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मेलोनी को ‘मेलोडी’ पर विपक्ष को मिर्ची क्यों? “टॉफी पर तूफ़ान, मुद्दों पर मौन”:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएँ अक्सर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहतीं, वे एक राजनीतिक संदेश भी बन जाती हैं। कभी किसी विदेशी नेता को गले लगाना चर्चा बनता है, कभी किसी सांस्कृतिक प्रतीक को उपहार देना। इस बार चर्चा का केंद्र बनी एक छोटी-सी टॉफी — “मेलोडी”। इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni को […]

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नेताजी तनिक संभल के, पब्लिक सब देख और समझ रही है!

“नेताजी की साइकिल आगे, पीछे दस गाड़ियों की बारात!” देश में इन दिनों एक नया राजनीतिक मौसम चल रहा है। पहले नेता जी के काफिले देखकर जनता को लगता था कि शायद कोई राजा-महाराजा निकल रहे हैं। आगे पायलट गाड़ी, पीछे एस्कॉर्ट, उसके पीछे मीडिया टीम, फिर समर्थकों की एसयूवी, और सबसे आखिर में वह

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NEET पेपर लीक 2026: कब तक लुटते रहेंगे छात्रों के सपने, कब जागेगा सिस्टम?

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरी या कॉलेज में दाखिले का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों की उम्मीदों का आधार हैं। खासकर NEET जैसी परीक्षा, जिसके लिए छात्र कई वर्षों तक अपना बचपन, अपनी खुशियां और अपनी नींद तक कुर्बान कर देते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार

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बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के सूत्रधार शुभेंदु अधिकारी कैसे बने बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा

कभी “दीदी” के सबसे भरोसेमंद नेता, आज भाजपा के लिए बंगाल विजय का सबसे मजबूत आधार पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदलाव की चर्चा लंबे समय से हो रही थी, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह बदलाव इतनी तेजी से इतिहास बन जाएगा। भाजपा की ऐतिहासिक जीत और शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री

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बंगाल में सत्ता परिवर्तन का नया अध्याय: नंदीग्राम से नवाबगंज तक शुभेंदु अधिकारी के संघर्ष, रणनीति और उदय की कहानी

राजतिलक की करो तैयारी… पश्चिम बंगाल में आ गए  शुभेंदु  अधिकारी! कभी ममता के सबसे भरोसेमंद सिपाही, आज भाजपा के सबसे बड़े बंगाली चेहरे पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्षों बाद ऐसा दृश्य देखने को मिला है, जब सत्ता के गलियारों में “परिवर्तन” केवल नारे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वास्तविकता बन गया। तृणमूल कांग्रेस

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सत्ता नहीं मिली तो लोकतंत्र ही गलत? विपक्ष की मानसिकता चिंताजनक

भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतंत्र माना जाता है। यहाँ सत्ता का असली मालिक कोई नेता, दल या विचारधारा नहीं, बल्कि देश की जनता होती है। हर चुनाव में करोड़ों मतदाता अपने विवेक, अनुभव और उम्मीदों के आधार पर फैसला सुनाते हैं। यही जनादेश लोकतंत्र की आत्मा होता है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण

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