
समाज का वास्तविक विकास ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आधुनिक तकनीक से नहीं मापा जाता। किसी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर लोगों—बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों—के साथ कैसा व्यवहार करती है। दुर्भाग्य से आज भारत का समाज ऐसी घटनाओं का गवाह बन रहा है, जो केवल कानून तोड़ने वाले अपराध नहीं, बल्कि इंसानियत की आत्मा को घायल करने वाले कृत्य हैं।
हाल के दिनों में राजस्थान की राजधानी जयपुर से सामने आई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। एक मामले में सरकारी नौकरी पाने की कथित लालसा में अपनी ही माँ की हत्या का आरोप सामने आया। दूसरे मामले में एक बुजुर्ग पिता के साथ बेटे द्वारा की गई अमानवीय मारपीट ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हमारी परवरिश, शिक्षा और संस्कार किस दिशा में जा रहे हैं। ये घटनाएँ केवल पुलिस केस नहीं हैं, बल्कि समाज के नैतिक दिवालियापन का आईना हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अपराध किसने किया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी मानसिकता पैदा कैसे हो रही है, जहाँ माँ-बाप, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य के लिए खपा दी, वही बच्चे किसी दिन उनके लिए खतरा बन जाएँ।
आज का समाज सफलता की ऐसी अंधी दौड़ में भाग रहा है जहाँ चरित्र पीछे छूट गया है। बच्चों को बचपन से यह सिखाया जा रहा है कि जीवन में बड़ा बनो, अधिक कमाओ, शानदार नौकरी करो, महँगी गाड़ी खरीदो, आलीशान मकान बनाओ। लेकिन यह शायद ही कोई सिखाता है कि बड़ा इंसान कैसे बनना है।
आज कई माता-पिता अपने बच्चों की हर इच्छा पूरी करते हैं। महँगे मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े, कोचिंग, विदेश की पढ़ाई—सब कुछ उपलब्ध करा देते हैं। लेकिन यदि बच्चों के भीतर सेवा, त्याग, करुणा और कृतज्ञता के संस्कार नहीं डाले गए, तो वही सुविधाएँ धीरे-धीरे अधिकार बन जाती हैं और अधिकार से जन्म लेता है अहंकार। यही अहंकार आगे चलकर रिश्तों को निगल जाता है।
यह कहना कठोर अवश्य है, लेकिन सत्य है कि आज समाज में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ रही है जो माता-पिता को “जिम्मेदारी” नहीं बल्कि “बोझ” समझने लगे हैं। वृद्ध माँ-बाप की दवा, इलाज और देखभाल उन्हें खर्च दिखाई देती है। उनके साथ बैठकर दो बातें करना भी समय की बर्बादी लगने लगता है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक पराजय है।
सोशल मीडिया ने भी इस संकट को कहीं न कहीं बढ़ाया है। वहाँ सफलता की चमक दिखाई जाती है, संघर्ष नहीं; विलासिता दिखाई जाती है, त्याग नहीं; प्रसिद्धि दिखाई जाती है, परिवार नहीं। धीरे-धीरे नई पीढ़ी यह मानने लगती है कि जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं को सफल बनाना है, चाहे इसके लिए रिश्तों का गला ही क्यों न घोंटना पड़े।

लेकिन क्या वास्तव में यही भारत की संस्कृति है?
नहीं।
यही वह भूमि है जहाँ श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई। यही वह संस्कृति है जहाँ भगवान राम ने माता-पिता की आज्ञा के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। यही वह देश है जहाँ करोड़ों बेटे-बेटियाँ आज भी अपने माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं।
देश के हर गाँव और शहर में ऐसे हजारों उदाहरण मिलेंगे जहाँ बेटे-बेटियाँ अपने सपनों को कुछ वर्षों के लिए रोककर माता-पिता की सेवा कर रहे हैं।
कहीं एक बेटी अपनी नौकरी छोड़कर कैंसर से पीड़ित माँ की सेवा में लगी हुई है। उसने पदोन्नति का अवसर छोड़ दिया, लेकिन माँ का हाथ नहीं छोड़ा।
कहीं एक बेटा विदेश में करोड़ों रुपये के पैकेज का अवसर छोड़कर अपने बीमार पिता की खेती और परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहा है। उसके लिए माता-पिता की मुस्कान किसी विदेशी वेतन से अधिक मूल्यवान है।
क्या विचारों में राम और बुद्धि में कृष्ण ही आज के समय में सफल जीवन जीने की सबसे बड़ी साधना है?

कहीं एक बहन अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई के लिए स्वयं विवाह टाल देती है ताकि परिवार टूटने न पाए।
कहीं एक युवक दिन में नौकरी करता है और रात में अपने लकवाग्रस्त पिता की सेवा करता है। उसकी थकान उसके चेहरे पर दिखाई देती है, लेकिन शिकायत उसके शब्दों में नहीं मिलती।
ये लोग कभी समाचारों की सुर्खियाँ नहीं बनते, क्योंकि त्याग की खबरें बिकती नहीं हैं। लेकिन यही लोग इस देश की असली पूँजी हैं।
आज आवश्यकता है कि समाज सफलता की परिभाषा बदले।
यदि कोई व्यक्ति करोड़पति है लेकिन अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देता है, तो वह सफल नहीं हो सकता।
यदि कोई उच्च अधिकारी बन गया, लेकिन उसकी सफलता किसी माँ के आँसुओं पर खड़ी है, तो वह उपलब्धि नहीं, अभिशाप है।
यदि कोई बेटा अपने पिता की पिटाई करता है, तो वह केवल कानून का अपराधी नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का भी अपराधी है।
समाज को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। केवल अपराध होने के बाद सोशल मीडिया पर दो पोस्ट लिख देना सामाजिक जिम्मेदारी नहीं है।
विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को फिर से गंभीरता से लागू करना होगा। बच्चों को केवल गणित और विज्ञान नहीं, बल्कि माता-पिता का सम्मान, बुजुर्गों की सेवा, सहानुभूति और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सिखाना होगा।
कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर नियमित परामर्श होना चाहिए। कई बार आर्थिक दबाव, अवसाद और असफलता व्यक्ति को गलत दिशा में धकेल देते हैं। समय रहते संवाद और सहायता अनेक परिवारों को टूटने से बचा सकती है।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। केवल अपराध दिखाने से समाज नहीं सुधरेगा। समाज तब सुधरेगा जब सेवा, त्याग और मानवीय मूल्यों की कहानियों को भी उतनी ही प्रमुखता मिलेगी जितनी अपराधों को मिलती है।
सरकारों को भी बुजुर्गों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act जैसे कानूनों का प्रभावी पालन हो, बुजुर्गों के लिए हेल्पलाइन सक्रिय हों, और घरेलू हिंसा के मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आना होगा। मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद, चर्च और सामाजिक संगठन केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रहें, बल्कि परिवारों में संवाद, बुजुर्गों की सहायता और संस्कार निर्माण के अभियान चलाएँ।
सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माता-पिता की भी है। बच्चों को केवल संपत्ति का उत्तराधिकारी न बनाइए, संस्कारों का भी उत्तराधिकारी बनाइए। उन्हें यह अवश्य सिखाइए कि जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि बड़ा वेतन नहीं, बल्कि बड़ा हृदय होता है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बच्चे वही सीखते हैं जो घर में देखते हैं। यदि वे अपने पिता को दादा-दादी का अपमान करते हुए देखेंगे, तो कल वही व्यवहार वे अपने माता-पिता के साथ दोहराएँगे। संस्कार किताबों से कम और परिवार के वातावरण से अधिक पैदा होते हैं।
आज समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ निर्णय हमें करना है। क्या हम ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो सुविधा के लिए रिश्तों की बलि दे दे? या ऐसी पीढ़ी जो अपने माता-पिता के चरणों में अपना सबसे बड़ा सम्मान खोजे?
कानून अपराधियों को सजा दे सकता है, लेकिन समाज को संवेदनशील केवल संस्कार ही बना सकते हैं।
हर युवा से मेरी एक विनम्र लेकिन दृढ़ अपील है—जिस माँ ने नौ महीने आपको अपने गर्भ में रखा, जिसने रात-रात भर जागकर आपको बड़ा किया, जिसने अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर आपकी इच्छाएँ पूरी कीं, और जिस पिता ने अपनी कमाई का एक-एक रुपया आपके भविष्य पर खर्च कर दिया, उनके प्रति सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आपका जीवन ऋण है।
यदि आज भी आपके माता-पिता जीवित हैं, तो यह आपका सौभाग्य है। आज ही उनसे बैठकर कुछ देर बात कीजिए। उनका हाल पूछिए। उनके साथ भोजन कीजिए। उनके हाथ पकड़कर धन्यवाद कहिए।
याद रखिए, जिस दिन माता-पिता इस दुनिया से चले जाते हैं, उस दिन करोड़ों रुपये भी उनके आशीर्वाद की एक मुस्कान वापस नहीं ला सकते।
समाज तभी सभ्य कहलाएगा, जब घरों में बुजुर्ग सुरक्षित होंगे, माता-पिता सम्मानित होंगे और बच्चे यह समझेंगे कि इंसान की सबसे बड़ी सफलता पद, पैसा और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रति प्रेम, सेवा और कृतज्ञता है।
यदि आज भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ तकनीक से समृद्ध अवश्य होंगी, लेकिन संवेदनाओं से निर्धन। और किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य दूसरा नहीं हो सकता।
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✍️विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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बहुत ही उम्दा लिखा है अपने वर्तमान में ऐसा ही कुछ होता है सैटेलाइट संस्कृति ने नैतिकता और सामाजिकता के भाव को खत्म कर दिया
बहुत बहुत धन्यवाद् आदरणीय विजय जी। आपका प्रेम और स्नेह यूँ हीं बनी रहे।