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राजनीति

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जनादेश का अपमान कब तक? हारते ही लोकतंत्र पर सवाल उठाना विपक्ष की खतरनाक प्रवृत्ति

भारतीय लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आस्था, विश्वास और सहभागिता का जीवंत प्रतीक है। यह वह व्यवस्था है जिसमें देश का एक साधारण नागरिक भी अपनी उंगली पर लगी स्याही के माध्यम से सत्ता की दिशा तय करता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनाव केवल सरकार बनाने […]

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दिल्ली की सड़कों पर बिखरा एक बिहारी बेटे का खून

दिल्ली देश की राजधानी है। यह वह शहर है जहां लाखों लोग अपने सपनों को पूरा करने आते हैं। इनमें बड़ी संख्या बिहार के युवाओं की भी होती है, जो अपने परिवार का पेट पालने, मां-बाप के सपनों को पूरा करने और अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए घर-गांव छोड़कर महानगरों का रुख करते

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जीते जी दूरियां, मरने पर आंसू: रिश्तों की सबसे कड़वी सच्चाई

जीवन बहुत छोटा और अनिश्चित है। कौन कब, कहां और किस पल इस दुनिया को छोड़ जाए, कोई नहीं जानता। इसके बावजूद इंसान अपने अहंकार, व्यस्तता और छोटी-छोटी नाराजगियों में इतना उलझ जाता है कि अपनों के लिए समय ही नहीं निकाल पाता। परिवार, दोस्त, रिश्तेदार—जो लोग कभी हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा होते

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बिहार की नई उम्मीदें : जंगलराज से विकास की नींव तक और अब आत्मनिर्भर बिहार की तलाश

बिहार आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दो दशकों से अधिक समय तक राज्य की राजनीति और प्रशासन की धुरी रहे नितीश कुमार के लंबे शासनकाल के बाद अब नई राजनीतिक परिस्थितियों में सम्राट चौधरी जैसे नए नेतृत्व से लोगों की अपेक्षाएँ जुड़ रही हैं। यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की

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राजनीति

“दरकती दीवारें: 7 सांसदों के पलायन से केजरीवाल की रणनीति पर बड़े सवाल

भारतीय राजनीति में कभी “वैकल्पिक राजनीति” का चेहरा बनकर उभरी Aam Aadmi Party आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली इस पार्टी ने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज की, पंजाब में सरकार बनाई और राष्ट्रीय स्तर पर खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश

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महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका: दो-तिहाई बहुमत की दीवार और अधूरी उम्मीदों की लंबी कहानी

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग कोई नई नहीं रही है, लेकिन “महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो सका” यह वाक्य कई दशकों तक इस पूरे मुद्दे की सच्चाई को बयां करता रहा। संसद से लेकर सड़कों तक, राजनीतिक मंचों से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक—हर जगह इस बात पर सहमति थी कि

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