लंदन में रहते हुए छोटी छोटी बातें कभी कभी भारत और ब्रिटेन के लोकतांत्रिक संस्कारों के बीच बड़ा अंतर दिखा देती हैं। आज ऐसी ही एक बात ध्यान में आई (london-diary-church-polling-station-british-democracy)। यहाँ मतदान केंद्र किसी चर्च में भी बनाया जा सकता है।

कल्पना कीजिए, भारत में किसी मंदिर को मतदान केंद्र बना दिया जाए। मतदान शुरू होने से पहले ही सवाल उठने लगेंगे कि धार्मिक स्थल को चुनाव से क्यों जोड़ा गया, क्या इससे किसी दल या उम्मीदवार को लाभ होगा, धार्मिक भावनाएँ आहत होंगी या नहीं। बात मतदान से निकलकर राजनीति और टीवी बहस तक पहुँच सकती है।
लंदन में इसे अधिक व्यावहारिक ढंग से देखा जाता है। मतदान केंद्र के लिए जरूरी है कि मतदाता आसानी से पहुँच सकें और गोपनीय मतदान की व्यवस्था हो। इसलिए चर्च, स्कूल और सामुदायिक भवन जैसी जगहें भी मतदान केंद्र बन सकती हैं। भवन की धार्मिक पहचान से अधिक महत्व उसके सार्वजनिक उपयोग और सुविधा का है।
मतदान की प्रक्रिया भी सीधी है। मतदाता अपने निर्धारित मतदान केंद्र पर जाता है, स्वीकृत फोटो आईडी दिखाता है, मतपत्र लेता है, गोपनीय कक्ष में अपनी पसंद दर्ज करता है और मतपेटी में डाल देता है। इंग्लैंड में सामान्यतः मतदान केंद्र सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक खुले रहते हैं।
लेकिन लंदन की चुनाव व्यवस्था का शायद इससे भी अधिक दिलचस्प पहलू है, वोट कौन दे सकता है?
ब्रिटेन में पात्र कॉमनवेल्थ नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ है कि भारत का कोई नागरिक यदि ब्रिटेन में रह रहा है, आवश्यक पात्रता पूरी करता है और मतदाता के रूप में पंजीकृत है, तो वह ब्रिटिश चुनावों से केवल इसलिए बाहर नहीं हो जाता कि उसके पास ब्रिटिश नागरिकता नहीं है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक ब्रिटिश संसद के चुनाव के साथ स्थानीय चुनावों तथा ग्रेटर लंदन अथॉरिटी के चुनावों में भी मतदान कर सकते हैं।
और बात केवल वोट देने तक सीमित नहीं है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक ब्रिटिश नागरिकता के बिना चुनाव भी लड़ सकता है। ब्रिटिश संसद के चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए 18 वर्ष की आयु पूरी होना और ब्रिटिश, आयरिश अथवा पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक होना जरूरी है। पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक वह है जिसे ब्रिटेन में रहने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है या जिसके पास इंडेफिनिट लीव टू रिमेन है। अर्थात लंदन में रहने वाला कोई पात्र भारतीय नागरिक, ब्रिटिश नागरिक बने बिना भी निर्धारित शर्तें पूरी करके सांसद का चुनाव लड़ सकता है।
यानी यहाँ लोकतंत्र में भागीदारी का दायरा दिलचस्प रूप से व्यापक है। स्थानीय काउंसिल के चुनाव में वोट देने से लेकर ब्रिटिश संसद के लिए उम्मीदवार बनने तक, पात्रता पूरी करने वाला कॉमनवेल्थ नागरिक इसमें भाग ले सकता है।
हाँ, एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री को सीधे वोट नहीं दिया जाता। मतदाता अपने संसदीय क्षेत्र के सांसद को चुनता है। जिस राजनीतिक दल को हाउस ऑफ कॉमन्स में बहुमत मिलता है, उसके नेता को राजा सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं और वही प्रधानमंत्री बनता है।
ब्रिटिश राजनीति का एक और दिलचस्प पक्ष उसकी जवाबदेही है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रधानमंत्रियों को राजनीतिक दबाव, अपनी पार्टी के भीतर विरोध या किसी विवाद के कारण पद छोड़ना पड़ा और कई बार उसी दल का दूसरा नेता प्रधानमंत्री बना। यहाँ संसदीय दल और मीडिया की निगरानी सरकार के लिए लगातार चुनौती बनी रहती है।
लंदन में एक ही मतदाता लोकतंत्र के कई स्तरों में भाग ले सकता है। स्थानीय काउंसिल उसके मोहल्ले और स्थानीय सेवाओं से जुड़े फैसले करती है। ग्रेटर लंदन अथॉरिटी के चुनाव में मेयर ऑफ लंदन और लंदन असेंबली के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए सांसद चुना जाता है।
यानी लोकतंत्र यहाँ केवल संसद तक सीमित नहीं है। वह आपके घर के सामने की सड़क, स्थानीय सेवाओं और शहर की नीतियों तक विस्तारित है, भारत की ही तरह।
मुझे चर्च में बने मतदान केंद्र की बात इसलिए दिलचस्प लगी कि वह लोकतंत्र की एक मानसिकता भी दिखाती है। भारत में धर्म और सार्वजनिक जीवन का संबंध अधिक भावनात्मक और संवेदनशील है। ब्रिटेन में भी धर्म महत्वपूर्ण है, लेकिन चुनाव के दिन चर्च एक धार्मिक स्थल होने के साथ जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक सुविधा का स्थान भी बन सकता है।
शायद लोकतंत्र की सुंदरता इसी सहजता में है।
एक चर्च के शांत कमरे में कोई व्यक्ति आता है, अपनी पहचान बताता है, मतपत्र लेता है, अपनी पसंद पर निशान लगाता है और कुछ ही मिनटों में बाहर निकल जाता है।
लंदन की सड़कों पर आज मुझे लोकतंत्र संसद भवन से ज्यादा वोटिंग सेंटर के इसी साधारण से दृश्य में मिला।
लंदन से श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव (प्रसिद्ध लेखक, कवि, साहित्यकार और व्यंगकार)



विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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