

हरिश राणा का यह मामला केवल एक कानूनी मिसाल नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक दर्पण है, जिसमें हम जीवन की नश्वरता, कर्म के सिद्धांत और आत्मा की अमरता को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। यह हमें सिखाता है कि अंततः शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अनंत है—और उसकी यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

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