दिल्ली से विनय श्रीवास्तव और पटना से दीपक कुशवाहा
सरकारी दफ्तरों में जनता की जेब क्यों ढीली होती है? अपनी ही जमीन के कागजात दुरुस्त कराने के लिए आम आदमी को सिफारिशों और बिचौलियों का सहारा क्यों लेना पड़ता है? डिजिटल क्रांति और सुशासन के बड़े-बड़े दावों के बीच यदि एक गरीब नागरिक अपने जायज काम के लिए भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है, तो सवाल केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर नहीं, बल्कि उन दावों की जमीनी हकीकत पर भी उठता है। जब सरकारी सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं, तो फिर आम जनता को कथित बिचौलियों की दहलीज पर क्यों जाना पड़े? क्या तकनीक का लाभ नागरिकों को राहत देने के लिए है या सरकारी व्यवस्था की खामियों के बीच उन्हें और अधिक असहाय छोड़ देने के लिए?



बिहार में सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण के बावजूद जमीन के दाखिल-खारिज, नामांतरण और राजस्व संबंधी कार्यों में आम लोगों की परेशानियां चिंता का विषय हैं। जनता की शिकायत है कि कई बार छोटे-छोटे कामों के लिए भी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यदि कहीं रिश्वत की मांग होती है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी हो जाती है—एक तरफ अपने काम को पूरा कराने की जरूरत और दूसरी तरफ अनुचित भुगतान का दबाव। ऐसी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पश्चिम चंपारण जिले के भितहा अंचल कार्यालय से संबंधित दाखिल-खारिज अस्वीकृति की एक सूचना इस व्यवस्था की जटिलताओं को समझने का अवसर देती है। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, नामांतरण मुकदमा संख्या 277 R27/2024-2025 को अस्वीकृत किया गया। आदेश में दर्ज कारण के मुताबिक, सुनवाई के दौरान पाया गया कि मूल जमाबंदीदार जीवित हैं और उन्होंने भूमि बिक्री के लिए सहमति देने से इनकार करते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी। इसी आधार पर आवेदन अस्वीकृत किया गया। आदेश में असंतुष्ट आवेदक को भूमि सुधार उप समाहर्ता, बगहा के न्यायालय में अपील करने का विकल्प भी दिया गया है।
इस मामले में राजस्व कर्मचारी की टिप्पणी में प्रस्तावित भूमि क्रेता के कब्जे में होने का उल्लेख है, जबकि अंतिम आदेश में मूल जमाबंदीदार की आपत्ति और सहमति नहीं दिए जाने को अस्वीकृति का आधार बताया गया। यह अंतर बताता है कि भूमि संबंधी मामलों में दस्तावेजों, वास्तविक स्थिति और कानूनी प्रक्रिया की स्पष्टता कितनी महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस दस्तावेज से अपने आप रिश्वतखोरी या किसी बिचौलिए की संलिप्तता साबित नहीं होती। फिर भी यह सवाल जरूर उठता है कि आम नागरिक को ऐसी प्रक्रियाओं की सही जानकारी समय पर और आसानी से क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
ग्रामीण बिहार में रहने वाले गरीब, बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे नागरिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेजों की पूर्ति, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया समझना आसान नहीं होता। जब आवेदन लंबित रहता है या अस्वीकृत हो जाता है, तो कई लोगों को आगे का रास्ता समझ नहीं आता। ऐसी परिस्थितियों में अनधिकृत बिचौलियों के सक्रिय होने की आशंका बढ़ जाती है। यदि कोई व्यक्ति काम जल्दी कराने के नाम पर पैसे मांगता है, तो मजबूरी में नागरिक अनुचित भुगतान करने के लिए विवश हो सकता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल ऑनलाइन पोर्टल बनाने से नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने से होगा।
बिहार सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। प्रत्येक आवेदन की स्थिति, उसके लंबित रहने का कारण, संबंधित अधिकारी और निस्तारण की निर्धारित समय-सीमा ऑनलाइन उपलब्ध होनी चाहिए। अंचल कार्यालयों में सरकारी शुल्क की सूची सार्वजनिक की जाए और प्रत्येक भुगतान की रसीद अनिवार्य हो। रिश्वत मांगने की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए तथा साक्ष्य मिलने पर निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई की जाए। पंचायत और अंचल स्तर पर सहायता केंद्रों के माध्यम से नागरिकों को आवेदन, सुनवाई और अपील की प्रक्रिया की जानकारी भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी काम कराने के लिए जनता को किसी अनधिकृत बिचौलिए पर निर्भर न रहना पड़े। अधिकारी और कर्मचारी नागरिकों के प्रति जवाबदेह हों तथा हर आवेदन का निस्तारण नियमों के अनुसार हो। यदि किसी मामले में कानूनी विवाद है, तो आवेदक को स्पष्ट कारण और आगे की वैधानिक प्रक्रिया की जानकारी दी जाए। इससे न केवल अनावश्यक परेशानी कम होगी, बल्कि प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
डिजिटल क्रांति की असली सफलता वेबसाइटों, पोर्टलों और ऑनलाइन सुविधाओं की संख्या से नहीं, बल्कि आम नागरिक को मिलने वाली राहत से मापी जानी चाहिए। बिहार सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जनता का वैध काम बिना अनुचित भुगतान, अनावश्यक दौड़भाग और बिचौलियों की मजबूरी के पूरा हो सके।
अब सवाल सीधा है—क्या बिहार में सुशासन का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा? क्या आम नागरिक को अपने अधिकारों के लिए दफ्तरों के चक्कर और कथित बिचौलियों पर निर्भरता से मुक्ति मिलेगी? जनता को आश्वासनों से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां पारदर्शिता नियम हो, जवाबदेही जिम्मेदारी हो और सरकारी सेवा वास्तव में जनसेवा बने।
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विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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