
त्योहारों का मौसम है। बाजारों में रौनक होनी चाहिए, दुकानदारों के चेहरों पर उम्मीद दिखनी चाहिए, घरों में खुशियां पहुंचनी चाहिए और मेहनतकश परिवारों को अपनी सालभर की मेहनत का फल मिलना चाहिए। लेकिन जब राजनीति की महत्वाकांक्षा जनता की जरूरतों पर भारी पड़ने लगे, विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर जाम लगने लगे, दुकानों को बंद करने की नौबत आए और छोटे व्यापारियों की कमाई पर संकट खड़ा हो जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह कैसी जनहित की राजनीति है? जनता के हितैषी होने का दावा करने वाले नेता क्या जनता की परेशानियों से इतने बेखबर हो गए हैं कि उन्हें गरीब की थाली और दुकानदार की रोजी-रोटी दिखाई ही नहीं देती?
दिल्ली सहित अन्य स्थानों पर राजनीतिक आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के बीच आम नागरिकों, व्यापारियों और मेहनतकश परिवारों की परेशानियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग जैसे राजनीतिक मुद्दों पर विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या अपनी मांग मनवाने के लिए आम जनता के जीवन को अस्त-व्यस्त करना जरूरी है? क्या राजनीतिक विरोध का अर्थ सड़कों पर जाम, बाजारों में अव्यवस्था और रोज कमाकर खाने वालों की कमाई पर चोट करना है? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जनता को बेवजह परेशान करने का अधिकार किसी को नहीं है।
1. राजनीतिक स्वार्थ की कीमत गरीब क्यों चुकाए?
एक बार उस रेहड़ी वाले के बारे में सोचिए, जो सुबह अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने की उम्मीद लेकर घर से निकलता है। वह सब्जी बेचता है, चाय बनाता है, खिलौने बेचता है या सड़क किनारे छोटी-सी दुकान लगाता है। उसकी कमाई किसी बड़ी कंपनी के मुनाफे जैसी नहीं होती। दिनभर मेहनत करने के बाद जो कुछ बचता है, उसी से उसके बच्चों की फीस, घर का किराया, राशन और दवाइयों का इंतजाम होता है। यदि राजनीतिक आंदोलन के कारण सड़क बंद हो जाए, ग्राहक बाजार तक न पहुंच सकें या उसे दुकान बंद करने के लिए मजबूर होना पड़े, तो उसके परिवार के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
क्या आंदोलन करने वाले नेता उसके घर राशन पहुंचाएंगे? क्या वे उसके बच्चों की फीस भरेंगे? क्या उसकी उधारी चुकाएंगे? या फिर प्रदर्शन समाप्त होने के बाद राजनीतिक नेता अपनी गाड़ियों में बैठकर चले जाएंगे और गरीब परिवार अपनी परेशानियों के साथ अकेला रह जाएगा?
बड़े व्यापारियों के पास भी नुकसान सहने की असीमित क्षमता नहीं होती। त्योहारों के लिए महीनों पहले माल खरीदा जाता है, कर्मचारियों की व्यवस्था होती है, दुकानों का किराया दिया जाता है और बैंक या बाजार से पूंजी जुटाई जाती है। कपड़े, मिठाई, आभूषण, सजावटी सामान, मिट्टी के दीपक, पूजा सामग्री और अन्य वस्तुओं के कारोबार में त्योहारों का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान कारोबार बाधित होने से केवल दुकानदार नहीं, बल्कि कारीगर, छोटे उत्पादक, माल ढोने वाले वाहन चालक, गोदाम कर्मचारी और हजारों दूसरे परिवार भी प्रभावित होते हैं।
राजनीतिक दलों को समझना होगा कि बाजार बंद होना केवल शटर गिरने की घटना नहीं है। इसके पीछे किसी की दिनभर की मजदूरी, किसी की उधारी, किसी की जमा पूंजी और किसी परिवार की रोटी जुड़ी होती है। करोड़ों रुपये के नुकसान के दावों की पुष्टि प्रमाणित आंकड़ों से होनी चाहिए, लेकिन व्यापारिक गतिविधियां बाधित होने से होने वाला आर्थिक नुकसान और आम नागरिकों की परेशानी किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
त्योहारों के समय जनता को राहत चाहिए, राजनीतिक उत्पात नहीं। गरीब को रोजगार चाहिए, मजबूरी नहीं। व्यापारी को कारोबार करने का अवसर चाहिए, सड़क पर होने वाले शक्ति प्रदर्शन की सजा नहीं।
2. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग या विपक्ष की राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष की आपत्तियां हैं, तो उन्हें तथ्यों और प्रमाणों के साथ संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी मंचों पर उठाया जाना चाहिए। किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि किसी पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग को लेकर बार-बार सड़क पर उतरना, यातायात बाधित करना और आम जनता को परेशानी में डालना आखिर किस जनहित की सेवा है?
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और अन्य विपक्षी दलों को जनता के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके आंदोलनों का व्यावहारिक परिणाम क्या है। क्या इन प्रदर्शनों से किसी गरीब को रोजगार मिला? क्या किसी छोटे दुकानदार का नुकसान कम हुआ? क्या किसी आम नागरिक की समस्या का समाधान हुआ? यदि नहीं, तो क्या राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन सवाल पूछने की राजनीति और जनता को संकट में डालने की राजनीति में बड़ा अंतर है। सरकार की आलोचना करना एक बात है और अपने विरोध की कीमत आम नागरिकों से वसूलना दूसरी बात। जनता ने राजनीतिक दलों को अपनी आवाज उठाने के लिए चुना है, अपनी रोजी-रोटी बाधित करने का अधिकार देने के लिए नहीं।
यहां सत्तापक्ष भी आलोचना से परे नहीं है। लोकतंत्र में किसी भी दल की जवाबदेही उसके आचरण से तय होती है। यदि सत्तापक्ष गलत है, तो उसका विरोध होना चाहिए; यदि विपक्ष गलत तरीके अपनाता है, तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। राजनीतिक झंडे के रंग के आधार पर सही और गलत का फैसला नहीं हो सकता।
लोकतंत्र किसी एक पार्टी की जागीर नहीं है। संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन उनके प्रति असहमति को तथ्य, तर्क और वैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर व्यक्त करना ही परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई में जनता को मोहरा बनाना किसी भी दल को शोभा नहीं देता।
3. देश को अस्थिर करने की कोशिश करने वालों पर कठोर कार्रवाई हो, लेकिन प्रमाणों के आधार पर
देश की एकता, अखंडता और सामाजिक शांति के साथ खिलवाड़ करने की किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति, संगठन या नेटवर्क विदेशी धन के अवैध इस्तेमाल, संगठित दुष्प्रचार, हिंसा भड़काने अथवा देश में अशांति फैलाने जैसी गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोप प्रमाणित होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
बांग्लादेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का हवाला देकर भारत में भी वैसी ही परिस्थितियां पैदा करने की बात करने वालों के बयानों और गतिविधियों की जांच की जा सकती है, यदि इसके लिए विश्वसनीय आधार उपलब्ध हों। लेकिन भारत की परिस्थितियों की तुलना किसी दूसरे देश से करके भय फैलाना या हर असहमति को देशविरोधी गतिविधि घोषित कर देना भी उचित नहीं है।
आज सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक सूचनाएं तेजी से पहुंचती हैं। ऐसे में भ्रामक खबरें, अधूरे तथ्य और भड़काऊ संदेश युवाओं को वास्तविक मुद्दों से भटका सकते हैं। युवाओं की ऊर्जा शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता, नवाचार और राष्ट्र निर्माण में लगनी चाहिए। उन्हें राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाने या बिना तथ्यों की पड़ताल किए किसी उकसावे में धकेलने की प्रवृत्ति का विरोध होना चाहिए।
जो लोग देश को बांटने, समाज में हिंसा भड़काने या लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं, उन्हें कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने, शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लेने या असहमति व्यक्त करने के कारण किसी को विदेशी एजेंट अथवा देशद्रोही कहना भी गलत है। कठोर कार्रवाई की मांग का आधार गुस्सा नहीं, प्रमाण होना चाहिए।
देश की सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। मजबूत भारत वही है जहां राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित हो, कानून का निष्पक्ष पालन हो और निर्दोष नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें। कानून हाथ में लेने वालों, जबरन दुकानें बंद कराने वालों, हिंसा करने वालों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों और लोगों को धमकाने वालों के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के कार्रवाई होनी चाहिए। किसी दल का झंडा कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
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4. आंदोलन की आजादी है, जनता की आजीविका छीनने की नहीं!
राजनीतिक दलों को अब यह तय करना होगा कि वे जनता की सेवा करना चाहते हैं या जनता की परेशानियों को अपने राजनीतिक लाभ का साधन बनाना चाहते हैं। यदि कोई दल खुद को गरीबों, युवाओं, मजदूरों और व्यापारियों का हितैषी बताता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल भाषण देने तक सीमित नहीं हो सकती। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके आंदोलन के कारण किसी गरीब का चूल्हा न बुझे और किसी छोटे व्यापारी की सालभर की मेहनत पर पानी न फिरे।
शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा, धमकी, जबरन दुकानें बंद कराना, सार्वजनिक मार्गों को अनुचित रूप से बाधित करना या आम नागरिकों को परेशान करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। आयोजकों और प्रशासन को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रदर्शन के दौरान यातायात, आपातकालीन सेवाओं और व्यापारिक गतिविधियों पर अनावश्यक असर न पड़े। कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्हें व्यापारियों की सुरक्षा, बाजारों में सामान्य गतिविधियों और नागरिकों की आवाजाही सुनिश्चित करनी चाहिए। राजनीतिक दबाव चाहे किसी भी दिशा से आए, कानून का पालन सबके लिए समान होना चाहिए।
देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो विवादों का समाधान निकाले, न कि विवादों को लंबा खींचकर जनता को परेशान करे। जनता को ऐसे नेता चाहिए जो उसके रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक विकास की चिंता करें। त्योहारों के अवसर पर बाजारों में रौनक होनी चाहिए, न कि डर और अनिश्चितता का माहौल।
आखिर कब तक आम नागरिक राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा की लड़ाई की कीमत चुकाता रहेगा? कब तक छोटे दुकानदारों की कमाई को आंदोलनों के नाम पर होने वाले व्यवधानों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? कब तक गरीब की रोटी और व्यापारी की पूंजी को राजनीतिक रणनीति का मामूली नुकसान समझा जाएगा?
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देश का आम नागरिक किसी राजनीतिक दल का मोहरा नहीं है। वह इस लोकतंत्र की असली ताकत है। उसकी मेहनत से बाजार चलते हैं, परिवार पलते हैं, रोजगार पैदा होता है और देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। उसकी आजीविका पर चोट करने वाली राजनीति को जनहित का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता।
त्योहार खुशियों के लिए हैं, राजनीतिक अहंकार के प्रदर्शन के लिए नहीं। आंदोलन अधिकार है, लेकिन अराजकता अधिकार नहीं। विरोध लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जनता को बंधक बनाना उसकी कमजोरी है।
जनता के हितैषी होने का दावा करने वाले सभी राजनीतिक दलों को याद रखना चाहिए कि जनता केवल उनके भाषण नहीं सुनती, उनके आचरण का हिसाब भी रखती है। समय आ गया है कि राजनीतिक दल अपनी प्राथमिकताएं तय करें। देश को जिम्मेदार विपक्ष, जवाबदेह सरकार, मजबूत संवैधानिक संस्थाएं और कानून का सम्मान करने वाले नागरिक चाहिए।
राजनीति जनता की सेवा का माध्यम बने, जनता की परेशानी का कारण नहीं। गरीब की थाली, छोटे व्यापारी की दुकान और आम आदमी की शांति किसी भी राजनीतिक स्वार्थ से बड़ी है। इन पर चोट करने वालों से सवाल पूछना जरूरी है—आखिर जनता कब तक आपकी सियासत का नुकसान सहती रहेगी?
✍️विनय श्रीवास्तव (लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार)


विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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