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अन्नू कपूर की फिल्म “हमारे बारह” में गीत लिखने वाले वैज्ञानिक, साहित्यकार और गीतकार “डॉ. बब्बन जी” से विनय श्रीवास्तव की विशेष बातचीत

डॉ. बब्बन जी का विशेष इंटरव्यू

विज्ञान की कठोर दुनिया और साहित्य की कोमल संवेदनाओं को एक साथ जीना हर किसी के बस की बात नहीं होती। लेकिन डॉ. बब्बन जी उन विरले व्यक्तित्वों में से हैं जिन्होंने प्रयोगशाला की गंभीरता के बीच भी शब्दों की गर्माहट को कभी मरने नहीं दिया। एक ओर वे विज्ञान और शोध की दुनिया में अपनी पहचान बनाते रहे, तो दूसरी ओर उनकी कविताएँ गाँव, किसान, भूख, रिश्तों और आम आदमी के दर्द को आवाज़ देती रहीं। अन्नू कपूर की फिल्म के लिए गीत लिखने वाले डॉ. बब्बन जी से विनय श्रीवास्तव ने साहित्य, समाज, संघर्ष और जीवन के कई पहलुओं पर एक बेहद आत्मीय बातचीत की।

प्रश्न . बब्बन जी, एक वैज्ञानिक होकर साहित्य और गीत लेखन की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?

उत्तर :
मेरे भीतर विज्ञान और साहित्य दोनों बचपन से साथ-साथ रहे। विज्ञान ने मुझे तर्क दिया, सोचने का तरीका दिया, जबकि साहित्य ने संवेदनाएँ दीं। गाँव का परिवेश, लोगों का संघर्ष, माँ की ममता और समाज की सच्चाइयाँ मन में लगातार उतरती रहीं। जब इन्हें भीतर संभालना मुश्किल हुआ, तो वे शब्द बनकर कागज़ पर उतरने लगीं। मेरे लिए लेखन कोई अलग दुनिया नहीं, बल्कि जीवन को महसूस करने का माध्यम है।

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प्रश्न . आपकी रचनाओं में गाँव, किसान और गरीबों का दर्द बहुत गहराई से दिखाई देता है। इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली?

उत्तर :
मैंने उस भारत को बहुत करीब से देखा है जहाँ लोग आज भी अभावों में जी रहे हैं। खेतों में सूखा, घरों में भूख, साहूकारों का दबाव और टूटते सपने — ये सब केवल दृश्य नहीं, बल्कि मेरे अनुभव रहे हैं। शायद यही कारण है कि मेरी कविताएँ कल्पना से ज्यादा वास्तविकता से जुड़ी होती हैं। मैं मानता हूँ कि साहित्य तभी सच्चा होता है जब उसमें समाज की धड़कन सुनाई दे।

प्रश्न . आपकी चर्चित कविता “ऐ राम खिलवान भैया” के पीछे की भावना क्या थी?

उत्तर :
यह कविता किसी कल्पना से नहीं, बल्कि समाज की एक सच्ची तस्वीर से निकली थी। मैंने देखा कि गरीबी किस तरह इंसान की कमर ही नहीं, उसकी उम्मीद तक तोड़ देती है। एक किसान की विवशता, उसके बच्चों की भूख और उसकी बेबसी ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। उसी दर्द ने इस कविता को जन्म दिया। जब लोग इसे सुनकर भावुक होते हैं, तो लगता है मेरी कलम किसी के दिल तक पहुँच पाई।

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प्रश्न . विज्ञान और साहित्य — दोनों अलग-अलग दुनिया मानी जाती हैं। आपने इनके बीच संतुलन कैसे बनाया?

उत्तर :
संतुलन आसान नहीं था, लेकिन मैंने कभी दोनों को अलग नहीं माना। दिन में प्रयोगशाला और शोध का काम होता था, रात में शब्दों और भावनाओं का संसार। विज्ञान ने मुझे अनुशासन और गहराई दी, जबकि साहित्य ने मुझे इंसान और समाज को समझना सिखाया। शायद इसी कारण मेरी रचनाओं में संवेदना के साथ यथार्थ भी दिखाई देता है।

प्रश्न . आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जैसे बड़े साहित्यकारों का सान्निध्य आपके लिए कितना महत्वपूर्ण रहा?

उत्तर :
यह मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा। जब मैंने अपनी रचनाएँ उन्हें सुनाईं, तो उन्होंने न केवल सराहा बल्कि आगे लिखते रहने के लिए प्रेरित भी किया। उनका आशीर्वाद मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। बड़े साहित्यकार जब किसी नए लेखक का मनोबल बढ़ाते हैं, तो वह प्रेरणा जीवन भर साथ रहती है।

प्रश्न . आपकी कविता “बहुत हो गयी याचना” में अधिकार और संघर्ष की आवाज़ सुनाई देती है। क्या यह आज के समाज की तस्वीर है?

उत्तर :
बिल्कुल। आज समाज का एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। लोग लंबे समय तक चुप रहे, लेकिन अब नई पीढ़ी सवाल पूछ रही है। यह कविता उसी बेचैनी और बदलाव की इच्छा का प्रतीक है। मैं मानता हूँ कि जब अन्याय बढ़ता है, तो शब्द भी आंदोलन बन जाते हैं।

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प्रश्न . आप विज्ञान से बॉलीवुड तक कैसे पहुँचे और यह अनुभव कैसा रहा?

उत्तर :
यह सफर बिल्कुल योजनाबद्ध नहीं था। मैं मूल रूप से विज्ञान और शोध की दुनिया से जुड़ा रहा, लेकिन साहित्य हमेशा मेरे भीतर जीवित रहा। धीरे-धीरे मेरी कविताएँ और गीत लोगों तक पहुँचने लगे और वहीं से फिल्म जगत से जुड़े लोगों तक मेरी रचनाएँ पहुँचीं। अन्नू कपूर जी की फिल्म के लिए गीत लिखने का अवसर मेरे लिए बेहद खास था।

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जब अपनी लिखी पंक्तियों को संगीत और पर्दे के साथ महसूस किया, तो वह पल बहुत भावुक कर देने वाला था। मुझे खुशी इस बात की थी कि मेरी मिट्टी और मेरी संवेदनाएँ बड़े मंच तक पहुँच रही थीं।

प्रश्न . आपका कोई आने वाला प्रोजेक्ट या रचना, जिसके बारे में पाठकों को जानना चाहिए?

उत्तर :
जी हाँ, कुछ नई रचनाओं और गीतों पर लगातार काम चल रहा है। साथ ही कमल चंद्रा के उम्दा निर्देशन में दो फ़िल्में निर्माणधीन है जिसमे मेरे लिखे हुए
गीत होंगे। मेरी कोशिश रहती है कि जो भी लिखूँ, उसमें समाज और मनुष्य की सच्ची संवेदनाएँ दिखाई दें। कुछ साहित्यिक और संगीत से जुड़े प्रोजेक्ट आने वाले समय में लोगों के सामने आएँगे।

इसके अलावा मैं ऐसी रचनाओं पर भी काम कर रहा हूँ जो गाँव, किसान, रिश्तों और बदलते सामाजिक मूल्यों की वास्तविक तस्वीर को सामने लाएँ। मुझे विश्वास है कि आने वाले कार्य भी लोगों के दिलों तक पहुँचेंगे।

प्रश्न . आज के साहित्य को आप किस नजर से देखते हैं?

उत्तर :
आज साहित्य में विषयों की विविधता बढ़ी है, जो अच्छी बात है। नई पीढ़ी नए विषयों पर लिख रही है और अपनी बात खुलकर कह रही है। लेकिन कहीं-कहीं संवेदनाएँ कम होती दिखाई देती हैं। साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं होता, उसके पीछे आत्मा और समाज की सच्चाई होनी चाहिए। जब तक मनुष्य का दर्द और प्रेम साहित्य में जीवित रहेगा, तब तक साहित्य भी जीवित रहेगा।

प्रश्न . नई पीढ़ी के युवा कवियों और लेखकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर :
सबसे पहले जीवन को पढ़िए। किताबें जरूरी हैं, लेकिन समाज उससे भी बड़ा विश्वविद्यालय है। लोगों के दुख, संघर्ष, प्रेम और उम्मीदों को महसूस कीजिए। जो लेखक संवेदनशील होता है, वही लंबे समय तक लोगों के दिलों में रहता है। केवल शब्द सुंदर होना काफी नहीं, उनके पीछे सच्चाई और अनुभव भी होना चाहिए।

प्रश्न . अंत में, आपके लिए लेखन क्या है?

उत्तर :
मेरे लिए लेखन पूजा है, आत्मसंवाद है। जब मन बहुत बेचैन होता है, तो शब्द ही मुझे संभालते हैं। मैं मानता हूँ कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके शब्द और संवेदनाएँ जीवित रहती हैं। अगर मेरी कोई कविता किसी दुखी इंसान को थोड़ी ताकत दे सके, तो वही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

✨ डॉ. बब्बन जी की मार्मिक रचनाएँ ✨

 डॉ. बब्बन जी की मार्मिक रचनाएँ

समापन

डॉ. बब्बन जी से हुई यह बातचीत केवल एक साहित्यकार का साक्षात्कार नहीं, बल्कि संवेदनाओं, संघर्षों और जीवन के अनुभवों की यात्रा जैसी प्रतीत होती है। विज्ञान की गंभीर दुनिया से निकलकर शब्दों के माध्यम से समाज की पीड़ा और उम्मीदों को आवाज़ देने वाले बब्बन जी आज भी उतनी ही सादगी और आत्मीयता से लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनकी रचनाएँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। विनय विमर्श की ओर से हम डॉ. बब्बन जी के स्वस्थ, दीर्घ और निरंतर रचनात्मक जीवन की कामना करते हैं, ताकि उनकी कलम यूँ ही समाज को संवेदनाओं की रोशनी देती रहे।

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