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दिल्ली की बेटी, ब्रिस्बेन की आवाज़ — जिसने विदेश में भी हिन्दी की लौ जलाए रखी

“जहाँ अन्न-जल लिखा, वहाँ गई — पर देश मन से न गया”

कुछ लोग देश छोड़ते हैं, पर देश उन्हें कभी नहीं छोड़ता। ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन शहर में बसी मधु खन्ना ऐसी ही एक असाधारण महिला हैं — जिन्होंने हजारों मील दूर रहकर भी हिन्दी भाषा, भारतीय संस्कृति और अपनी जड़ों से कभी नाता नहीं तोड़ा। उनकी कहानी केवल एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस भारतीय की कहानी है जो विदेश की धरती पर भी भारत को जीवित रखता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐसी महिलाओं को नमन करना हमारा कर्तव्य है — जो चुपचाप, बिना किसी पुरस्कार की आस के, अपनी भाषा और संस्कृति की लौ जलाए रखती हैं। मधु खन्ना जी — आप केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, आप एक दीपक हैं — जो हज़ारों मील दूर भी भारत की रोशनी फैला रही हैं। आगे बढ़ने से पहले आपको अंतराष्टीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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🎓 बहुआयामी व्यक्तित्व — एक परिचय

मधु खन्ना जी का जन्म दिल्ली में हुआ। उन्होंने हिन्दी में एम.ए. और बी.एड. की शिक्षा प्राप्त की तथा ग्रिफ़िथ यूनिवर्सिटी, क्वींज़लैंड से एम.एड. की उपाधि अर्जित की। वे रंगोली कला तथा टेक्सटाइल प्रदर्शनी की अनेक प्रदर्शनियों में सक्रिय रूप से शिरकत करती रही हैं। ‘डिफ्रेंट स्ट्रोक्स फ्राम लोगन’ की क्रिएटिव डायरेक्टर के रूप में उन्होंने कला जगत में अपनी अमिट पहचान बनाई है। उनकी रचनाएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं और कविताएँ ‘बूमरेंग-२’ संकलन में शामिल हैं। वे ऑस्ट्रेलियन इंडियन रेडियो पर ‘बातें मधु के साथ’ कार्यक्रम के माध्यम से श्रोताओं के दिलों तक पहुँचती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में वे बौद्धिक अक्षमता व ऑटिज़्म से ग्रस्त बच्चों को पढ़ाती हैं — यह सेवा स्वयं में एक तपस्या है।

✈️ विदेश गई, पर मन भारत में रहा

सन् २००४ में जब मधु जी ऑस्ट्रेलिया पहुँचीं, तब वहाँ भारतीय समुदाय बहुत कम था। उस समय किसने सोचा होगा कि यह देश उनका दूसरा घर बन जाएगा? पर विधि के विधान को कौन टाल सकता है। वे स्वयं कहती हैं — “सोचा तो कदाचित नहीं था कि अपने प्यारे देश को छोड़ कर जाऊँगी, किन्तु जहाँ का अन्न-जल लिखा था, विधि वहाँ ले आई।” यह वाक्य पढ़कर मन भर आता है — क्योंकि इसमें केवल शब्द नहीं, एक पूरे जीवन की भावना है। आज वे ऑस्ट्रेलिया को एक आँख और भारत को दूसरी आँख मानती हैं। दो आँखें — दो देश — एक हृदय। यही है मधु खन्ना जी की पहचान। एक ऐसी महिला जो दो संस्कृतियों के बीच पुल बनकर खड़ी है।

📚 हिन्दी के लिए समर्पित एक शिक्षिका

मधु खन्ना का जीवन केवल एक शिक्षिका का जीवन नहीं है, बल्कि यह हिन्दी भाषा के प्रति गहरे प्रेम और समर्पण की प्रेरक कहानी है। लगभग दो दशकों से वे शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं और विशेष रूप से अधिगम अक्षमता वाले बच्चों को पढ़ाने का संवेदनशील दायित्व निभा रही हैं। ऐसे बच्चों को शिक्षित करना केवल ज्ञान देने का काम नहीं होता, बल्कि उसमें धैर्य, करुणा और आत्मीयता की आवश्यकता होती है। मधु खन्ना इस दायित्व को पूरी निष्ठा और संवेदनशीलता के साथ निभाती रही हैं। किन्तु उनके हृदय में हिन्दी भाषा के प्रति जो प्रेम है, वही उन्हें एक विशेष पहचान देता है। वर्ष 2016 से उन्होंने ब्रिस्बेन के स्कूलों और भारतीय समुदाय के बीच हिन्दी को बढ़ावा देने का प्रयास शुरू किया। उनका सपना है कि जिस तरह फ्रेंच और जर्मन जैसी भाषाएँ ऑस्ट्रेलिया के विद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, उसी प्रकार हिन्दी को भी सम्मानजनक स्थान मिले।

वे मानती हैं कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और पहचान की आत्मा होती है। यदि आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा से दूर हो जाएगी, तो वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों से भी दूर हो जाएगी। यही चिंता उन्हें लगातार प्रयास करने की प्रेरणा देती है। उनका विश्वास है कि यदि सच्चे मन से प्रयास किया जाए तो एक दिन हिन्दी भी विदेशी धरती पर वही सम्मान पाएगी जिसकी वह हकदार है। उनकी यह निष्ठा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो अपनी भाषा और संस्कृति से सच्चा प्रेम करता है।

🌺 ‘सिक्स यार्ड्स ऑफ ग्रेस’ — एक अनूठी कला यात्रा

केवल हिन्दी ही नहीं, मधु जी ने भारतीय संस्कृति के हर पहलू को ऑस्ट्रेलिया में जीवंत किया है। उनकी कला-प्रदर्शनी “Indian Saree — Six Yards of Grace” इसका सबसे चमकीला उदाहरण है। इस प्रदर्शनी में भारत के विभिन्न राज्यों की साड़ियों की पारम्परिक इतिहास, कढ़ाई और विरासत को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। यह प्रदर्शनी Festival of Commonwealth Friendship के अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया के गवर्नर हाउस, ब्रिसबेन में आयोजित की गई। कांचीपुरम की भव्यता, बनारसी की शान, केरल की कसावु, फुलकारी की कोमलता और चंदेरी की नज़ाकत — सब कुछ एक ही छत के नीचे। ऑस्ट्रेलिया की महामहिम गवर्नर डॉ. जीनेट यंग भी इस आयोजन में उपस्थित रहीं और उन्होंने इस प्रदर्शनी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मधु जी स्वयं कला भारती संस्थान, ब्रिसबेन की सक्रिय सदस्य हैं और इस प्रदर्शनी के आयोजन में उनकी भूमिका केंद्रीय रही। साड़ी में लिपटी भारत की आत्मा को विदेशी धरती पर इतने सुंदर और गरिमामय तरीके से प्रस्तुत करना — यह केवल एक कलाकार का काम नहीं, यह एक देशभक्त का काम है।

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ब्रिस्बेन में लहराया तिरंगा — ‘हर घर तिरंगा’ अभियान

कला भारती संस्थान, ब्रिसबेन की ओर से “हर घर तिरंगा” अभियान के अंतर्गत ब्रिस्बेन में निवासरत भारतवंशियों में तिरंगे के प्रति सम्मान और जागरूकता का प्रचार किया गया। विदेश की धरती पर रहते हुए भी अपने देश के प्रति प्रेम और सम्मान को जीवित रखना आसान नहीं होता, लेकिन कुछ लोग अपने कर्मों से यह साबित कर देते हैं कि सच्ची देशभक्ति सीमाओं की मोहताज नहीं होती। ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन शहर में भी ऐसा ही एक प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिलता है, जब भारतीय समुदाय पूरे उत्साह के साथ हर घर तिरंगा अभियान में भाग लेता है। इस अभियान में मधु खन्ना जैसी समर्पित भारतीय महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए इस राष्ट्रीय अभियान का उद्देश्य देशवासियों में तिरंगे के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना को और अधिक मजबूत करना है। जब यह अभियान शुरू हुआ, तब इसकी गूंज केवल भारत तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया के कई देशों में बसे भारतीयों तक भी पहुँची। ब्रिस्बेन में रहने वाले भारतीय समुदाय ने भी इस अभियान को पूरे गर्व और उत्साह के साथ अपनाया।

मधु खन्ना और उनके साथियों ने इस अवसर पर भारतीय परिवारों को प्रेरित किया कि वे अपने घरों, संस्थानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में तिरंगा फहराएँ। इस अभियान के दौरान ब्रिस्बेन के कई इलाकों में भारतीय तिरंगा गर्व के साथ लहराता दिखाई दिया। लोग पारंपरिक भारतीय वेशभूषा में एकत्र हुए, देशभक्ति गीत गाए गए और बच्चों को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के महत्व के बारे में बताया गया। यह केवल एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान को जीवित रखने का एक भावनात्मक प्रयास भी था। विशेष रूप से नई पीढ़ी के बच्चों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता, त्याग और गौरव का प्रतीक है। ब्रिस्बेन में हर घर तिरंगा अभियान ने यह संदेश दिया कि चाहे कोई व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो, उसके दिल में अपने देश के लिए प्रेम हमेशा जीवित रहता है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से प्रवासी भारतीय अपने देश से जुड़े रहते हैं और आने वाली पीढ़ियों तक भी इस भावना को पहुँचाते हैं। इस कार्यक्रम में कौंसुल श्रीमती नीतू भगोतिया ने भी भारतीय वाणिज्य दूतावास में बड़े उत्साह के साथ ध्वज फहराया। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा — सिर्फ एक ध्वज नहीं है, यह एक भावना है, एक इतिहास है और हर भारतीय के हृदय में धड़कती एक साँस है। यह सिर्फ तीन रंगों का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि करोड़ों बलिदानों, अनगिनत सपनों और हमारी साझा पहचान का जीवंत प्रतीक है। मधु जी इस संदेश को ब्रिस्बेन की गलियों तक पहुँचाने में सदैव अग्रणी रही हैं।

🎙️ रेडियो की आवाज़ — भारत का संदेश घर-घर तक

मधु खन्ना जी की बहुमुखी प्रतिभा केवल शिक्षा और कला तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलियन इंडियन रेडियो पर उनका कार्यक्रम ‘बातें मधु के साथ’ प्रवासी भारतीयों के लिए एक अनमोल डोर है — जो उन्हें अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने देश से जोड़े रखती है। जब कोई ब्रिस्बेन में बैठकर हिन्दी में बातें सुनता है, तो मन एक पल के लिए भारत की किसी गली में पहुँच जाता है — यही जादू है मधु जी की आवाज़ का।

📰 २०२६ की ऑस्ट्रेलियाई जनगणना में हिन्दी को आवाज़

ऑस्ट्रेलियाई इंडियन टाइम्स में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अपील के अनुसार, अगस्त २०२६ में होने वाली ऑस्ट्रेलिया की जनगणना में हिन्दी को मातृभाषा के रूप में दर्ज कराने का आग्रह किया जा रहा है। यह पहल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जब एक भाषा आधिकारिक आँकड़ों में दर्ज होती है, तभी उसे सरकारी मान्यता, धन और संस्थागत समर्थन मिलता है। मधु जी जैसी समर्पित महिलाएँ इस अभियान की रीढ़ हैं। वे समझती हैं कि अरबी और फ़ारसी जैसी भाषाएँ जो जनगणना में दर्ज हैं, उन्हें अधिक मान्यता और वित्तीय सहायता मिलती है। तो फिर हिन्दी क्यों पीछे रहे? यह केवल एक भाषा की लड़ाई नहीं — यह अपनी पहचान की लड़ाई है।

🌟 एक महिला — एक मिशन — एक प्रेरणा

मधु खन्ना जी की कहानी हमें सिखाती है कि देशभक्ति केवल युद्ध के मैदान में नहीं होती। यह होती है जब आप विदेश की धरती पर अपनी भाषा सिखाते हैं, अपनी साड़ी पहनकर गवर्नर हाउस में जाते हैं, रेडियो पर हिन्दी में बोलते हैं, अपने बच्चों को ‘जन गण मन’ गाना सिखाते हैं और हर उस अवसर पर भारत को जीवित रखते हैं जब दुनिया आपसे कह रही हो — “तुम तो विदेश में हो।”

मधु खन्ना जी एकल व्यक्ति नहीं हैं — वे एक आंदोलन हैं। उनका कहना है — “जब मैं यहाँ की गवर्नर को भारतीय साड़ी की महिमा पर कला प्रदर्शनी कर बतला सकती हूँ, तो हिन्दी भाषा क्यों नहीं।” इन शब्दों में एक महिला का अदम्य साहस, अपार आत्मविश्वास और गहरी देशभक्ति झलकती है।

2 thoughts on “दिल्ली की बेटी, ब्रिस्बेन की आवाज़ — जिसने विदेश में भी हिन्दी की लौ जलाए रखी”

  1. Madhu Khanna

    आदरणीय विनय जी ,
    आप की लेखनी अद्भुत व सशक्त है। माला में मोतियों की तरह आप ने एक एक शब्द को पिरोया है।मैं मिट्टी से जुड़ी हूँ और आप ने मुझे आसमान पर बिठा दिया । मिट्टी में ही रह कर आदमी काम कर सकता है। बहुत बहुत आभार और आप की पुस्तक “मनमोदी” के लिये हार्दिक बधाई । कलम की ताक़त में बहुत तेज़ धार है। प्रभु की अनुकम्पा आप पर सदा बनी रहे। धन्यवाद,
    मधु खन्ना ।

    1. आदरणीय मधु जी,
      नमस्कार।

      आपके स्नेहपूर्ण और प्रेरणादायी शब्दों के लिए हृदय से धन्यवाद।

      मेरी लेखनी को आपने जिस सम्मान और अपनत्व से सराहा, वह मेरे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा है। सच तो यह है कि आपकी जैसी प्रेरक व्यक्तित्व और कर्मभूमि से जुड़ी साधना ही किसी लेखक को लिखने की शक्ति देती है।

      आपका यह स्नेह और आशीर्वाद मेरी कलम की ताक़त को और बढ़ाता रहेगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी ऊर्जा और मार्गदर्शन हम सबको यूँ ही प्रेरित करता रहे।

      सादर आभार। 🙏
      विनय श्रीवास्तव

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