
भारत आस्था, अध्यात्म और धार्मिक परंपराओं का देश है। यहां करोड़ों लोग ईश्वर, पूजा-पाठ, भक्ति, मंत्र और आध्यात्मिक साधना में विश्वास रखते हैं। यह विश्वास सदियों से समाज को मानसिक शक्ति, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा देता आया है। लेकिन जब इसी आस्था का उपयोग किसी गंभीर बीमारी के “शर्तिया इलाज”, “जीवनदान” या “मृत्यु को टाल देने” जैसे दावों के लिए किया जाने लगे, तब यह केवल धार्मिक विषय नहीं रह जाता बल्कि यह समाज, कानून और मानवता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।
आज देश के विभिन्न हिस्सों में सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे अनेक वीडियो वायरल किए जा रहे हैं जिनमें कुछ बाबा, मौलवी, तांत्रिक या स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु कैंसर, ब्रेन ट्यूमर, किडनी फेलियर और अन्य जटिल बीमारियों को ठीक करने के दावे करते दिखाई देते हैं। कुछ लोग तो यहां तक दावा करते हैं कि उन्होंने वेंटिलेटर पर पड़े मरीजों को जीवनदान दिया, मृत्यु के मुंह से लोगों को वापस ले आए और असाध्य रोगों को कुछ दिनों में समाप्त कर दिया। ऐसे दावे न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से संदिग्ध हैं बल्कि उन लाखों परिवारों की भावनाओं के साथ भी क्रूर मजाक हैं जो अपने प्रियजनों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे होते हैं।
हाल के दिनों में करौली दरबार और उसके संचालकों से जुड़े अनेक दावे और प्रचार सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। विशेष रूप से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के संबंध में किए गए चमत्कारी उपचार और जीवनदान के दावों ने कई सवाल खड़े किए हैं। यह प्रश्न अब केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की जागरूकता और जिम्मेदारी का है।
जब बीमारी नहीं, मजबूरी का फायदा उठाया जाता है

कैंसर केवल एक बीमारी नहीं है। यह पूरे परिवार की परीक्षा होती है। जब किसी बच्चे, युवक या बुजुर्ग को कैंसर होता है तो उसके माता-पिता, भाई-बहन और रिश्तेदार मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से टूटने लगते हैं। अस्पतालों के चक्कर, महंगे इलाज, दवाइयां, ऑपरेशन और अनिश्चित भविष्य किसी भी परिवार को अंदर तक झकझोर देते हैं।
ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति सामने आकर कहे कि वह “शर्तिया इलाज” कर देगा, “जीवनदान” दे देगा या “मृत्यु को रोक देगा”, तो स्वाभाविक रूप से निराश परिवार उसकी बातों पर विश्वास करने लगते हैं। यह विश्वास उनकी मजबूरी से पैदा होता है, किसी वैज्ञानिक प्रमाण से नहीं।
कैंसर से पीड़ित लखनऊ की 12 वर्षीय बच्ची “परी वर्मा” की दुखद मृत्यु इसी संदर्भ में कई गंभीर सवाल खड़ी करती है। परिवार ने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा-पाठ, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करवाए। यहाँ तक की घर में वर्षों से स्थापित देवी देवताओं की मूर्तियों को हटाकर, करौली बाबा और उनके गुरु की मूर्ति पूजन करने लगे। उन्होंने लाखों रुपये खर्च किए, लगातार दरबार में अर्जी लगाई और बताए गए सभी नियमों का पालन किया। परिवार को उम्मीद थी कि बच्ची स्वस्थ हो जाएगी। करौली सरकार के प्रति परिवार के आस्था और विश्वास का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की सबकी लाडली परी वर्मा वेंटीलेटर पर जीवन के लिए संघर्ष कर रही थी, तब भी उसकी मां पूजा वर्मा दरबार में मिन्नतें मांग रही थी। दरबार में दर दर फ़रियाद कर रही थी। बाबा के शिष्य लोग यह आश्वासन दे रहे थे की बच्ची को कुछ नहीं होगा क्योंकि बाबा जी ने उसको जीवनदान दे दिया है। बाबा जी स्वयं उसकी ध्यान रख रहे हैं। दरबार में उसके लिए पूजा चल रही है। यही विश्वास उन्हें लगातार दिलाया गया था।
लेकिन 4 जून 2026 को परी वर्मा जिंदगी की लड़ाई हार गई। आस्था का यह विश्वास सिर्फ परी वर्मा के परिवार का नहीं टुटा है, बल्कि देश के उन लाखों परिवारों का टुटा है जो दवा से अधिक बाबाओं के झूठे दुआओं और वादों पर यकीन कर रहे हैं। सनातन धर्म भी इन पाखंडियों के कारण बदनाम हो रहा है।
आशाराम बापू, राम रहीम और ना जाने कितने ही बाबा आस्था के नाम पर लोगों का विश्वास तोड़ रहे हैं लेकिन ज़िन्दगी की जद्दोजहद में मज़बूरी में कहीं ना कहीं बीमारी से पीड़ित परिवार यकीन कर लेता है लेकिन अंत में सिर्फ धोखा और लूट ही मिल रहा है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सार्वजनिक मंचों पर बार-बार यह दावा किया जाता है कि कैंसर का इलाज संभव है, मृत्यु को टाला जा सकता है और सैकड़ों मरीज ठीक हो चुके हैं, तो फिर उन मरीजों की जिम्मेदारी कौन लेगा जो ठीक नहीं हो पाए? यदि दावा गलत साबित हो जाए तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
“500 में एक भी ठीक न हो तो दरबार बंद कर दूंगा” जैसे दावे कितने खतरनाक?
किसी भी लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक समाज में कोई व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि वह हर मरीज को ठीक कर देगा। दुनिया के सबसे बड़े डॉक्टर, सबसे आधुनिक अस्पताल और सबसे उन्नत चिकित्सा संस्थान भी ऐसा दावा नहीं करते। कैंसर विशेषज्ञ यह नहीं कहते कि हर मरीज निश्चित रूप से बच जाएगा। वे इलाज, संभावना और चिकित्सा प्रक्रिया की बात करते हैं। लेकिन यदि कोई बाबा या स्वयंभू गुरु यह कहता है कि 500 मरीजों में से एक भी ठीक न हुआ तो वह अपना दरबार बंद कर देगा, तो यह अत्यंत गंभीर और भ्रामक दावा है। यदि ऐसा दावा सार्वजनिक रूप से किया गया है और उसके बावजूद मरीजों की मृत्यु होती है, तो समाज को यह पूछने का अधिकार है कि उस वादे का क्या हुआ?
आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन आस्था के नाम पर किए गए दावों की भी जांच होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति जनता के सामने असाध्य रोगों के शर्तिया इलाज का प्रचार करता है, तो उसे अपने दावों के प्रमाण भी प्रस्तुत करने चाहिए। केवल भावनात्मक भाषण, मंचीय घोषणाएं और सोशल मीडिया वीडियो किसी दावे को सत्य सिद्ध नहीं करते।
आस्था के नाम पर धन उगाही के आरोप और गरीबों के साथ अन्याय
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे कई मामलों में लोगों द्वारा भारी धनराशि खर्च किए जाने की बातें सामने आती हैं। मात्र 2 मिनट मिलने के लिए कम से कम दस हजार रूपये, हवन के लिए डेढ़ लाख रूपये चाहिए।
यदि किसी मरीज से मिलने के लिए हजारों रुपये का टोकन लिया जाता है, यदि हवन और विशेष अनुष्ठानों के नाम पर लाखों रुपये खर्च करवाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे। किसी गरीब परिवार के लिए यह राशि जीवनभर की जमा पूंजी हो सकती है। जब एक कैंसर मरीज का परिवार पहले से ही अस्पतालों और दवाइयों पर लाखों रुपये खर्च कर चुका हो, तब उससे और अधिक धन खर्च करवाना नैतिक रूप से भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यदि वास्तव में सेवा ही उद्देश्य है, तो गरीब और अमीर के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि किसी गरीब व्यक्ति के लिए इन प्रक्रियाओं तक पहुंच ही संभव नहीं है, तो फिर निःशुल्क सेवा के दावे कितने सार्थक हैं? समाज को यह समझना होगा कि आस्था और आर्थिक शोषण के बीच एक बहुत पतली रेखा होती है। जब धार्मिक विश्वास को आर्थिक लेन-देन और चमत्कारी दावों से जोड़ दिया जाता है, तब विवाद और संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
सोशल मीडिया पर फैलते चमत्कारों के वीडियो: सच कम, प्रचार ज्यादा
आज सोशल मीडिया सबसे बड़ा प्रचार माध्यम बन चुका है। लाखों लोग फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म पर वीडियो देखकर प्रभावित होते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी मरीज के ठीक होने की एक कहानी को बार-बार दिखाया जाता है, लेकिन उन लोगों की जानकारी कभी सामने नहीं आती जो ठीक नहीं हो पाए। केवल सफलताओं का प्रचार और असफलताओं की चुप्पी एक भ्रामक तस्वीर बनाती है। कई वीडियो ऐसे बनाए जाते हैं जिनमें भावनात्मक संगीत, चमत्कारी कथाएं और श्रद्धा से भरे बयान होते हैं। इन्हें देखकर आम व्यक्ति प्रभावित हो सकता है। लेकिन किसी वीडियो का वायरल होना उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं होता। कैंसर, हृदय रोग, किडनी फेलियर और अन्य गंभीर बीमारियों का उपचार चिकित्सा विज्ञान का विषय है। अध्यात्म मानसिक शक्ति दे सकता है, तनाव कम कर सकता है और रोगी को सकारात्मक सोच प्रदान कर सकता है, लेकिन किसी भी आध्यात्मिक संस्था को चिकित्सा विज्ञान का विकल्प बताना खतरनाक हो सकता है।
यही कारण है कि लोगों को ऐसे वीडियो देखकर भावनात्मक निर्णय लेने से बचना चाहिए। हर दावे की जांच करें, विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह लें और केवल वायरल वीडियो के आधार पर इलाज का रास्ता न बदलें।
सरकार और प्रशासन को अब सख्त कदम उठाने होंगे
यह मामला केवल धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं है। यह उपभोक्ता अधिकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्षा का भी विषय है। यदि कोई व्यक्ति या संस्था कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के शर्तिया इलाज का दावा करती है, जीवनदान देने की बात करती है या मृत्यु को रोकने का प्रचार करती है, तो संबंधित सरकारी एजेंसियों को उसकी जांच करनी चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी संस्था या व्यक्ति बिना वैज्ञानिक प्रमाण के गंभीर बीमारियों के इलाज के भ्रामक दावे न कर सके। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को भी ऐसे वीडियो की तथ्यात्मक जांच करनी चाहिए जिनमें चमत्कारी उपचार या जीवनदान जैसी बातें कही जाती हैं। जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य मंत्रालय, उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण और राज्य प्रशासन को संयुक्त रूप से ऐसे मामलों की समीक्षा करनी चाहिए। यदि कोई दावा झूठा या भ्रामक पाया जाता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग आस्था से जुड़े हैं, वहां धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी है। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि आस्था को व्यवसाय, भ्रम और झूठे चमत्कारों का साधन न बनने दिया जाए।
अंततः लोगों को समझना होगा कि अध्यात्म और अंधविश्वास दो अलग-अलग बातें हैं। ईश्वर में विश्वास रखना गलत नहीं है। पूजा-पाठ करना गलत नहीं है। मानसिक शक्ति के लिए आध्यात्मिक सहारा लेना भी गलत नहीं है। लेकिन किसी भी व्यक्ति को इतना अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह स्वयं को जीवन और मृत्यु का निर्णायक बताने लगे।
जीवनदान देने का अधिकार किसी बाबा, मौलवी, तांत्रिक या स्वयंभू गुरु के पास नहीं है। यदि कोई ऐसा दावा करता है तो समाज को उससे प्रमाण मांगने चाहिए। भावनाओं के आधार पर नहीं, तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने चाहिए। परी वर्मा जैसी मासूम बच्चियों की दुखद मृत्यु हमें यही संदेश देती है कि बीमारी के खिलाफ लड़ाई विज्ञान, चिकित्सा और सही उपचार से लड़ी जानी चाहिए। भक्ति मन को शक्ति दे सकती है, लेकिन चिकित्सा का विकल्प नहीं बन सकती। इसलिए सजग रहें, सतर्क रहें, प्रश्न पूछें और किसी भी चमत्कारी दावे पर आंख बंद करके विश्वास न करें। आस्था रखें, लेकिन अंधभक्ति से बचें। यही समाज, मरीजों और उनके परिवारों के हित में सबसे बड़ा संदेश है।
जनता से एक सीधी अपील: आस्था रखें, लेकिन अपनी जिंदगी किसी दावे के भरोसे मत सौंपिए


भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी आस्था है, लेकिन सबसे बड़ी कमजोरी तब बन जाती है जब यही आस्था बिना सवाल किए अंधविश्वास में बदल जाती है। आज जरूरत इस बात की है कि हर नागरिक भावनाओं के साथ-साथ विवेक का भी उपयोग करे। किसी भी बीमारी, विशेषकर कैंसर, ब्रेन ट्यूमर, किडनी फेलियर या अन्य गंभीर रोगों के मामले में केवल चमत्कारी दावों, वायरल वीडियो या मंचों से किए गए वादों पर भरोसा करना खतरनाक साबित हो सकता है।
याद रखिए, बीमारी के समय सबसे ज्यादा कमजोर केवल मरीज का शरीर नहीं होता, बल्कि उसका पूरा परिवार भावनात्मक रूप से टूट चुका होता है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति यदि निश्चित इलाज, शर्तिया सफलता या जीवनदान का दावा करता है, तो उसके शब्द उम्मीद तो जगाते हैं, लेकिन कई बार यही उम्मीद भ्रम में बदल जाती है। इसलिए किसी भी दावे को स्वीकार करने से पहले उसके पीछे के प्रमाण, वैज्ञानिक आधार और वास्तविक परिणामों को जरूर परखिए।
आस्था आपको मानसिक शक्ति दे सकती है, कठिन समय में साहस दे सकती है और जीवन की चुनौतियों से लड़ने का हौसला भी दे सकती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान का स्थान कोई नहीं ले सकता। डॉक्टरों की सलाह, आधुनिक उपचार और वैज्ञानिक जांच ही गंभीर बीमारियों से लड़ने का सबसे विश्वसनीय मार्ग हैं।
समाज की जिम्मेदारी है कि वह प्रश्न पूछे, प्रमाण मांगे और सच तथा प्रचार के बीच का अंतर समझे। और इंसान को इंसान ही रहने दें, उन्हें भगवन नहीं बनाएं। कोई भी दिव्य संत भगवन की मूर्ति हटाकर अपनी मूर्ति या फोटो की पूजा का सलाह नहीं देता है। आडंबरी और और आपको लूटने की सबसे बड़ी पहचान बाबाओं के आश्रम में पैसे की डिमांड, अपनी पूजा कराने की सलाह ही है । इस बात को आपलोग गाँठ बाँध लें। किसी भी व्यक्ति को इतना बड़ा दर्जा न दें कि वह स्वयं को जीवन और मृत्यु का निर्णायक बताने लगे। आपकी श्रद्धा अमूल्य है, उसे किसी भी झूठे दावे, भ्रम या भावनात्मक शोषण का साधन न बनने दें।
सजग नागरिक बनिए, अपने परिवार को जागरूक बनाइए और हर उस 3व्यक्ति का साथ दीजिए जो विज्ञान, सत्य और जिम्मेदार आस्था की बात करता है। क्योंकि जागरूक समाज ही अंधविश्वास से मुक्त और सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी है।

विनय श्रीवास्तव
लेखक | ब्लॉगर | स्वतंत्र पत्रकार
विनय श्रीवास्तव एक प्रतिबद्ध लेखक, ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक सरोकार, समसामयिक विषयों और जनजीवन से जुड़े मुद्दों पर गहन शोध-आधारित एवं विश्लेषणात्मक लेखन के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी लेखनी तथ्य, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की मजबूत आधारशिला पर आधारित है।
पिछले एक दशक से अधिक समय से उनके लेख विभिन्न राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति, शासन-प्रशासन, सामाजिक परिवर्तन, ग्रामीण भारत, युवा चुनौतियाँ, सांस्कृतिक विमर्श और समकालीन राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर एवं विचारोत्तेजक लेखन किया है।
विनय श्रीवास्तव का मानना है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का साधन और बौद्धिक जिम्मेदारी का दायित्व है। वे अपने लेखों के माध्यम से तथ्यपरक विश्लेषण, स्वस्थ वैचारिक संवाद और राष्ट्रहित की दृष्टि को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि पाठकों में विवेक, जागरूकता और विचारशीलता को सशक्त बनाना है।
वर्ष 2026 में उनकी पहली पुस्तक “मन-मोदी” प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में किया गया। यह पुस्तक भारत के दो प्रधानमंत्रियों—डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी—के नेतृत्व काल का सकारात्मक, तथ्याधारित एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें दोनों कार्यकालों की नीतियों, निर्णयों, उपलब्धियों तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उनके प्रभाव का संतुलित अध्ययन किया गया है। पुस्तक का उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय राजनीति को समझने हेतु एक निष्पक्ष, रचनात्मक और विचारपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले विनय श्रीवास्तव ने संघर्ष, अध्ययन और निरंतर लेखन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे सत्य, विवेक और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तथा राष्ट्र, समाज और विचार की सकारात्मक दिशा में निरंतर योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
यह पुस्तक Amazon पर उपलब्ध है:
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Aese babaoo ko fasi de deni chahiye 😤😤
Bilkul sahi hai. In sabhi paakhansldi babaaon ka loot ka dukan shighr band honi chahiye
Ye savi baba bas dhogi hai ese baba ka dukan band hona chahiye BJP ki sarkar me ese baba ko bhut teji se badhawa mil rha hai. Ye log bas paisa lutta hai
Absloutely right
Aise pakhandiyo ko tangkar bich chaurahe par poochhna chahie ki khud ko jiwandan de paega ya nhi….