दोस्ती ऐसी हो कि दोस्त कहे—“तू क्यों घबराता है, मैं हूँ ना!”

कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कल्पना आज के दौर में शायद मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव सी लगती है। वह दोस्ती किसी स्वार्थ, जरूरत या मतलब की जमीन पर खड़ी नहीं थी। वहां न अमीरी-गरीबी का फर्क था, न राजा और साधारण मित्र का अहसास। सुदामा के पास देने के लिए शायद कुछ नहीं … Continue reading दोस्ती ऐसी हो कि दोस्त कहे—“तू क्यों घबराता है, मैं हूँ ना!”