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शीबा लतीफ़ : मीडिया की बुलंदियों से लेकर मोहब्बत, शायरी और इंसानियत तक… पढ़िए दिल को छू लेने वाला एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

शीबा लतीफ़-तहज़ीब की ख़ुशबू, रिश्तों की गर्माहट और इंसानियत की मिसाल

“बड़प्पन वह नहीं, जो दूसरों को छोटा महसूस कराए; बड़प्पन वह है, जिसके पास बैठकर कोई भी खुद को छोटा महसूस न करे।”-शीबा लतीफ़

कुछ लोग अपनी कामयाबी से नहीं, बल्कि अपनी सादगी, तहज़ीब, इंसानियत और व्यवहार से लोगों के दिलों में जगह बनाते हैं। शीबा लतीफ़ ऐसी ही एक बहुआयामी शख्सियत हैं, जिन्होंने मीडिया, साहित्य और कला की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है।

भारत के प्रमुख मीडिया संस्थानों (आज तक, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, ETV, NETWORK18 , BIG FM आदि) में दो दशकों से अधिक के नेतृत्व अनुभव के साथ, शीबा लतीफ़ भारतीय मीडिया, साहित्य और सिनेमा जगत की एक सशक्त एवं बहुआयामी हस्ती हैं। वे ट्रायो – सेट ऑफ थ्री आर्ट्स (Trio – Set of Three Arts) की प्रबंध निदेशक (Managing Director) हैं। एक प्रतिष्ठित लेखिका, शायरा और मीडिया प्रोफेशनल के रूप में उनकी चर्चित कृतियों में “प्यार बेशुमार” और दुनिया भर में सराही गई ग़ज़ल “आए अभी तो” शामिल हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता, उर्दू साहित्य और कश्मीरी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की हैं।

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यह बेहद आत्मीय और एक्सक्लूसिव बातचीत लेखक, ब्लॉगर और स्वतंत्र पत्रकार विनय श्रीवास्तव ने की है। विनय श्रीवास्तव चर्चित पुस्तक “मन-मोदी के लेखक हैं, जिसे जनवरी 2026 में आयोजित विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में भी स्थान मिला। अपनी सहज लेखन शैली और संवेदनशील सवालों के माध्यम से उन्होंने शीबा लतीफ़ के व्यक्तित्व के कई ऐसे पहलुओं को सामने लाया है, जिनसे उनके चाहने वाले अब तक अनजान थे।

इस बातचीत में शीबा लतीफ़ ने अपने बचपन, संघर्ष, रिश्तों, कला, इंसानियत, नेतृत्व, अधूरे सपनों और आने वाले प्रोजेक्ट्स पर दिल खोलकर बात की। कई ऐसे पल भी आए, जब उनकी आँखें नम हो गईं और उनकी बातें सीधे दिल को छू गईं।

सच कहें तो, शीबा लतीफ़ के साथ हुई इस बातचीत पर आसानी से एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। समय और स्थान की सीमाओं को देखते हुए इसे संक्षिप्त किया गया है। फिर भी यह इंटरव्यू किसी सामान्य प्रश्नोत्तर से कहीं अधिक विस्तृत, भावनात्मक और प्रेरणादायक है। हमें विश्वास है कि यह संवाद आपको न सिर्फ़ शीबा लतीफ़ के व्यक्तित्व के करीब ले जाएगा, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नज़रिया भी देगा।

तो इंतज़ार की घड़ियाँ अब समाप्त होती हैं… आइए, शुरू करते हैं शीबा लतीफ़ जी के साथ यह बेहद ख़ास, आत्मीय और यादगार संवाद।

1. आपकी शख्सियत में एक अजीब-सी नरमी, अपनापन और सुकून महसूस होता है। यह तहज़ीब, यह मोहब्बत और लोगों को साथ लेकर चलने की खूबसूरती आपको विरासत में किससे मिली? बचपन की कौन-सी यादें आज भी आपकी रूह को मुस्कुरा देती हैं?

उत्तर:
देखिए विनय जी, अगर मेरी शख्सियत में आपको तहज़ीब, नरमी, अपनापन और लोगों को साथ लेकर चलने का सलीका नज़र आता है, तो यह मेरी सबसे बड़ी विरासत है। यह मुझे मेरे बुज़ुर्गों—मेरे नानू, मेरी मम्मा और मेरे पापा से मिली है। मेरे नानू अदब और साहित्य से जुड़े एक सम्मानित शख्स थे, मेरी मम्मा शिक्षिका और प्रिंसिपल रहीं, जबकि मेरे पापा आर्मी ऑफिसर थे। घर का माहौल हमेशा किताबों, शायरी, इल्म और सार्थक बातचीत से महकता रहता था। शायद वहीं से इंसानियत, संवेदनशीलता और लोगों का सम्मान करना मेरी फ़ितरत का हिस्सा बन गया।

बचपन की सबसे ख़ूबसूरत याद आज भी वही है, जब पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाता था। अगर घर का कोई सदस्य आने में देर करता, तो हम सब उसके आने का इंतज़ार करते थे। उन पलों में सिर्फ़ खाना नहीं होता था, बल्कि रिश्तों की गर्माहट, क्रिकेट, अदब, साहित्य और समसामयिक विषयों पर घंटों होने वाली गुफ़्तगू होती थी। वहीं से मैंने सुनना, समझना और हर रिश्ते को दिल से निभाना सीखा।

मेरे पापा ने मुझे अनुशासन के साथ निडर होकर जीना सिखाया। उन्होंने हमेशा कहा कि ख़ासकर एक लड़की को कभी अपने सपनों या हालात से डरना नहीं चाहिए। वहीं मेरी मम्मा ने मुझे इंसानियत, संवेदनशीलता और संस्कारों की वह दौलत दी, जिसने मेरे व्यक्तित्व की मज़बूत नींव रखी।

आज भी जब किसी की मदद कर पाती हूँ या किसी के चेहरे पर मुस्कान ला पाती हूँ, तो लगता है जैसे अपने बचपन की उसी सीख को जी रही हूँ। मेरा मानना है कि जब तक इंसान अपने भीतर के अहंकार को विदा नहीं करता, तब तक वह किसी के साथ सच्चे मायनों में हम बनकर नहीं चल सकता।

मेरी हर बात के साथ एक ख़याल या एक पंक्ति (Quote) जुड़ जाती है विनय जी। यहाँ भी बस इतना ही कहना चाहूँगी—

“जड़ें जितनी गहरी होती हैं, वजूद उतना ही मज़बूत होता है। विरासत सिर्फ़ धन-दौलत की नहीं, बल्कि संस्कारों की होती है।”

शायद यही वजह है कि मैंने हमेशा इंसानी रिश्तों को हर उपलब्धि से ऊपर रखा है, क्योंकि आख़िर में इंसान को उसकी कामयाबी नहीं, बल्कि उसका व्यवहार और उसके संस्कार ही यादगार बनाते हैं।

2. आपने मीडिया, अदब और कला की दुनिया में सिर्फ नाम नहीं कमाया, बल्कि रिश्ते और दुआएँ भी कमाई हैं। इतने बड़े-बड़े फ़नकारों के साथ काम करते हुए कौन-सी बातें आपने अपने दिल में हमेशा के लिए संभाल कर रख लीं?

उत्तर:
लता जी, ख़य्याम साहब, आशा भोंसले जी, तलत अज़ीज़, अभिजीत भट्टाचार्य, विजय अकेला, इला अरुण, अनूप जलोटा, जसविंदर नरूला और शान जैसे अनेक दिग्गज फ़नकारों के साथ काम करना मेरे लिए हमेशा सौभाग्य की बात रही है। इनके अलावा भी मुझे फ़िल्म, संगीत और टेलीविज़न जगत के अनेक वरिष्ठ कलाकारों से मिलने और उनके साथ काम करने का अवसर मिला। सच कहूँ तो इंडस्ट्री में शायद ही कोई ऐसा कलाकार रहा हो, जिसका इंटरव्यू लेने का अवसर मुझे न मिला हो। मेरा शो ‘दिल ने फिर याद किया’ और ‘लव गुरु’ भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ और उसे सम्मानित भी किया गया।

जब भी मैं किसी कलाकार का इंटरव्यू करती थी, तो मुझे उनसे सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और दिल से निकली दुआएँ भी मिलती थीं। यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमाई है। उनके साथ काम करते हुए मैंने महसूस किया कि सच्चा कलाकार कभी सीखना नहीं छोड़ता। चाहे वह कितनी भी बुलंदियों पर पहुँच जाए, उसके भीतर का विद्यार्थी हमेशा ज़िंदा रहता है। उनकी कला के प्रति समर्पण, अनुशासन और सीखने की ललक ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।

रिकॉर्डिंग और इंटरव्यू के दौरान उनकी सादगी, विनम्रता और ज़मीन से जुड़ा हुआ व्यवहार मुझे हमेशा प्रेरित करता था। उन्होंने मुझे सिखाया कि असली कामयाबी शोहरत से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और अपने संस्कारों से पहचानी जाती है। मेरी सबसे बड़ी सीख हमेशा यही रही है—एक कलाकार को जीवनभर विद्यार्थी बने रहना चाहिए।

अगर एक बात बतानी हो, जिसे मैंने हमेशा अपने दिल में सँभालकर रखा है, तो वह है इन सभी महान कलाकारों की विनम्रता। इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचने के बाद भी उनके व्यवहार में कहीं अहंकार नहीं था। शूटिंग या किसी कार्यक्रम के बाद भी उनका अपनापन वैसा ही रहता था, जैसे परिवार के किसी अपने से मुलाक़ात हो। यही सम्मान और स्नेह मेरे लिए किसी भी पुरस्कार से कहीं अधिक मूल्यवान है।

विनय जी, मेरी आदत है कि हर बात के साथ कोई न कोई पंक्ति (Quote) ज़रूर याद आ जाती है। बचपन से किताबों के बीच पली-बढ़ी हूँ, आज भी मेरे घर में एक बड़ी लाइब्रेरी है और किताबों के बीच बैठना मुझे सुकून देता है। उसी सफ़र ने मुझे एक बात सिखाई है—

“बड़प्पन वह नहीं, जो दूसरों को छोटा महसूस कराए; बड़प्पन वह है, जिसके पास बैठकर कोई भी ख़ुद को छोटा महसूस न करे।”

शायद यही सोच मुझे हर रिश्ते में इंसानियत, सम्मान और अपनापन बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

3. ETV Network, Network18, Aaj Tak और The Times of India जैसे बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए आपने शोहरत, दबाव, प्रतिस्पर्धा और सफलतासबको बहुत करीब से देखा। इस लंबे सफर में कौनसा अनुभव आपको अंदर से सबसे ज्यादा मजबूत और इंसानियत के सबसे करीब बना गया?

उत्तर:
देखिए विनय जी, The Times of India, Big FM, Aaj Tak, ETV Network और Network18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों के साथ काम करना मेरे लिए सिर्फ़ एक करियर नहीं, बल्कि सीख, संघर्ष और आत्मविश्वास की एक लंबी यात्रा रही है। इन संस्थानों में काम करते हुए मैंने जाना कि एक प्रोड्यूसर या एडिटर सिर्फ़ अपनी कुर्सी तक सीमित नहीं होता। कई बार आपको राइटर, एंकर, डायरेक्टर, टीम लीडर और संकटमोचक—सब कुछ एक साथ बनना पड़ता है।

मेरे ख़ुद का लिखा एक शेर है—

“मुस्कुराकर ख़ुद से वफ़ा कीजिए,
न चेहरे पर सिलवट रखा कीजिए।”

शायद यही सोच हर मुश्किल में मेरा सहारा बनी।

मुझे आज भी श्रीनगर का वह शूट याद है, जब झेलम नदी में अचानक आई बाढ़ के कारण हमारी पूरी टीम मुश्किल में फँस गई। मेकअप आर्टिस्ट सेट तक नहीं पहुँच पाए। उस समय मैंने यह नहीं सोचा कि यह मेरा काम नहीं है। मैंने ख़ुद मेकअप किया, डायरेक्शन संभाला, कॉस्ट्यूम देखे, लाइट्स और कैमरे तक की ज़िम्मेदारी निभाई। इसी तरह रामपुर में एक शूट के दौरान हमारी मेकअप और कॉस्ट्यूम टीम को पारिवारिक शोक के कारण अचानक जाना पड़ा। हमारे पास सिर्फ़ एक सप्ताह था, लेकिन पूरी टीम ने मिलकर सात दिन का काम चार दिन में पूरा कर दिया। उन अनुभवों ने मुझे सिखाया कि अगर इरादा मज़बूत हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।

लेकिन इन सबसे बड़ी सीख मुझे इंसानियत ने दी। मैंने कभी अपनी टीम में पद का फ़र्क नहीं देखा। काम पूरा होने के बाद मैंने अपने स्पॉटबॉय से लेकर पूरी यूनिट तक, सभी को अपने हाथों से खाना परोसा है और चाय भी पिलाई है। मेरे लिए सुपरस्टार और स्पॉटबॉय—दोनों बराबर हैं, क्योंकि किसी भी कामयाबी के पीछे पूरी टीम की मेहनत होती है।

आज भी हर नया प्रोजेक्ट शुरू करते समय मैं अपने आप से यही कहती हूँ—यह मेरा पहला प्रोजेक्ट है। मैं फिर से शून्य से शुरुआत कर रही हूँ। शायद यही सोच मुझे सीखते रहने, विनम्र बने रहने और इंसानियत के सबसे क़रीब रखती है।

और अंत में, मैं हमेशा यही मानती हूँ—

“भीड़ में अपनी पहचान बना लेना सफलता है, लेकिन उस पहचान के बाद भी इंसान बने रहना, वही असली कामयाबी है।”

4. आज की दुनिया में लोग अक्सर आगे बढ़ने की जल्दी में दूसरों को पीछे छोड़ देते हैं, लेकिन आपके बारे में कहा जाता है कि आप नए हुनर को हाथ पकड़कर आगे लाने में यक़ीन रखती हैं। किसी नए कलाकार या टीम मेंबर की ऐसी कौनसी कामयाबी है, जिसे देखकर आपको लगा हो किहाँ, मेरी मेहनत किसी की ज़िंदगी बदल सकी”?

उत्तर:
देखिए, मेरा हमेशा से मानना रहा है कि जब आप एक टीम के साथ काम करते हैं, तो हर व्यक्ति का नज़रिया मायने रखता है। इसलिए मैं अपने क्रू में स्पॉटबॉय से लेकर सीनियर टीम मेंबर तक, सबसे राय लेती हूँ। हो सकता है कोई तकनीकी रूप से विशेषज्ञ न हो, लेकिन कई बार एक सादा-सा सुझाव भी बड़ा बदलाव ले आता है। यही वजह है कि मैंने हमेशा नए लोगों को मौका देने और उन पर भरोसा करने की कोशिश की है।

काम के मामले में मैं बेहद अनुशासित और प्रतिबद्ध हूँ। मेरी टीम अक्सर मुस्कुराते हुए कहती है, “मैडम बहुत काम करवाती हैं।” और मैं भी उनसे कहती हूँ कि जब तक हम अपना सौ प्रतिशत नहीं देंगे, तब तक बेहतरीन नतीजे नहीं मिलेंगे। काम के दौरान मैं सख़्त ज़रूर रहती हूँ, लेकिन जैसे ही लक्ष्य पूरा होता है, वही टीम कहती है, “शीबा मैडम टफ़ हैं, लेकिन बिल्कुल सही हैं।” फिर हम सब मिलकर उस सफलता का जश्न मनाते हैं, और मैं हमेशा कोशिश करती हूँ कि उनकी मेहनत का सम्मान हो, उन्हें आराम और लंबी छुट्टियाँ भी मिलें।

मेरा मानना है कि हुनर किसी की बपौती नहीं होता। हर इंसान के भीतर एक प्रतिभा होती है, जिसे सिर्फ़ सही मंच, भरोसे और थोड़े-से हौसले की ज़रूरत होती है। मुझे भी दूरदर्शन, CNBC, आज तक, रेडियो और प्रिंट मीडिया जैसे मंचों ने आगे बढ़ने का अवसर दिया, इसलिए मैं भी हमेशा कोशिश करती हूँ कि किसी नए कलाकार या टीम मेंबर को आगे बढ़ने का मौका मिले।

मेरे लिए सबसे बड़ी कामयाबी कोई पुरस्कार नहीं, बल्कि वह पल होता है जब कोई कहता है कि “आपकी वजह से मेरी ज़िंदगी या मेरा करियर बेहतर हुआ।” किसी की मुश्किल आसान कर पाना, उसके चेहरे पर मुस्कान ला पाना या उसकी प्रतिभा को पहचान दिलाने में अपना छोटा-सा योगदान देना—यही मेरे काम की सबसे बड़ी संतुष्टि है और यही मेरी असली कमाई भी।

वो कहते हैं न “दिये से दिया जलाना ही ज़िन्दगी का असली मकसद है, किसी के रास्ते का चिराग बनना  ख़ुद रोशन होने से बेहतर है।“

 मुझे लगता है विनय जी आप भी इसी तरह के इंसान हैं, जब हमारी बात हुई थी तो ऐसा मैंने महसूस किया।

5. कैमरे की रोशनी और तालियों के पीछे अक्सर कई खामोश जंगें छुपी होती हैं। क्या आपके जीवन में कभी ऐसा दौर आया, जब शीबा लतीफ़ जी अंदर से टूट रही थीं, लेकिन दुनिया के सामने मुस्कुराना ज़रूरी था? उस वक़्त आपने खुद को कैसे संभाला?

उत्तर:
बिलकुल… और सच कहूँ तो एक नहीं, ऐसे कई दौर मेरी ज़िंदगी में आए हैं। अक्सर मुझे राज कपूर साहब की फ़िल्म “मेरा नाम जोकर” याद आती है, जिसमें एक कलाकार दुनिया को हँसाता है, जबकि उसके अपने दिल में न जाने कितने दर्द छिपे होते हैं। शायद कलाकार की ज़िंदगी का यही सबसे बड़ा सच है। The show must go on.

कई बार ऐसा हुआ कि निजी जीवन की तकलीफ़ों से आँखें नम थीं, दिल बेहद भारी था, लेकिन सामने लाइव शो था। कैमरा ऑन होते ही चेहरे पर प्रोफेशनल मुस्कान लानी पड़ती थी, क्योंकि उस वक़्त मेरी नहीं, दर्शकों की उम्मीदें ज़्यादा मायने रखती थीं। उस समय अक्सर यह शेर दिल में उतर आता था—

तुमने रोते हुए देखा है जिसे महफ़िल में,
उसे तन्हाई में किस दर्जा दुआ माँगी है।

हमारे जैसे क्रिएटिव प्रोफेशन में बहुत-से लोग ऐसे होते हैं, जो परदे के पीछे टूट रहे होते हैं, लेकिन मंच पर मुस्कुराना उनकी ज़िम्मेदारी बन जाती है। जब लोग आपसे ख़ुशी, उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा की अपेक्षा करते हैं, तब अपने दर्द को अपने तक ही रखना पड़ता है।

मैंने हमेशा अपनी तकलीफ़ों को अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें अपनी कला की ताक़त बना लिया। मेरा मानना है कि खामोशी बहुत कुछ कहती है, और कई बार इंसान की सबसे बड़ी जंग वही होती है, जो वह बिना किसी शोर के अपने भीतर लड़ रहा होता है। मैंने अपनी पीड़ा को कभी अपने काम पर हावी नहीं होने दिया। बल्कि हर बार यही कोशिश की कि मेरी मुस्कान किसी और के चेहरे पर भी मुस्कान बन सके। अगर मेरी कला किसी के जीवन में कुछ पल की ख़ुशी ला सके, तो मुझे लगता है कि मेरी हर तकलीफ़ उस पल में सार्थक हो जाती है।

6. आपकी आवाज़, आपकी शायरी और आपकी बातों में एक गहरी इंसानियत महसूस होती है। क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी इंटरव्यू, किसी शेर या किसी मुलाक़ात ने आपको भीतर तक बदल दिया होइतना कि शीबा लतीफ़ जी पहले जैसी ना रहीं हों?

उत्तर:
जी हाँ, ऐसे कई पल मेरी ज़िंदगी में आए, जिन्होंने मुझे भीतर तक बदल दिया। बड़े-बड़े कलाकारों के साथ काम करते हुए मैंने एक बात बहुत गहराई से महसूस की कि इंसान जितना बड़ा होता है, उतना ही विनम्र भी होता है। शायद इसी वजह से मैंने बहुत पहले ही तय कर लिया था कि मेरी ज़िंदगी में ईगो के लिए कोई जगह नहीं होगी।

मेरे पापा ने मुझे सच्चाई और इंसानियत का रास्ता दिखाया, मेरी माँ और नानू ने तहज़ीब, संवेदनशीलता और लोगों का सम्मान करना सिखाया। लेकिन सच कहूँ तो मैंने सिर्फ़ अपने परिवार से ही नहीं, बल्कि अपनी पालतू कैट, घर में काम करने वाली मेड और जीवन में मिलने वाले हर छोटे-बड़े इंसान से कुछ न कुछ सीखा है। मेरा मानना है कि सीखने के लिए सामने वाले का बड़ा होना ज़रूरी नहीं, बल्कि हमारा मन बड़ा होना ज़रूरी है।

मुझे आज भी वह पल याद है, जब ख़य्याम साहब जैसे महान संगीतकार मेरे लिए ख़ुद उठकर चाय बनाने चले गए। उस एक घटना ने मुझे सिखा दिया कि महानता कभी अहंकार में नहीं, बल्कि विनम्रता में बसती है। उस दिन मैंने समझा कि जितना ऊँचा इंसान अपने कर्मों से होता है, उतना ही सहज उसके व्यवहार में दिखाई देता है।

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मैं हमेशा मानती हूँ कि बदलाव बाहर से नहीं, भीतर से आता है। जब आपकी नज़र बदलती है, तो पूरी दुनिया बदलती हुई दिखाई देती है। इसलिए जहाँ भी मुझे अहंकार दिखाई देता है, मैं चुपचाप वहाँ से स्वयं को अलग कर लेती हूँ।

मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा मंत्र यही है कि जब तक ‘मैं’ आपके भीतर बैठा रहेगा, तब तक आप अपनी मंज़िल तक पूरी तरह नहीं पहुँच सकते। जिस दिन इंसान अपने अहंकार को छोड़ देता है, उसी दिन वह सीखने, आगे बढ़ने और सच्चे अर्थों में खुशहाल जीवन जीने की शुरुआत करता है। शायद यही सीख मुझे हर मुलाक़ात, हर अनुभव और हर रिश्ते ने दी है, और उसी ने मुझे पहले से एक बेहतर इंसान बनाया है।

“जब तक आपके दिमाग में कोई ईगो नहीं है, कोई अहंकार नहीं है… ये जो ‘मैं हूँ, मैं ये हूँ’—जब तक वह आपके भीतर है, तब तक आप चीज़ों को मुकम्मल नहीं कर पाओगे। आपको वह अहंकार छोड़ना पड़ेगा।”  

7. इन दिनों आपके म्यूज़िकल एल्बम को लेकर भी काफी चर्चा है। इस खास अल्बम की रूह क्या है? इसमें मोहब्बत, जिंदगी, दर्द या उम्मीद—किस एहसास को सबसे ज्यादा जगह दी गई है? और इस प्रोजेक्ट को बनाते हुए कौन-सा लम्हा आपके दिल के सबसे करीब रहा?

उत्तर:
‘LoveStruck’ मेरे लिए सिर्फ़ एक म्यूज़िकल एल्बम नहीं, बल्कि दिल से निकला हुआ एक एहसास है। इसकी रूह मोहब्बत, सादगी और रूहानियत का ऐसा संगम है, जिसमें दर्द भी है, उम्मीद भी है और ज़िंदगी के हर जज़्बे की एक खूबसूरत झलक भी। हमने इस प्रोजेक्ट में हर इमोशन को सिर्फ़ सुनाने की नहीं, बल्कि महसूस कराने की कोशिश की है।

इस सफ़र में मेरे दो सबसे मज़बूत स्तंभ रहे—काशिफ रज़ा और अल्तमश अब्बास। जो ‘ट्रायो’ (Trio) में बतौर चीफ पेट्रन और चेयरमैन मेरे पार्टनर्स भी हैं। हमारा शुरू से यही प्रयास रहा कि कुछ ऐसा रचा जाए, जो भीड़ से बिल्कुल जुदा हो और सीधे लोगों के दिलों को छू ले। इस एल्बम में मेरी, अब्बास और काशिफ की रचनाओं के साथ-साथ फ़राज़ फ़ानी की भी एक खूबसूरत ग़ज़ल शामिल है। इसे प्रेम मूर्ति के शानदार संगीत ने सजाया है और निर्देशन का ज़िम्मा अब्बास साहब ने संभाला है।

मेरे लिए संगीत वह ज़ुबान है, जो शब्दों के ख़त्म होने के बाद भी दिल की बात कहती रहती है। शायद इसी वजह से हमने इस प्रोजेक्ट में कृत्रिमता (AI) से दूर रहकर इसकी स्वाभाविकता को सबसे ज़्यादा महत्व दिया। इसमें नौ ग़ज़लों की एक पूरी श्रृंखला है, जिसमें रत्ती भर भी AI का इस्तेमाल नहीं किया गया। हमारा प्रयास था कि शायरी की वही पुरानी ख़ुशबू, वही एहसास और वही गहराई आज के दौर तक पहुँच सके।

एक प्रोड्यूसर और प्रोजेक्ट हेड होने के नाते मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ क्रिएटिव डायरेक्शन तक सीमित नहीं थी। कॉन्सेप्ट, स्क्रीनप्ले, प्री-प्रोडक्शन से लेकर शूटिंग की छोटी-से-छोटी बारीकियों तक मैं हर चरण का हिस्सा रही। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी भी आईं कि टीम के अलग-अलग सदस्यों की ज़िम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ीं। कश्मीर और नैनीताल जैसी खूबसूरत लोकेशनों पर शूटिंग के दौरान अलग-अलग क्रिएटिव सोच को एक दिशा देना भी अपने आप में एक बड़ा अनुभव था।

इस एल्बम को आकार देने में लगभग एक वर्ष लगा। लेकिन मेरे दिल के सबसे करीब वह लम्हा है, जब पद्मश्री से सम्मानित दिग्गज कलाकारों ने इस प्रोजेक्ट की सोच को सुना, उस पर भरोसा किया और पूरे दिल से इसका हिस्सा बने। उन्हें मेरी ग़ज़लों को अपनी आवाज़ में ढालते देखना मेरे जीवन के सबसे ख़ूबसूरत अनुभवों में से एक है।

साथ ही, मुझे इस बात की भी बेहद खुशी है कि इस प्रोजेक्ट के माध्यम से कई नए कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। अगर LoveStruck सुनने वालों के दिल में मोहब्बत, उम्मीद और संवेदनाओं की एक नई रोशनी जगा सके, तो मुझे लगेगा कि हमारी एक साल की मेहनत सचमुच सफल हो गई।

8. आप एक शानदार टीम प्लेयर मानी जाती हैं। इतने सालों के सफर में शोहरत, पहचान और कामयाबी के बावजूद अपने अंदर की सादगी और ईमानदारी को बचाकर रखना कितना मुश्किल रहा? और क्या यही आपकी असली ताकत भी है?

उत्तर:
मेरे लिए सादगी, ईमानदारी और टीमवर्क ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी हैं और यही मेरी असली ताक़त भी है। ग्लैमर की इस चकाचौंध और प्रतिस्पर्धा भरी दुनिया में इन मूल्यों को बचाकर रखना आसान नहीं होता। कई बार यह सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है, लेकिन अगर आपके पाँव ज़मीन पर टिके हों और आपके संस्कार मज़बूत हों, तो यह मुश्किल भी नहीं लगता।

मैं हमेशा मानती हूँ कि सादगी कोई मुखौटा नहीं है, जिसे ज़रूरत पड़ने पर पहन लिया जाए। सादगी और ईमानदारी आपके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा होनी चाहिए। इंसान की असली ख़ूबसूरती उसके व्यवहार और उसके चरित्र में होती है, न कि उसकी शोहरत में।

एक टीम लीडर के रूप में मुझे सम्मान भी मिला है, लेकिन मैंने कभी ख़ुद को सिर्फ़ ‘बॉस’ नहीं समझा। मेरा विश्वास है कि एक अच्छा लीडर वही होता है, जो सबसे पहले एक अच्छा टीम प्लेयर बने। इसके लिए अपने अहंकार को पीछे छोड़ना पड़ता है। मैंने अपने क्रू के साथ स्पॉटबॉय का काम भी किया है, आठ-आठ दिन की लगातार मेहनत के बाद अपने हाथों से पूरी टीम को खाना परोसा है और चाय भी पिलाई है। मेरे लिए मेरा स्पॉटबॉय और मेरा सुपरस्टार—दोनों बराबर हैं।

आख़िर में लोग आपका पद या आपकी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि आपका व्यवहार और आपका काम याद रखते हैं। मेरा मानना है कि रिश्ते सम्मान से बनते हैं, अहंकार से नहीं। शायद यही सोच मुझे आज भी लोगों से दिल से जोड़े हुए है, और यही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है।

9. आज जब लोग आपको एक सफल एंकर, प्रोड्यूसर, शायर और संवेदनशील इंसान के रूप में देखते हैं, तो क्या कोई ऐसा ख़्वाब अब भी आपकी आँखों में पल रहा है, जिसे शीबा लतीफ़ जी आज तक पूरा नहीं कर पाईं? वह कौनसा अधूरा सपना है, जिसे पूरा करने की तड़प आज भी दिल में बाकी है?

उत्तर:
विनय जी, मेरा मानना है कि सपने कभी पूरी तरह पूरे नहीं होते। जैसे ही एक सपना साकार होता है, उसी पल एक नया ख़्वाब जन्म ले लेता है। शायद यही एक सच्चे कलाकार और एक संवेदनशील इंसान की पहचान भी है। अगर सपने समाप्त हो जाएँ, तो आगे बढ़ने की तड़प भी खत्म हो जाएगी।

अगर दिल के सबसे करीब बसे एक अधूरे ख़्वाब की बात करूँ, तो मैं एक ऐसा मंच, एक ऐसा संस्थान बनाना चाहती हूँ, जहाँ साहित्य, गीत-संगीत, उर्दू अदब, रंगमंच और कला की हर विधा से जुड़े लोग बिना किसी दबाव और भेदभाव के अपनी प्रतिभा दुनिया के सामने ला सकें। ऐसे अनगिनत लोग हैं, जिनके पास हुनर तो है, लेकिन उन्हें न सही मंच मिला, न सही मार्गदर्शन और न ही अपने सपनों को उड़ान देने का अवसर।

मेरी तमन्ना है कि ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं को अनुभवी और वरिष्ठ फ़नकारों से जोड़ा जाए, ताकि पुराने लोग अपने अनुभव की रोशनी बाँटें और नए लोग अपनी नई सोच से उस विरासत को आगे बढ़ाएँ। मेरा विश्वास है कि जब पीढ़ियाँ एक-दूसरे से सीखती हैं, तभी कला सचमुच जीवित रहती है।

मेरे दिल में एक और ख़्वाब भी है—उन पुराने कलाकारों और फ़नकारों को फिर से तलाशना, जो कभी अपनी कला से लोगों के दिलों पर राज करते थे, लेकिन आज गुमनामी के अँधेरे में खो गए हैं। वे सिर्फ़ कलाकार नहीं, हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। उन्हें सम्मान के साथ फिर से मंच मिले, ताकि नई पीढ़ी उनके अनुभव, उनके संघर्ष और उनकी कला से प्रेरणा ले सके।

एक बात मैं हमेशा कहती हूँ—“जब ख़्वाब अधूरे होते हैं, तभी उन्हें पूरा करने की तड़प ज़िंदा रहती है।” शायद यही तड़प मुझे हर सुबह एक नई उम्मीद, एक नई मंज़िल और एक नए सफ़र की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।

10. आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स और फिलहाल चल रहे प्रोजेक्ट्स को लेकर आपके चाहने वालों में हमेशा उत्सुकता रहती है। आने वाले दिनों में अपने दर्शकों और श्रोताओं को किस नए अंदाज़, किस नई सोच या किस नए एहसास से रूबरू कराने वाली हैं?

“आने वाले दिनों में, मैं सिर्फ काम नहीं करना चाहती, मैं एक बदलाव लाना चाहती हूँ। मेरा मकसद उन लोगों को रोशनी दिखाना है जो डिप्रेशन में हैं, जो तन्हा हैं। मैं कुछ ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हूँ जो सीधे रूह से जुड़ते हैं। जैसे मेरा म्यूज़िकल एल्बम ‘LoveStruck’ है, जो मोहब्बत और शायरी के उन पुराने दौर की याद दिलाता है जो हम खो चुके हैं।

मैं लोगों को उस रोबोटिक लाइफ से बाहर निकाल कर एक ठहराव (slow pace) महसूस कराना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे काम को देखकर लोग ये सीखें कि एक-दूसरे को सुनना और समझना कितना ज़रूरी है। आने वाले समय में आप मुझे कुछ बिल्कुल अलग और meaningful projects में काम करते हुए देखेंगे। इस वक्त कई innovative ideas पर काम चल रहा है, जिनमें digital platforms और poetry literature भी शामिल हैं। मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि senior और junior artists के बीच एक मजबूत bridge होना चाहिए, ताकि दोनों मिलकर सम्मान, समझ और creativity के साथ काम कर सकें। मैं चाहती हूँ कि किसी तरह की ego या दूरी न रहे, बल्कि अनुभव और नई ऊर्जा का सुंदर संगम बने। परिवर्तन ही जीवन का नियम है, और इसी सोच के साथ मैं पुरानी सीख और नई दृष्टि को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती हूँ। वरिष्ठ कलाकारों को भी मैं यही समझाती हूँ कि वे भी कभी नए थे, और अगर उन्हें उस समय अवसर न मिला होता, तो आज वे इस मुकाम तक नहीं पहुँचते। इसलिए मेरा प्रयास है कि इस मानसिक दीवार को तोड़ा जाए और एक ऐसा creative space बनाया जाए, जहाँ emotions, expression और contemporary feel — तीनों का संतुलन हो। मैं अपने काम के ज़रिए दर्शकों को सुकून, संवेदना और आज के एहसासों से जुड़ा हुआ अनुभव देना चाहती हूँ।

11. अगर आज की शीबा लतीफ़ अपनी कम उम्र वाली शीबा लतीफ़ से मुलाक़ात करें, तो उसे कौनसी एक बात प्यार से कहना चाहेंगी? और उन युवाओं के लिए आपका क्या पैग़ाम होगा, जो बड़े सपने तो देखते हैं, मगर हालात से डर जाते हैं?

उत्तर:
(यह सवाल सुनते ही शीबा लतीफ़ कुछ पल के लिए ख़ामोश हो जाती हैं। उनकी आँखें हल्कीसी नम हो उठती हैं। फिर मुस्कुराते हुए अपनी बात शुरू करती हैं…)

सबसे पहले तो मैं उस छोटी-सी शीबा को गले लगाना चाहूँगी। शायद इसलिए कि आज भी मुझे लगता है, मेरे भीतर का बचपन ज़िंदा है, और मेरा मानना है कि इंसान के अंदर का बच्चा कभी मरना नहीं चाहिए।

मैं उससे सिर्फ़ इतना कहूँगी—घबराना मततुम जो कर रही हो, वह बिल्कुल सही है। अपनी राह मत बदलना। जो तकलीफ़ें आज तुम्हें रुला रही हैं, वही कल तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त बनेंगी। वक़्त के पास हर ज़ख्म की दवा होती है। बस अपने आप पर भरोसा बनाए रखना, क्योंकि आने वाला वक़्त बहुत ख़ूबसूरत है, शीबा।

मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष किया, कई बार बगावत भी की, ठोकरें खाईं, बहुत कुछ सहा… लेकिन अपने सपनों और अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि अगर उस वक़्त डर जाती, तो शायद आज यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। मैं हमेशा से बहुत संवेदनशील रही हूँ और कभी इसे अपनी कमज़ोरी नहीं माना। मेरा विश्वास है कि संवेदनशीलता ही इंसान को बेहतर कलाकार और बेहतर इंसान बनाती है।

आज के युवाओं से मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगी कि बड़े सपने देखिए, लेकिन हालात से मत डरिए। हालात कभी हमारे अनुकूल नहीं होते, उन्हें अपनी मेहनत, अपने हुनर और अपने धैर्य से बदलना पड़ता है। अगर आपने कोई सपना देखा है, तो उसे पूरी ईमानदारी, पूरे जुनून और पूरी प्रतिबद्धता के साथ पूरा करने में लग जाइए। रिजेक्शन से मत डरिए, क्योंकि कई बार Rejection is Redirection होता है।

मुझे हमेशा यह पंक्ति प्रेरित करती है—

परिंदों को मंज़िल मिलेगी यक़ीनन,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं।

वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर ,
ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं।

और आख़िर में मैं हर युवा से यही कहना चाहूँगी कि ज़िंदगी में शॉर्टकट जैसी कोई चीज़ नहीं होती। सफलता का कोई आसान रास्ता नहीं होता। सोना भी कुंदन बनने से पहले आग में तपता है। इसलिए लगातार सीखते रहिए, मेहनत करते रहिए, अपनी जड़ों से जुड़े रहिए और अपने भीतर ईर्ष्या या अहंकार को जगह मत दीजिए। जिस दिन आपका इरादा मज़बूत, मेहनत सच्ची और इंसानियत ज़िंदा होगी, उस दिन कामयाबी को भी आपके दरवाज़े तक आना ही पड़ेगा।

समापन

शीबा लतीफ़ जी से हुई यह बातचीत केवल एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि जीवन, रिश्तों, संवेदनाओं, संघर्ष, नेतृत्व और इंसानियत का एक जीवंत दस्तावेज़ है। उनके अनुभव बताते हैं कि वास्तविक सफलता केवल ऊँचे पदों या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि विनम्रता, सीखते रहने की प्रवृत्ति और लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से मिलती है।

लेखक एवं साक्षात्कारकर्ता

✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

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